कश्मीर का सिमटता पेपर माशी उद्योग

इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir

जम्मू-कश्मीर मशहूर कुटीर उद्योग पेपर माशी संकट के दौर से गुजर रहा है. एक समय में इस उद्योग से कश्मीर के हजारों परिवार का पेट पलता था, लेकिन अब इस धंधे में गिनती के लोग बचे हैं.

श्रीनगर के मोहम्मद शफ़ी मीर पिछले तीस सालों से पेपर माशी के काम से जुड़े हैं. उनका कहना है कि इस धंधे से अब गुज़ारा होना मुश्किल है.

शफ़ी मीर कहते हैं, "पहले मेरे पास 15 कारीगर थे, जिन्होंने इस काम को छोड़ दिया. मैं अकेला इस काम में हूं. मुश्किल से महीने में पांच हज़ार की कमाई होती है और इन पैसों से भी मुझे पेपर माशी के नमूने बनाने के लिए सामान खरीदना पड़ता है."

श्रीनगर के आबि गुज़र इलाके में रहने वाले बशीर अहमद पहले पेपर माशी का काम करते थे, लेकिन अब उन्होंने ये काम छोड़ दिया.

बशीर अहमद कहते हैं, "पेपर माशी के काम से कोई घर नहीं चला सकता है, मैंने इसलिए इस काम को अलविदा कह दिया."

स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल

राज्य के इस कुटीर उद्योग को खस्ताहाल में देखते हुए राज्य सराकर ने इस कला को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला किया है.

इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir

राज्य के शिक्षा मंत्री नईम अख़्तर ने कहा है, "पेपर माशी उद्योग मर रहा है और इसको बचाने के लिए हम कई कदम उठा रहे हैं."

सरकार की कोशिश इस फ़ैसले के जरिए युवा पीढ़ी को इस कला से जोड़ने की है. ऐसी कला जो 15वीं शताब्दी में एक मुगल राजा के साथ समरकंद से यहां पुहंची थी.

इसी दिशा में पिछले वर्ष से कश्मीर विश्वविद्यालय में भी एक पाठ्यक्रम की शुरुआत हुई थी.

कश्मीर विश्वविद्यालय के लाइफ लॉन्ग विभाग के डायरेक्टर गुलाम हसन मीर कहते हैं, "हमने पिछले साल पेपर माशी के पाठ्यक्रम को शुरू किया. इसका मकसद साफ है कि हम इस उद्योग को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जोड़ सकें."

विश्वविद्यालय ने पिछले साल चालीस छात्रों को इस पाठ्यक्रम की ट्रेनिंग दी है.

कला के मिटने की आशंका

श्रीनगर में पेपर माशी का शो रूम चलाने वाले आफ़ाक पंजाबी का परिवार पिछले छह दशकों से इस धंधे से जुड़ा हुआ है. आफ़ाक़ को डर है कि आने वाले 15 सालों में पेपर माशी का काम करने के लिए शायद ही कोई तैयार हो.

इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir

लेकिन उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि स्कूली बच्चों को अब पेपर माशी की कला से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

सरकार भी दावा कर रही है कि इस उद्योग को बचाने की हरसंभव कोशिश की जा रही है.

सरकार का दावा

कश्मीर हस्तशिल्प विभाग के निदेशक तारिक़ अहमद कहते हैं, "हमारा विभाग इस समय श्रीनगर और बड़गाम ज़िलों में बीस पेपर माशी के सेंटर चला रहा है, जहां हम ट्रेनिंग देते हैं. ट्रेनिंग के अलावा हम सीखने वाले को हर महीने पांच सौ रुपये भी देते हैं. इसके अलावा महज 10 फ़ीसद की ब्याज़ दर पर एक लाख का लोन भी मुहैया कराते हैं."

इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir

सरकारी आंकड़े भी ये बताते हैं कि तमाम आशंकाओं के बावजूद पेपर माशी का कारोबार सिमटा नहीं है. साल 2012-13 में घाटी से 39 करोड़ रुपये के पेपर माशी उत्पादों का निर्यात किया गया जो 2014-15 में बढ़कर 71 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है.

लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस धंधे जुड़े लोगों में कारोबार को लेकर उत्साह नहीं दिखता.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार