मोदी, शाह और जेटली की तिकड़ी का राज़

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कुछ राजनीतिक साझेदारियां विशुद्ध रूप से रणनीतिक होती हैं, कुछ अल्पकालिक और कुछ भाग्य के उलटफेर से चलती हैं.

नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली के बीच का रिश्ता तीसरी श्रेणी में आता है.

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे अरूण शौरी मानते हैं कि मोदी, शाह और जेटली की तिकड़ी ही देश और बीजेपी की सरकार को चला रही है. शौरी उसी धारणा की बात कर रहे हैं जो बीजेपी और सरकार में नीचे से ऊपर तक है.

मोदी का जेटली के साथ रिश्ता तब से है जब नब्बे के दशक में गुजरात बीजेपी की कार्यकारिणी के सदस्य मोदी दिल्ली में पहुँच बनाने की कोशिश कर रहे थे.

मजबूत दाव

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राष्ट्रीय राजधानी की साज़िशों से भरी भूलभुलैया को पार करने के लिए दिल्ली की छात्र राजनीति से बीजेपी में आए अरुण जेटली ही मोदी का सबसे मज़बूत दाव थे.

उस समय बीजेपी के सुप्रीमो रहे लालकृष्ण आडवाणी ने जो संस्थागत ढांचा बुना था सौम्य और मुखर जेटली उसके अहम सदस्य थे और सभी बारीकियों को भलीभांति समझते थे.

नरेंद्र मोदी गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले लंबे वक़्त तक इस समूह से बाहर रहे. जेटली ने मोदी के अभिषेक में अहम भूमिका निभाई और नरेंद्र मोदी इस बात को कभी भूले नहीं.

2002 में जब गुजरात में दंगे हुए तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे. तब जेटली ने ही समूची बीजेपी को मोदी के समर्थन में खड़ा कर दिया और प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्रा की मदद से वाजपेयी की पैंतरेबाज़ी को नाकाम कर दिया.

मोदी के सामने जब ख़ुद को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार साबित करने की सबसे बड़ी चुनौती थी तब दिल्ली में जेटली ही उनके सबसे बड़े समर्थक थे. जेटली ने मोदी के पक्ष में खड़े होने के लिए अपने गुरु आडवाणी से भी रिश्ते ख़राब कर लिए. वो आरएसएस को भी मोदी के पक्ष में लाने में कामयाब रहे.

प्रगाढ़ रिश्ता

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मोदी और अमित शाह का रिश्ता अधिक प्रगाढ़ है क्योंकि यह उनके गृह राज्य गुजरात में पनपा है. शाह कभी भी मोदी के विपरीत सुर बजाने के भ्रम में नहीं रहे हैं.

शाह जब संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से बीजेपी में आए तब उनसे कई साल बड़े मोदी गुजरात बीजेपी में वरिष्ठ पद पर थे. गुजरात भाजपा के एक सूत्र के मुताबिक शाह हमेशा मोदी से मार्गदर्शन लेते रहे हैं.

जब भी गुटबाज़ी में घिरी गुजरात बीजेपी में कोई आंतरिक संकट आया, शाह सावधानीपूर्वक नरेंद्र मोदी के साथ खड़े रहे.

फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामले में फँसे अमित शाह को जब अदालती कार्रवाई का सामना करना पड़ा तब भी वे ख़ामोश ही रहे.

गुजरात के एक बीजेपी सांसद कहते हैं, "वे बिना कुछ बोले जेल चले गए. अपना मंत्री पद छोड़ दिया. कई महीनों तक गुजरात से बाहर रहे. 2012 में जब उन्हें एक नई सीट पर विधानसभा चुनाव लड़ना पड़ा तब उनके पास तैयारी के लिए सिर्फ़ पंद्रह दिन ही थे. लेकिन आख़िरी वक़्त में उन्होंने बेहद तेज़ काम किया. उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र की हर हाउसिंग सोसायटी में एक संयोजक बना दिया और दो लाख वोटों से जीते."

हालांकि 2014 आम चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद अमित शाह के ख़ूब सुर्खिया मिलीं लेकिन वो हार बात का श्रेय 'नरेंद्रभाई' को ही देते रहे.

एक सूत्र बताते हैं, "पहले दिन से ही अमित शाह ने साफ़ कर दिया था कि पार्टी और सरकार के बीच ज़बरदस्त समन्वय होगा लेकिन वो सरकार के मामलों से दूर रहकर पार्टी पर ही ध्यान केंद्रित रखेंगे. मोदी जी ने उन्हें साफ़-साफ समझाया है कि पार्टी को मज़बूती दें और विस्तार करें और बीजेपी के लिए अधिक से अधिक चुनाव जीतें."

दख़ल

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यदि ये रिश्ता अब तक इतना बेहतर चला है तो इसकी वजह यही है कि अमित शाह ने बीजेपी के मामलों में जेटली की दख़ल स्वीकार की है.

जेटली के कई ख़ास लोगों को पार्टी में अहम पद प्राप्त हैं. इनमें महासचिव भूपेंद्र यादव, राष्ट्रीय सचिव और मीडिया सेल के प्रभारी श्रीकांत शर्मा और पश्चिम बंगाल के प्रभारी सिद्धार्थ नाथ सिंह शामिल हैं.

पियूष गोयल, निर्मला सीतारमण और धर्मेंद्र प्रधान जैसे जेटली समर्थक मंत्रियों को बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में पार्टी के अहम काम भी मिले हैं.

ऐसा भी नहीं है कि शाह ने ख़ुद को सरकार से पूरी तरह दूर कर लिया हो.

जब मोदी ने सरकार का एक साल पूरा करने पर बड़े आयोजन करने का फ़ैसला किया तो अमित शाह ने ही चुनिंदा पत्रकारों और स्तंभकारों से विशेष वार्ता कर अहम उपलब्धियां गिनाईं.

इसके बाद ये अहम बिंदू अन्य मंत्रियों और पार्टी पदाधिकारियों से साझा किए गए ताक़ि सभी एक ही बात बोलें.

जब सरकार भूमि अधिग्रहण बिल पर विपक्ष और कांग्रेस के हमलों में घिरी थी तब इससे पार्टी के भीतर, संघ परिवार के साथ और देशभर में हुए राजनीतिक नुक़सान को रोकने के लिए मोदी ने शाह की ही सेवाएं ली.

उनसे इस विवादित बिल पर सरकार के रूख को स्पष्ट करने और देश भर से प्रतिक्रियाएं लेने के लिए कहा गया. अमित शाह से मिली सलाह के आधार पर ही सरकार ने विधेयक में नौ संसोधन पेश किए.

अहम भूमिका

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वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने बीजेपी को एक ग़ैर ज़रूरी ज़िम्मेदारी समझ लिया था. लेकिन पूर्व संघ प्रचारक मोदी के साथ ऐसा नहीं है. उन्होंने चुनाव जीतने और राजनीतिक संदेश देने में पार्टी कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका को स्वीकारा है.

वे राजनीतिक संदेश देने में कार्यकर्ताओं की भूमिका को मंत्रियों की प्रेस वार्ताओं और पीआईबी से अधिक प्रभावी मानते हैं. इसलिए अभी और भविष्य में भी अमित शाह उनके अहम सहयोगी बने रहेंगे. भले ही वो एक कनिष्ठ सहयोगी ही क्यों ना हों.

लेकिन सरकार और पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण तो स्वयं जीते जी किवदंती बन गए नरेंद्र मोदी का ही है.

वे जेटली और शाह को कभी यह नहीं भूलने देंगे कि असली ताक़त किसके पास है. इसलिए भले ही अरुण जेटली सरकार को आर्थिक मामलों में 'बाज़ारवाद' की ओर ले जाने की कोशिश करें, नरेंद्र मोदी सामाजिक क्षेत्र को अधिक अहमियत देकर संतुलन बनाए रखेंगे.

उन्होंने स्वयं को निर्माता और रक्षक की भूमिका दे रखी है. ये देखना बाक़ी है कि इस तिकड़ी में विनाशक की भूमिका में कौन है.

( बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त की बातचीत पर आधारित )

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