माई लॉर्ड, यह तस्वीर ठीक नहीं लगती..

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सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों के नियंत्रण के लिए तमाम दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं. संक्षेप में, अदालत ने उन तस्वीरों का चयन कर लिया है, जो तस्वीरें सरकारी विज्ञापनों में लगाई जा सकेंगी.

एक राष्ट्रपति की, एक प्रधानमंत्री की और एक भारत के प्रधान न्यायाधीश की. वह भी उनसे पूछ कर.

खल्क खुदा का, हुक्म सबसे बड़ी अदालत का. लेकिन मुल्क उस सोशल मीडिया का, जो उन लोगों के हाथ में है, जिन्हें डेमोक्रेसी की लत लग चुकी है.

और जो लोग डेमोक्रेसी का अर्थ कम से कम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगाते हैं. सोशल मीडिया ने इस फ़ैसले की जमकर धुनाई की.

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इसलिए नहीं कि लोग इस या उस नेता की फ़ोटो अख़बार में छपी देखना चाहते हैं. बल्कि इसलिए कि आम लोगों को लगता है कि इस तरह की बातों में अदालत का हस्तक्षेप, अगर बहुत अतिरंजित मामला न हो, तो अनावश्यक है.

लेकिन सवाल सिर्फ सरकारी वकील के इस तर्क से सहमत होने का नहीं है कि किसका फोटो छपेगा और किसका नहीं, यह तय करना कार्यपालिका का काम है (अदालत का नहीं है).

इससे कई गुना मजेदार वह तर्क है जो याचिकाकर्ता एनजीओ की ओर से पेश किया गया.

वकील प्रशांत भूषण यह कहते हुए टीवी पर दिखे कि इन तस्वीरों से 'व्यक्ति पूजा' को बढ़ावा मिलता है, जो 'लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं' है.

एक और बात यह कही गई कि विज्ञापन पर खर्च होने वाला पैसा 'पब्लिक' का है. वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट एक कमेटी भी बना चुकी थी कि विज्ञापनों में होने वाले पैसों के दुरुपयोग को कैसे रोका जाए.

राजनीतिक लाभ का तर्क

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कमेटी के एक सदस्य ने सिफारिश की थी कि सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भी तस्वीरें नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने इसे नहीं माना.

विषय बहुत गंभीर है और जितनी सरलता से उसे निपटाया गया है, वह और भी गंभीर है. सिर्फ सतही बातों के गंभीर पहलू को देखें, तो बात काफी कुछ साफ हो जाएगी.

सबसे पहले देखिए- विज्ञापनों से 'राजनीतिक लाभ उठाने' का तर्क. सच्चाई यह है कि राजनीति जीवंत होती है, वहां किसी का रिटायरमेंट नहीं होता, तो रिटायरमेंट होने तक कुर्सी पर बैठे रहने की इजाज़त भी नहीं होती है.

यह स्थिति समुद्र और उसमें उगे नए द्वीप जैसी होती है. अगर द्वीप अपना विस्तार नहीं करेगा, तो समुद्र उसे निगल जाएगा. अगर समुद्र अपना विस्तार नहीं करेगा, तो द्वीप उसे चीर देगा. लड़ाई प्रतिक्षण चलती है.

प्रतियोगी राजनीति में, अगर आप किसी को राजनीतिक लाभ उठाने से रोकने पर आमादा होते हैं, तो आप परोक्ष रूप से उसके विरोधियों को राजनीतिक लाभ पहुंचाने पर आमादा हो चुके होते हैं.

व्यक्ति पूजा का तर्क

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अब देखिए 'व्यक्ति पूजा' का तर्क. सच यह है कि 'नेतृत्व' और उसके अनुशासन को 'व्यक्ति पूजा' से बिल्कुल भिन्न परिभाषित कर सकना जिसके लिए संभव होगा, वह व्यक्ति निश्चित रूप से यह भी नाप सकता होगा कि मछली ने कितना पानी पी लिया और कितना वापस छोड़ दिया.

अल्प और मध्यम अवधि में 'नेतृत्व' और 'व्यक्ति पूजा' का अंतर सिर्फ दृष्टिकोण का अंतर है. लोकतंत्र की सफलता के लिए भी नेतृत्व ही चाहिए.

और नेतृत्व कोई अ-मनुष्य नहीं दे सकता है. मनुष्य दे, तो उसे व्यक्ति पूजा कह देना, सरल ज़्यादा है, सार्थक ज़रा भी नहीं है.

पब्लिक का पैसा

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अब आइए, 'पब्लिक का पैसा', 'टैक्स चुकाने वालों का पैसा' और उसके 'दुरुपयोग' के सवालों पर.

संसद और सरकार बजट से चलती हैं और बजट टैक्स के पैसों से चलता है. पैसा पब्लिक का है तो सरकार और संसद भी पब्लिक की ही है.

अगर हर मोड़ पर उस पैसे का आंशिक स्वामित्व (यानी उस पर जवाबदेही मांगने का अधिकार) याचिका दायर करने वाले एनजीओ का होने लगे, तो सरकार और संसद नाम की संस्था को ध्वस्त होने में देर नहीं लगेगी.

सदुपयोग या दुरुपयोग?

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कई विद्वान मानते हैं कि 'पब्लिक का पैसा', और 'टैक्स चुकाने वालों का पैसा' जैसे जुमले वास्तव में सरकारों को अस्थिर करके एक व्यापक अराजकता फैलाने की रेसिपी होते हैं.

आखिरी सवाल 'पैसे का दुरुपयोग'. सदुपयोग-दुरुपयोग का फैसला कौन करेगा? आम तौर पर सही समय, सही स्थान, सही परिस्थिति, सही लक्ष्य- जैसे मानदंड सदुपयोग को निर्धारित करते हैं.

इस फ़ैसले का समय सदुपयोग की पुष्टि करना कठिन बना देता है. हालांकि चंद तस्वीरें उतना बड़ा दुरुपयोग नहीं हो सकतीं.

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