मोदी का एक साल: अच्छे दिन का हैशटैग

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प्रधानमंत्री पद की शपथ लिए हुए नरेंद्र मोदी 26 मई को एक साल पूरा करेंगे.

बीबीसी क्या कर रहा है आप तक भारत की बदलती तस्वीर पहुंचाने के लिए? उन वादों की रोशनी और नारों के शोर में, जो निर्णायक जनादेश लेकर आया था.

ऑस्कर जीतने वाली फ़िल्म 'रिवॉल्यूशनरी रोड' में एक डायलॉग है- 'उन तमाम वादों पर कहीं यकीन तो नहीं कर लिया जो तुमसे किेए ही नहीं गए थे.'

बात उन्हीं वादों की होनी चाहिए जो किए गए थे, नरेंद्र मोदी सरकार के एक साल होने पर हम यही करने निकले हैं.

जुमले या वादे?

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एक साल बहुत होता है या नहीं? ये सवाल इतना ज़ोरों से शायद ही कभी पूछा गया हो, जितना इन दिनों पूछा जा रहा है.

पिछले आम चुनावों के दौरान जब कुछ नारे बहुत ज़ोर से उछाले गए तो लगता था कि सूरत रातों रात बदल जाएगी. पर बिसात बिछाना जुमले उछालने से कहीं ज़्यादा वास्तविक और व्यावहारिक काम है. हवा में नहीं होता. इसमें वक़्त लगता है और सब्र भी.

छह-आठ महीने तो निकलने का पता ही नहीं चलता. अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो तो और भी मुश्किल है. नारे काल्पनिक हो सकते हैं, सरकार चलाना नहीं. वह हैशटैग से तय नहीं होता.

साल भर के सवाल

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साल अभी पूरा भी नहीं हुआ कि कई लोग सवाल कर रहे हैं. सवाल करने वाले पहले भी थे. कुछ सवाल नहीं करने वाले भी थे.

पहले सवाल नहीं करने वाले भी अब सवाल कर रहे हैं. जो नहीं कर रहे हैं, वो चुप और उदासीन बैठे हैं. लेकिन अभी भी जो लोग बड़ी उम्मीद से एक चेहरे की तरफ़ टकटकी लगाए देख रहे हैं, उनकी संख्या सबसे ज्यादा है.

वे उस चेहरे की तरफ़ एकटक देख रहे हैं, जो हमेशा कैमरे की तरफ़ देख रहा पाया जाता है. वह चेहरा चाहे जहां देख रहा हो, लेकिन पूरा देश तो फिलहाल सिवा उस चेहरे के कहीं और नहीं देख रहा. पिछले साल भर से.

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देश ने संसद की सीढ़ियों पर आँसुओं को छलकते देखा. देखा कि देश का सबसे ताक़तवर नागरिक सड़क पर झाड़ू लेकर निकल पड़ा है. देखा कि कैसे मंत्रियों की क्लास लगाई जा रही है. देश ने देखा कि कैसे एक चाय वाले का बेटा अमरीकी राष्ट्रपति को बराक कहकर बुला सकता है.

दुनिया में सबसे ज्यादा ख़ुद की तस्वीरें खींचने वाले नेता का गौरव प्राप्त कर सकता है, एक साल के भीतर ही.

देश ने सुना कि थ्री डी और फ़ोर जी जैसे फ़ॉर्मूले देश का नक़्शा बदल कर रख देंगे. देश ने एक बहुत महंगा कोट पहले पहने और फिर नीलाम होते देखा. देश ने सुना कि काला धन वापस लाने की बात दरअसल चुनावी जुमला थी. देश ने देखा कि श्रीनगर में गठजोड़ सरकार कैसे बनी और दिल्ली ने कितनी जल्दी अपना मिज़ाज बदल दिया. एक साल में ये सब देश ने देखा. तालियाँ भी बजाईं, गर्व भी किया.

मन की बात

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देश मन की बात सुनते हुए बाट जोह रहा है अपने मन की बात होने की. एक के मन में बात दूसरे के मन की बात नहीं है. एक का अच्छा दिन दूसरे के अच्छे दिन से अलग है. देश ने साल भर में बहुत सी तस्वीरें देखीं, और वह अपनी तस्वीर को बदलता देखना चाहता है.

पांच साल में एक साल बीस टका होता है. दिनों के हिसाब से 365 की संख्या बड़ी होती है. भले ही यह ठीक से तसदीक़ करना मुश्किल है कि साल में कितने दिन सचमुच हैशटैग वाले अच्छे रहे.

इतने सीमित समय में किसी निर्णायक निष्कर्ष तक पहुंचे न पहुंचें, पर संकेत पढ़ने की कोशिश तो की ही जा सकती है.

बीबीसी ने नरेंद्र मोदी के चुनावी नारों की रोशनी में उनके एक साल को समझने की कोशिश की है. चाहे वह उनके आर्थिक कार्यक्रम हों, या लीक से हटकर कामकाज़ का अंदाज़, चाहे उनके सामाजिक सरोकार हों, चाहे सियासी दांव पेंच.

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यह पता करने की कोशिश भी कि अच्छे दिन किन लोगों के लिए आए हैं. और कौन अब भी अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है. जिस बनारस ने नरेंद्र मोदी को लोकसभा में भेजा, वहां क्या बदलता दिख रहा है साल भर की मियाद में?

गुजरात मॉडल का क्या?

जिस गुजरात मॉडल के नाम पर भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश को चुनावों के दौरान मंत्रमुग्ध किया था, क्या उसकी देश के बाकी हिस्सों में पहल होती दिखाई दी?

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साल भर गुज़ारने के बाद भारत के अल्पसंख्यकों के मन में वही बातें हैं, जो चुनावों से पहले थीं. और उन लोगों की भी, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं दिए.

साल भर पहले जिन वजहों से किसानों ने आत्महत्या की थी, क्या वे वजहें अब बदल गई हैं? जिन सड़कों पर देश की बहुएं, बेटियां और बहनें निकलते वक़्त कम सुरक्षित महसूस करती थी, क्या वे सड़कें बेहतर हो गईं?

क्या भारत में धंधा जमाना स्थानीय उद्यमियों के लिए आसान हो सका? क्या देश पहले से ज्यादा साफ सुथरा हुआ? और मेक इन इंडिया? वे कौन से बदलाव हैं जिनकी शुरूआत हो चुकी है, पर शायद देश को ही ठीक से पता नहीं है.

हैशटैग से परे

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Image caption नरेंद्र मोदी के कई समर्थक अब हताशा महसूस कर रहे हैं.

पचास ओवर वाले मैच के पहले दस ओवर देखकर मैच का फैसला सुनाना जल्दबाज़ी होगी. शोर और चौंध और हैशटैग के बाहर के हिंदुस्तान को देखना, सुनना और उसके सच की पड़ताल अब भी उतनी ही ज़रूरी और महत्वपूर्ण है, जितना कि किसी भी लोकतंत्र में नागरिक होना होता है.

हैशटैग हो ना हो.

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