'साड्डा रिची बना अमरीका दा राजदूत'

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भारत में अमरीका के नए राजदूत राहुल रिचर्ड वर्मा जब अपने पुश्तैनी शहर जालंधर पहुंचे तो उनके और उनके बचपन के दोस्तों की मानों बिन मांगी मुराद पूरी हो गई.

रिचर्ड के माता-पिता 1960 के दशक में ही अमरीका में जाकर बस गए थे. 1974 में राहुल रिचर्ड वर्मा छह साल के थे, जब वो एक बार भारत आए थे.

अब 41 साल बाद जब वो जालंधर के शेख बस्ती मोहल्ले में अपनी नानी का पुराना घर देखने पहुंचे, तो उनके बचपन की यादें ताज़ा हो गईं.

नानी के पुश्तैनी घर पर वो क़रीब आधा घंटा रहे. हालांकि यह घर काफ़ी पहले बेच दिया गया था.

पुराने घर और इन गलियों के देखकर वो भावुक हुए बिना नहीं रह पाए.

लेकिन सबसे अधिक खुशी उनके दोस्तों को थी. उनका परंपरागत पंजाबी तरीक़े से स्वागत किया गया.

'अलग अनुभव'

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अनिल कुमार उर्फ टोनी से मिलने रिचर्ड उनके घर गए. अनिल की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. वो लोगों को बता रहे थे, "साड्डा रिची अमरीका दा राजदूत बन गया है."

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, “यह यात्रा मेरे लिए काफ़ी भावनात्मक है. अपनी मां, पिता, नानी, भाईयों और बहनों से जुड़ी बातें बताने वाले लोगों से मिलना अपने आप में एक अलग अनुभव है.”

रिचर्ड अपने साथ एक अनुवादक मंदीप को भी लेकर आए थे जो लोगों के साथ उनके संवाद को सहज बना रहे थे.

रिचर्ड हरिमंदिर साहिब भी गए और वहां लंगर हाल में जाकर सब्ज़ी बनाने की सेवा दी.

शिक्षा की कुंजी

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इसके बाद उन्होंने जलियां वाला बाग़ में शहीदों को श्रद्धांजलि दी और फिर खालसा कॉलेज में लोकनृत्य भांगड़ा में भी शिरकत की.

रिचर्ड ने बच्चों को खूब पड़ने की नसीहत दी.

उन्होंने कहा, “मेरे पिता स्कूल जाने वाले अपने मोहल्ले के पहले व्यक्ति थे, मेरी मां उस समय स्कूल गईं जब लड़कियां बाहर नहीं निकलती थीं और जब कुछएक महिलाएं ही पढ़ा करती थीं तब मेरी नानी ने कॉलेज में पढ़ाई की थी. इसलिए शिक्षा की कुंजी है.”

उनका कहना था, “यह एक मेरी भावनात्मक यात्रा थी, जहाँ मैं अपनी जड़ों को पहचान पाया. मेरे लिए ये ख़ुशी के पल थे.”

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