वादा मोदी का, काम इन युवतियों का

घाटी की सफ़ाई करने वाली लड़की, बनारस

मेरे अलावा बनारस में भी सभी को पिछले वर्ष की वो शाम याद है. चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के पहले नरेंद्र मोदी अपने चुनाव क्षेत्र आए थे.

दशाश्वमेध घाट आने के पहले वे बाबा विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करते हुए आए और माथे पर चंदन का लेप लगा हुआ था.

लग रहा था कि ये प्राचीन नगरी भी उनके दीदार के लिए ठहर सी गई है, जब उन्होंने ऐलान किया, "मैं इस धरती पर आया हूँ, कुछ करने के लिए."

एक वर्ष बाद बनारसवासियों से सांसद नरेंद्र मोदी का रिपोर्ट कार्ड पूछना मामूली बात नहीं है. ख़ास तौर से सफ़ाई के मुद्दे पर!

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घाटों का नज़ारा

शाम के चार बज रहे हैं और बनारस के बबुआ पांडे घाट तक पहुँचने में मुझे संकरी गलियों, गोबर और कई मेनहोल पार करने पड़ते हैं.

गंगा किनारे इस प्राचीन घाट पर दो युवतियां और क़रीब आठ युवक सफ़ाई में लगे हैं. कोई कचरा बटोर रहा है तो कोई मलबे को पॉलीथीन में समेट रहा है.

दर्जनों सीढ़ियां उतरते समय लगता है जैसे इलाके में ज़बरदस्त दुर्गंध फैली हो.

तेमुसतुला इमसॉन्ग रहने वाली तो नगालैंड की हैं, लेकिन पिछले तीन वर्षों से अपने एनजीओ के ज़रिए वाराणसी की सफ़ाई में जुटी हैं.

उन्होंने बताया, "मैंने जब प्रभु घाट देखा तो उल्टी सी होने वाली थी. तभी से ठान लिया था कि गंगा के घाटों की सफाई तो करनी ही है, वर्ना यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटक क्या कहते रहे होंगे. अच्छा नहीं लगता वो लोग कूड़े की ही तस्वीर खींचते हैं."

मुश्किल डगर

वाराणसी शहर में गंगा नदी किनारे कुल 84 घाट हैं जिनमें से ज़्यादातर के हाल बुरे हैं.

खुद नरेंद्र मोदी के पिछले वर्ष आकर अस्सी घाट पर झाड़ू उठा कर सफ़ाई में सहयोग दिया था, लेकिन उसके बाद कुछ ख़ास बदलाव नहीं दिखता.

दर्शिका शाह बनारस की रहने वाली हैं और पिछले वर्ष दिल्ली विश्विद्यालय से पढ़ाई पूरी कर अब तेमुसतुला के साथ घाटों की सफ़ाई में जुट गईं हैं.

उन्होंने कहा, "पहले हमने प्रभु घाट साफ़ किया जहाँ मल-मूत्र के अलावा कुछ नहीं था. अब हमारा ध्यान बबुआ पांडे घाट है. हमारे साथ बनारस के कुछ और युवा भी जुड़ते जा रहे हैं और हमारी मनोकामना है कि शहर के लोग हमारे सहयोग में घाटों पर आएं."

घाटों की दुर्दशा

बनारस के घाटों की कथित दुर्दशा पर यहाँ के स्थानीय लोग ज़्यादा बेबाक हैं.

अस्सी घाट पर 'पिज़ेरिया' नामक रेस्टोरेंट के मालिक गोपाल कृष्ण शुक्ला के अनुसार चीज़ें बहुत बेहतर होती जा रहीं हैं.

उन्होंने कहा, "पिछले 10 वर्षों में मैंने घाटों को इतना साफ़ नहीं देखा. ख़ासतौर से सीढ़ियों पर बारिश के बाद जमी हुई गंदगी अब बहुत कम हो गई है, क्योंकि लोग अब जागरूक हैं."

लेकिन हकीक़त ये भी है कि अभी भी गंगा नदी के घाटों पर एक तरफ जहाँ बच्चे तैर रहे होते हैं तो दूसरी तरफ़ दर्जनों भैंसें उसी पानी में गर्मी से राहत ले रही होतीं हैं.

इस मंज़र को देख लगता है कि वादों और फ़ोटो ऑपरच्यूनिटी के बजाय तेमुसतुला और दर्शिका जैसों की सख़्त ज़रूरत है बनारस और उसके घाटों को.

खुद नरेंद्र मोदी ने चंद महीने पहले ट्वीट के ज़रिए इन युवतियों के काम की प्रशंसा की थी.

लेकिन आज भी सहयोग और समर्थन को तरसती इन युवतियों के चेहरे पर ख़ुशी लाने के लिए ये कहना भर काफ़ी होता है कि, "ये घाट तो अब चमक उठा है".

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