भारत में पार्ट टाइम जॉब का 'सच'

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दि इकोनॉमिस्ट में छपे एक लेख में कहा गया है कि हॉलैंड के लोगों की उच्च गुणवत्ता वाली जीवनशैली और अच्छा व्यवहार उनके आराम से काम करने की वजह से है.

हॉलैंड की आधे से ज़्यादा आबादी अंशकालिक (पार्ट टाइम) काम करती है और यह किसी भी दूसरे विकसित देश के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा है.

इस लेख के अनुसार, "यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में काम करने योग्य आबादी का औसतन 20 फ़ीसदी ही अंशकालिक काम करता है (8.7 फ़ीसदी पुरुष और 32.2 फ़ीसदी महिलाएं), जबकि हॉलैंड में 26.8 प्रतिशत पुरुष और 76.6 प्रतिशत महिलाएं एक हफ़्ते में 36 घंटे से कम काम करते हैं."

यह लेख पढ़ने के बाद मैंने सोचा, और भारत में. मैं भारत में बेरोज़गारी की दर की बात नहीं करूंगा- बताया जा रहा है कि हाल की सालों में यह पांच फ़ीसदी तक ही रह गई है, लेकिन मुझे इस पर यकीन करना मुश्किल होता है.

'महिलाएं काम नहीं करतीं'

मुझे तो भारत में हज़ारों लोग बेरोज़गार या आधे-अधूरे रोज़गार वाले लगते हैं. और तो और जो लोग काग़ज़ों पर पूर्णकालिक काम कर रहे हैं- या अपने पारिवारिक व्यवसाय के चलते, कथित स्व-रोजगार कर रहे हैं- इनमें से बहुत से यूरोप के सोशल डेमोक्रेटिक देशों में बेरोज़गार ही माने जाएंगे.

ज़ाहिर है तथ्यों और आंकड़ों में फ़र्क है और सभी भारतीय सरकारें (चाहे वह किसी भी पार्टी की हों) इस फ़र्क का फ़ायदा उठाने की कोशिश करती हैं.

तो, भारत में पूर्णकालिक रोज़गार की बात करना आसान नहीं. जानकारियां अस्पष्ट हैं और हक़ीक़त बहुत भारी. लेकिन भारत में अंशकालिक नौकरियों की क्या स्थिति है, ख़ासकर महिलाओं के मामलों में?

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मैंने तय किया कि कुछ भारतीय परिचितों से इस बारे में पूछूंगा और मैं उनके जवाबों से चकित रह गया.

इनमें से एक ने मुझे अपने घर बुलाया, जहां उनकी कामवाली हमारे लिए चाय और समोसे लेकर आई.

मैंने उनकी ओर देखा, उनकी कामवाली की ओर देखा. मुझे लगा कि न तो वह बहुत पढ़ी-लिखी थी और न ही मध्यवर्गीय- फिर भी वह सचमुच काम कर रही थी.

सिर्फ़ यही नहीं, जब मैंने उनसे पूछा तो पता चला कि वह अंशकालिक रूप से काम कर रही थीं और पांच अलग-अलग घरों में काम करती थी.

काम ज़्यादा, कम नहीं

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लेकिन मेरे दोस्त की प्रतिक्रिया असामान्य नहीं थी. ज़्यादातर मध्यवर्गीय भारतीयों को पूरे भारत में काम करती हुईं महिलाएं नज़र नहीं आतीं और मध्यवर्ग और उच्च वर्ग के बाहर तो बिल्कुल नहीं.

ठीक वैसे ही, जैसे कि उन्हें कुछ भारतीय महिलाएं- सिर्फ़ 'पश्चिमी रंग-ढंग वाली' ही नहीं- धूम्रपान करती (सिगरेट नहीं तो बीड़ी पीती) नहीं दिखतीं.

इसके बजाय अपने फ्लैट्स में बंद यह टिप्पणी करते रहते हैं कि भारतीय महिलाएं काम नहीं करतीं या धूम्रपान नहीं करतीं, आदि- और तो और कभी-कभी वे इसी तरह की अनदेखी राजनीतिक करियर को लेकर भी कर देते हैं.

दरअसल, हॉलैंड के विपरीत भारत में अंशकालिक रूप से काम करना सचमुच संभव नहीं है- और अगर है भी तो सिर्फ़ उच्च सुविधाप्राप्त वर्ग के लिए ही.

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भारत में ज़्यादातर वेतन और आय (सिर्फ़ किसानों और मज़दूरों की ही नहीं, बल्कि तनख्वाह पाने वाले निम्न मध्यवर्गीय लोगों की भी) सलीके से मध्यवर्गीय जीवन बिताने के लिहाज से बहुत कम है.

जब आम भारतीय अंशकालिक रूप से काम करते हैं तो वह काम ज़्यादा करते हैं- कम नहीं.

हॉलैंड के लिए जो सच है वह भारत के लिए नहीं. दरअसल भारत में सुविधाप्राप्त वर्ग के लिए जो सच है, वह बाकी के देश के लिए नहीं.

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