'केजरीवाल की राजनीतिक क्रांति'

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"भारत में राजनीतिक क्रांति शुरू हो गई है. भारत अब जल्द बदलेगा". ये लिखा है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ट्विटर हैंडल पर.

फ़रवरी में दिल्ली विधान सभा चुनाव में भारी बहुमत हासिल करने के बाद केजरीवाल भारत न सही दिल्ली में क्रांति लाने की कोशिश कर सकते थे. लेकिन पिछले तीन महीनों में इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि क्रांति शुरू हो चुकी है.

उनके आलोचक कहते हैं कि अगर सत्ता पर रह कर अपनी मनमानी करना है तो ये क्रांति नहीं है. पहले वो अपने ही दो घनिष्ट साथी योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण से उलझे. उनकी ग़लती ये थी कि वो केजरीवाल को खुला हाथ देने के खिलाफ थे. केजरीवाल की चली और दोनों साथियों को दरकिनार कर दिया गया.

अब उनकी खुली लड़ाई उपराज्यपाल से हो रही है. वो सरकारी नियुक्तियों में मुख्यमंत्री की भूमिका को मानने से इंकार कर रहे हैं. केजरीवाल सार्वजनिक तौर पर उन्हें चुनौती रहे हैं.

लेकिन नजीब जंग योगेंद्र यादव या प्रशांत भूषण नहीं हैं. ये लड़ाई मुख्यमंत्री को महँगी पड़ सकती हैं. नजीब जंग दिल्ली के उपराज्यपाल हैं और राष्ट्रपति के दिल्ली सरकार में प्रतिनिधि. क़ानूनी तौर पर इस लड़ाई में केजरीवाल की जीत हो सकती है लेकिन जीत कर भी वो हार सकते हैं.

नौकरशाही

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अगर उनकी हार हुई तो इसका कारण हो सकते हैं दिल्ली प्रशासन के नौकरशाह. एक दिन पहले मैंने इनमें से कुछ से मुलाक़ात की तो अंदाज़ा हुआ कि वो केजरीवाल से कितने नाराज़ हैं. मीडिया में कहा जा रहा है कि अफसर तबादला चाहते हैं. शायद ये सही नहीं लेकिन उनके अंदर खलबली ज़रूर मची हुई है. वो बौखलाए हुए हैं.

प्रशासन का काम रुक सा गया है. उन्हें समझ में नहीं आता कि वो फाइलें किसे पहले भेजें. मैंने इसका नज़ारा खुद देखा. एक आईएएस अफसर ने अपने एक स्टाफ से कहा इस फाइल को एलजी (उपराज्यपाल) को भेज दो. लेकिन वो तुरंत बोले- रुको, पहले मुख्यमंत्री को भेजो. बाद में मेरी तरफ देख कर बोले हम इन दोनों के झगड़ों में फँस कर रह गए हैं.

इन अफसरों का कहना था कि केजरीवाल समझदारी के साथ काम नहीं ले रहे हैं. एक ने कहा कि केजरीवाल की सोच क्रांतिकारी की नहीं है, वो ऊंचे विचार के नहीं हैं. वहां मौजूद सभी अफसरों ने कहा वो केजरीवाल सरकार से परेशान हैं और ऐसा संभव है उनके साथ वो सहयोग न करें.

अफसरशाही से टक्कर लेना या उन्हें नाराज़ करना केजरीवाल को नुकसान पहुंचा सकता है. उन्हें अपने चुनावी वादे पूरे करने के लिए इन अफसरों की ज़रुरत पड़ेगी. वो सब को भ्रष्ट या चोर कहकर उनसे काम नहीं ले सकते.

अफसरशाह भी कोई दूध के धुले नहीं हैं. दशकों पहले एक अमरीकी अफसर ने कहा था, "अगर आप को पाप करना हो तो भगवान के खिलाफ करो लेकिन अफसरों के खिलाफ नहीं. भगवान माफ़ कर देगा लेकिन अफसरशाही माफ़ नहीं करेगी."

व्यक्तिगत कमज़ोरी

केजरीवाल को ये कहावत मालूम होगी क्योंकि वो भी अफसरशाही का हिस्सा रह चुके हैं.

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केजरीवाल अपनी ही व्यक्तिगत कमज़ोरियों में उलझकर रह गए हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वो किसी के मशविरे को नहीं मानते. उन्हें लगता है सब उनके खिलाफ हैं.

शायद ये सही हो. मीडिया उनकी दोस्त नहीं. उनके क़रीबी दोस्त योगेंद्र यादव उनसे अलग हो चुके हैं. दिल्ली के उपराज्यपाल से वो उलझ रहे हैं. प्रधानमंत्री उनको गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और राष्ट्रपति उनके समर्थन में अब तक सामने नहीं आए हैं.

केजरीवाल आज खुद को तन्हा महसूस कर रहे होंगे लेकिन उसके ज़िम्मेदार वो खुद हैं. चुनाव में मिले भारी बहुमत का अब तक वो सही इस्तेमाल नहीं कर सके हैं.

अगर क्रांति उनका लक्ष्य है तो इसे हासिल करने के लिए उन्हें अपने काम करने का तरीका बदलना होगा. उनके पास अब भी समय है. उनके ही एक साथी ने मुझ से कहा कि उन्हें गाइडेंस की ज़रुरत है. दिल्ली वाले उनकी तरफ ध्यान से देख रहे होंगे. उन्हें मायूस करना चुनाव में हासिल किए गए भारी मत का भारी अपमान होगा.

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