'जोड़ घटाव की ग़लती से जयललिता हुईं बरी'

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जयलिता मामले में विशेष सरकारी वकील बीवी आचार्य कहा है कि तमिलानाडु की पूर्व मुख्यमंत्री की आय से अधिक संपत्ति के जोड़ घटाव में ग़लती हुई है और कर्नाटक हाई कोर्ट के फ़ैसले में यह बहुत बड़ी कमी है.

आचार्य ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''फ़ैसले में आय से अधिक संपत्ति को केवल दो करोड़ बताया गया है. यह उनकी कुल आय का केवल 10 फ़ीसदी है. इसमें कोई अपराध होते हुए नहीं पाया गया है. जयललिता की ओर से लिए गए क़र्ज की गिनती में भारी भूल की गई है.''

गणितिय गणना

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उन्होंने कहा, ''अगर पूरे पैसे को ठीक से गिना गया होता तो आय से अधिक संपत्ति क़रीब 16 करोड़ रुपए होती, जो कि उनकी आय से 76 फ़ीसदी अधिक होगी. यह इस फ़ैसले का बड़ा दोष है."

जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने सोमवार के अपने फैसले में सत्र न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए जयललिता और तीन अन्य को इस मामले से बरी कर दिया था.

सत्र अदालत ने 53.5 करोड़ रुपए की आय से अधिक मामले में जयललिता के अलावा उनकी दोस्त शशिकला, सुदर्शन और इलैयावारसी को दोषी क़रार दिया था. इस मामले के पूरा होने में 19 साल का समय लगा.

क़र्ज़ की माया

आचार्य ने कहा कि फ़ैसले में जयललिता की ओर से लिए गए क़र्ज़ को 24 करोड़ बताया गया है. लेकिन अगर सभी कर्जों को ठीक से जोड़ा जाए तो यह रकम केवल 10 करोड़ ही होती है.

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उन्होंने कहा कि उनके तर्क का बुनियादी आधार यह है कि फैसले में क़र्ज़ को भी आय माना जाना चाहिए.

आचार्य को कर्नाटक सरकार ने 27 अप्रैल को विशेष सरकारी वकील नियुक्त किया था. इस समय तक जस्टिस कुमारस्वामी अपना फैसला रिज़र्व कर चुके थे. आचार्य की नियुक्ति तब हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भवानी सिंह तमिलनाडु के सतर्कता विभाग के विशेष सरकारी वकील नहीं हो सकते हैं.

आचार्य कहते हैं,'' सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ कर दिया था कि एक बार जब मामला दूसरे राज्य में स्थानांतरित हो जाता है तो, जिस राज्य में मामला जाता है, वह अभियोजक बन जाता है. लेकिन कर्नाटक को इस मामले में पक्ष नहीं बनाया गया. न्यायाधीश ने इस बात को माना भी. उन्हें लगा कि यह सुधारी जाने लायक अनियमितता थी. लेकिन यह अनियमितता नहीं बल्कि अवैध बात थी. इसे अभी तक सुधारा नहीं गया है.''

कर्नाटक का पक्ष

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Image caption जयललिता के खिलाफ इस मुकदमें की सुनवाई में करीब 19 साल का समय लगा.

वो कहते हैं कि जयललिता और अन्य की ओर से दायर अपील सुनवाई लायक़ नहीं थी, क्योंकि इस मामले में कर्नाटक को पक्ष नहीं बनाया गया था.

आचार्य कहते हैं कि किसी भी मामले में एक विशेष सरकारी वकील होना चाहिए. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ. केवल इस आधार पर ही अपील ख़ारिज हो जानी चाहिए.

आचार्य भाजपा और कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में कुल पांच बार कर्नाटक के महाधिवक्ता रह चुके हैं.

वो कहते हैं कि अपनी बात वो कर्नाटक सरकार के सामने रखेंगे.

उनका मानना है कि फ़ैसले की इस कमी को सुप्रीम कोर्ट में ले जाना चाहिए.

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