माओवादी होना कोई गुनाह नहीं: कोर्ट

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केरल के उच्च न्यायालय ने एक अहम फ़ैसले में कहा है कि माओवादी होना कोई गुनाह नहीं है और सिर्फ़ माओवादी होने भर से किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं भेजा जा सकता.

जस्टिस ए मुस्ताक़ ने अपने फ़ैसले में कहा, “हालाँकि माओवादियों की राजनीतिक विचारधारा संवैधानिक राज्य व्यवस्था से मेल नहीं खाती, लेकिन माओवादी होना कोई अपराध नहीं है.”

अदालत ने कहा, “स्वतंत्रता तब अवैध होती है, जब इसका टकराव देश के क़ानून से होता है.”

अहम फ़ैसला

न्यायाधीश ने कहा कि पुलिस किसी व्यक्ति को सिर्फ़ इसलिए हिरासत में नहीं ले सकती कि वह माओवादी है, जब तक कि वे उसे ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों में संलिप्त न पाएं.

अदालत ने यह फ़ैसला श्याम बालाकृष्णन की याचिका पर दिया, जिसे माओवादी होने के संदेह में हिरासत में लिया गया था.

बालाकृष्णन के वकील संदेश राजा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "पुलिस बालाकृष्णन के ख़िलाफ़ कागज का एक पुर्जा भी हासिल नहीं कर सकी कि उनका संबंध उग्रवादी संगठन या ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों में शामिल संगठन से था."

उन्होंने बताया, "बालाकृष्णन को पिछले साल 20 मई को पुलिस ने तब हिरासत में लिया था, जब वह अपने एक दोस्त की मोटरसाइकिल चला रहे थे. उन पर एक माओवादी की मोटरसाइकिल चलाने का आरोप था. लगभग 25 पुलिसकर्मी उन्हें अपने साथ उनके घर ले गए थे, जहाँ बिना वारंट के आठ घंटे तक उनके घर की तलाशी ली गई."

वकील ने कहा, "बालाकृष्णन का माओवाद से कुछ लेना-देना नहीं है. वो लंबे बाल और दाढ़ी रखते हैं और कंधे पर झोला लटकाते हैं."

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अदालत ने बालाकृष्णन को एक लाख रुपए बतौर मुआवजा और याचिका खर्च के रूप में दस हज़ार रुपए देने के भी आदेश दिए.

हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के बेटे बालाकृष्णन को पिछले साल मई में कुछ घंटों के लिए हिरासत में लिया गया था और बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.

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