डिजिटल रनवे से गांवों का टेकऑफ़

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

मुझे याद है जब करीब दस साल पहले मेरे माता-पिता ने मुझे कंप्यूटर दिलवाया था तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दिल्ली के उस ‘इलीट क्लब’ का हिस्सा बन गई थी जिसे एक बटन के क्लिक से दुनिया से जुड़ने का भाग्य प्राप्त है.

गर्मियों की छुट्टियों में गांव से जब मेरे चचेरे और ममेरे भाई-बहन आते तो कंप्यूटर देख कर उनकी आंखों में एक ललक सी जाग जाती थी.

नई तकनीक का उन्हें इस कद्र शौक था कि छुट्टियां ख़त्म होने के बाद बुआ को उन्हें ज़बर्दस्ती वापस ले जाना पड़ता था. आखिर दिल्ली में ही उन्हें ऐसी चीज़ें देखने को जो मिलती थीं.

लेकिन अब समय बदल गया है. आज गांव में रहते हुए भी उनके पास पर्सनल लैपटॉप हैं. हालांकि वहां ब्रॉडबैन्ड इंटरनेट स्पीड कुछ ख़ास नहीं है.

ग्रामीण और शहरी भारत के बीच के डिजिटल फ़ासले का जायज़ा लेने के लिए मैंने भारत के तीन राज्यों का दौरा किया – राजस्थान का चंदौली गांव, केरल का इड्डुकी ज़िला और मध्य प्रदेश का चंदेरी कस्बा.

इन यात्राओं के दौरान जो मैंने देखा और पाया, उससे मेरा पूर्वाग्रह दूर हो गया.

बदल रहे हैं गांव

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

दिल्ली से राजस्थान की ओर बढ़ते हुए सीमा पर पहले तो ऊंची-ऊंची कॉरपोरेट इमारतें दिखाई देती हैं और फिर उसके कुछ ही किलोमीटर बाद खेतों के बीच खड़े कच्चे मकान.

गांव की इस मूक सी तस्वीर को देख कर ये नहीं लगता कि यहां इंटरनेट के बारे में किसी को पता भी होगा.

लेकिन मैं ही शायद अब भी दस साल पहले की दुनिया में जी रही थी. अलवर के चंदौली गांव में जाकर पता चला कि यहां तो बच्चा-बच्चा इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन्स के बारे में जानता है.

10 से 15 साल के बच्चों का आत्मविश्वास भरा कंप्यूटर और इंटरनेट ज्ञान देख कर मुझे एहसास हुआ कि इस उम्र में इतना आत्मविश्वास तो मुझे शहरों में रह कर भी नहीं मिल पाया था.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

जब गांव के बच्चों को इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर, जी-मेल और यू-ट्यूब जैसी ऐपलिकेशन्स इस्तेमाल करते हुए देखा तो आभास हुआ कि ग्रामीण भारत का भविष्य कितना अलग होने जा रहा है.

मामूली योग्यता

वहीं केरल के इड्डुकी ज़िले के एक छोटे से गांव में एक अनपढ़ आदिवासी ने जब मेरे आई-फ़ोन पर गूगल मैप्स चला कर दिखाया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि स्मार्टफ़ोन के इस्तेमाल के बारे में लोग ख़ुद ही अपने आप को शिक्षित कर रहे हैं.

मध्य-प्रदेश के चंदेरी में जहां कुछ सालों पहले बुनकर अपना अस्तित्व खो चुके थे, आज वही बुनकर फ़ेसबुक और व्हट्सऐप के ज़रिए ऑनलाइन साड़ियां बेच रहे हैं और खूब मुनाफ़ा कमा रहे हैं.

और फिर गांवों के ऐसे नौजवानों से भी मिली जो ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं और इसे एक बेहद मामूली योग्यता मानते हैं.

भविष्य कैसा होगा

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

भारत की आधी से ज़्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और जैसे-जैसे इस आबादी में स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल बढ़ रहा है वैसे ही उनकी उम्मीदें भी बढ़ रही हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गांवों में मुफ़्त इंटरनेट पहुंचाने के वायदे को ग्रामीण भारत बहुत गंभीरता से ले रहा है. गांववासी चाहते हैं कि गांवों और शहरों के बीच का डिजिटल भेदभाव अब ख़त्म हो.

गांवों में इंटरनेट की भूख तो बहुत है लेकिन उस भूख को मिटाने के लिए व्यवस्था पुख़्ता नहीं है.

लेकिन फिर एक नौजवान लड़की पूछती है, "इंटरनेट तो आ ही जाएगा गांव में, लेकिन गांव वालों की सोच कौन बदलेगा? यहां तो हम लड़कियों के फ़ेसबुक अकाउंट खोलने पर ही बवाल मच जाता है."

इस पूरे हफ़्ते ग्रामीण डिजिटल भारत सीरीज़ में कुछ दिलचस्प महत्वकांक्षाओं से भरी कहानियां हम आप तक लेकर आएंगे. कहानियों पर हमें अपनी प्रतिक्रियाएं ज़रूर भेजिएगा.

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