नजीब जंग के साथ केजरी की अजीब जंग

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-राज्यपाल नजीब जंग के बीच छिड़ी अजीब जंग से मुझे अपना बचपन याद आ गया जब मैं रांची और हज़ारीबाग़ के आदिवासी गाँवों में मुर्ग़ों की लड़ाई का तमाशा देखा करता था.

इन गावों में फसल की कटाई के बाद दो मुर्ग़ों के बीच लड़ाई की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं जो कई राउंड पर आधारित होती हैं

केजरीवाल और जंग के बीच दंगल का पहला राउंड पिछले हफ्ते उस समय शुरू हुआ जब दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव 10 दिनों की छुट्टी पर चले गए. उनकी जगह कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति होनी थी.

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नजीब जंग ने शकुंतला गामलिन को कार्यवाहक मुख्य सचिव नियुक्त किया तो केजरीवाल भड़क गए. उनका कहना था कि ये फैसला मुख्यमंत्री का होना चाहिए. केजरीवाल के विरोध के बावजूद शकुंतला गामलिन ने अपना कार्यभार संभाल लिया.

राउंड 2 में मुकाबले ने उस समय भद्दा रुख़ ले लिया जब अगले दिन प्रमुख सचिव (सेवाएं) अनिंदो मजूमदार अपने दफ्तर आये. उनके दफ्तर में ताला लगा था. पता चला मुख्यमंत्री के दफ्तर से ताला लगाने का आदेश आया था.

अनिंदो मजूमदार ने ही शकुंतला गामलिन को कार्यवाहक मुख्य सचिव बनाने का आदेश पारित किया था. मजूमदार का अपमान यहीं नहीं ख़त्म हुआ. उनकी जगह पर मुख्यमंत्री ने राजिंदर कुमार को नियुक्त कर दिया.

नजीब जंग ने इस फैसले को असंवैधानिक घोषित कर दिया. संकट और बढ़ा. मुक़ाबला भी सख्त हुआ.

रांची में होने वाले मुर्ग़ों की लड़ाई में कई बार पहले और दूसरे राउंड में ही मुर्गे की मौत हो जाती है. जो ज़िंदा बच जाते हैं वो अक्सर घायल हो जाते हैं.

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केजरीवाल और जंग के बीच लड़ाई के तीसरे राउंड में केजरीवाल नजीब जंग के बॉस और राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी से मिलने वाले हैं. जंग भी अपनी जगह डटे अगले राउंड के मुकाबले के लिए तैयार नज़र आते हैं. मुख्यमंत्री संविधान विशेषज्ञों से मिलकर इस लड़ाई पर उनकी क़ानूनी राय जानने वाले हैं.

संविधान विशेषज्ञों की राय केजरीवाल के पक्ष में नज़र आती है. अंग्रेजी के एक अख़बार में संविधान के माहिर राजीव धवन कहते हैं कि ग़लती नजीब जंग की है.

उनके अनुसार उप-राज्यपाल ने लोकतंत्र और संविधान को ख़तरे में डाल दिया है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सूरत सिंह के अनुसार केजरीवाल और जंग दोनों ने ग़ैर-ज़िम्मेदारी का सबूत दिया है. क़ानून के हिसाब से दोनों के अधिकार सीमित हैं.

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दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है. मुख्यमंत्री के पास क़ानून व्यवस्था और ज़मीन संबंधी कोई अधिकार नहीं है जबकि दूसरे क्षेत्रों में उप-राज्यपाल को मुख्यमंत्री के कामों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है.

वो कहते हैं कि दोनों पूर्व नौकरशाह हैं. ये अहम की भी लड़ाई है जिससे दोनों को नुकसान हो सकता है.

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अब इस दंगल का आखिरी राउंड बाक़ी है. इस फाइनल राउंड में कौन जीतेगा और किसकी होगी हार? या फिर दोनों होंगे घायल?

रांची में होने वाले मुर्ग़ों की लड़ाई का आयोजन शांति और समृद्धि स्थापित करने के लिए होता है.

क्या केजरीवाल और जंग के बीच दंगल का अंत भी शांति और ख़ुशी लाएगा? कम से कम दिल्ली वालों की यही आशा होगी.

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