'माओवादी होना अपराध नहीं' लेकिन ...

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केरल हाईकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में शुक्रवार को कहा कि माओवादी होना अपराध नहीं है और किसी को सिर्फ़ इसलिए गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता.

पर ऐसे कई लोग हैं जिन्हें इसलिए गिरफ़्तार किया गया क्योंकि उनपर माओवादी होने का 'शक़' था.

झारखंड के डीजीपी राजीव कुमार लंबे समय तक नक्सल-प्रभावित इलाक़ों में काम करते रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि,''अगर कोई व्यक्ति किसी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य है, पुलिस के पास इसके साक्ष्य मौजूद हैं तो ये एक संज्ञेय अपराध है और उसे गिरफ़्तार किया जा सकता है.''

उनके मुताबिक़, माओवादी संगठन से ताल्लुक़ रखनेवाले किसी नेता का अगर किसी उग्रवादी घटना के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हाथ होता है तो कार्रवाई की जाती है.

मुश्किल जमानत

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Image caption पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों को 'देश की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती' कहा था.

माओवादी होने के आरोप में गिरफ़्तार किए गए कई मामलों में सालों तक ज़मानत नहीं दी जाती और कई में लंबी तहक़ीक़ात के बाद भी कुछ साबित नहीं होता और अभियुक्त सालों तक जेल में रहने के बाद बरी हो जाते हैं.

वरिष्ठ वक़ील प्रशांत भूषण ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''एक तो अदालतों में धनी और प्रभावशाली लोगों के पक्ष में अलग व्यवहार किया जाता है और दूसरा माओवादियों के ख़िलाफ़ सोच बनी हुई है. अगर किसी व्यक्ति पर माओवादी होने या माओवादी संगठन से संबंध रखने का आरोप लगता है तो उन्हें अदालतें ज़मानत नहीं देतीं.''

दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा को माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में महाराष्ट्र पुलिस ने मई 2014 में गिरफ़्तार किया था. एक साल से उन्हें ज़मानत नहीं मिली है.

फैसला जज के विवेक पर

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Image caption दिल्ली विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों ने जीएन साईंबाबा को ज़मानत दिए जाने की अपील की है.

ज़मानत देना जज के विवेक पर निर्भर है. लेकिन मानवाधिकार वकील रेबेका मेमन जॉन बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट के तय किए क़ायदे के मुताबिक़, ''मुकदमा चलने के दौरान, ज़मानत देना सिद्धांत है और जेल में रखना अपवाद है.''

इस क़ायदे के मुताबिक़, सब मामलों में ज़मानत दी जानी चाहिए, सिवाय उनके जिनमें अभियुक्त के फ़रार होने की आशंका हो या जिनपर छोड़ दिए जाने के बाद फिर से अपराध करने का शक़ हो.

प्रोफ़ेसर साईंबाबा व्हीलचेयर का इस्तेमाल करते हैं और उनके शरीर का 80 प्रतिशत हिस्सा काम नहीं करता है.

रेबेका मेमन जॉन के मुताबिक़, सीआरपीसी की धारा 437 अदालत को ये हक़ देती है कि अगर कोई असाधारण वजह ना हो तो वो किसी बुज़ुर्ग, महिला, बीमार या विकलांग व्यक्ति की सेहत को ध्यान में रखते हुए ज़मानत दे सकती है.

वो कहती हैं, ''न्यायपालिका में कई जजों के अपने पूर्वाग्रह होते हैं और वो उन लोगों के ख़िलाफ़ काम करते हैं जो अलग राजनीतिक सोच रखते हैं, जो अलग भाषा बोलते हैं और जो असहमति की आवाज़ उठाते हैं.''

'गांधी साहित्य रखने से गांधीवादी नहीं'

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Image caption बिनायक सेन को गांधी इंटरनेश्नल पीस प्राइज़ के अलावा कई दूसरे मानवाधिकार पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

केरल उच्च न्यायालय के फ़ैसले के पहले भी अदालत ने माओवादी होने के आरोप भर पर किसी व्यक्ति के गिरफ़्तार किए जाने पर आपत्ति जताई थी.

मामला डॉक्टर बिनायक सेन की ज़मानत की सुनवाई का था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ''हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं. डॉ. सेन सहानुभूति रख सकते हैं, पर इससे वो देशद्रोह के दोषी नहीं माने जा सकते. अगर महात्मा गांधी की आत्मकथा किसी के घर में मिले तो क्या उसे गांधीवादी मान लिया जाए? सिर्फ साहित्य या कागज़ किसी के पास होना काफ़ी नहीं है, देशद्रोह का मामला तभी बनता है जब आप ये दिखा सकें कि वो सक्रिय रूप से माओवादियों की मदद कर रहे थे.''

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छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में काम करने वाले डॉ. सेन को मई 2007 में देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

मुक़दमे की सुनवाई के दौरान डॉ. सेन दो साल तक जेल में रहे.

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने दिसंबर 2010 में डॉक्टर बिनायक सेन को दोषी पाया और उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.

अप्रैल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपील की सुनवाई होने तक ज़मानत दे दी.

संविधान ने दी सोच की आज़ादी

Image caption ज़मानत मिलने के बाद सोनी सोरी ने आम आदमी पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा पर हार गईं.

छत्तीसगढ़ के एक स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका सोनी सोरी अक्तूबर 2011 में गिरफ़्तार की गई थीं. उनपर माओवादियों को पैसे पहुंचाने समेत कई आरोप लगाए गए थे.

उनपर दायर किए गए आठ में से सात मामलों में वो बरी हो गईं. लेकिन जेल में बिताए इस समय के दौरान उन्होंने इलाक़े के एसपी पर उनके साथ यौन हिंसा के आरोप लगाए.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कोलकाता में करवाई गई मेडिकल जांच में उनके गुप्तांगों में पत्थर डाले जाने की पुष्टि भी हुई.

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सोनी सोरी पर लगाए गए आखिरी आरोप में सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2013 में उन्हें ज़मानत दे दी. सोनी सोरी की ज़मानत के लिए महिला आंदोलनकारियों ने लंबे समय तक याचिकाएं डालीं और अपील की.

माओवादी होने के आरोप में गिरफ़्तार किए जानेवाले चर्चित नामों में कोबाद गांधी भी हैं. उन्हें मई 2009 में गिरफ़्तार किया गया था.

गांधी पर भाषण देने और पब्लिसिटी के पर्चे बांटने जैसे आरोप हैं, पर हिंसा करने के नहीं. छह साल बाद भी उन्हें ज़मानत नहीं दी गई है.

प्रशांत भूषण कहते हैं, ''संविधान हमें सोचने, बोलने और संगठनों का हिस्सा बनने की आज़ादी देता है. सिर्फ सदस्य बनना अपराध नहीं है और हमारी अदालतों को ये समझना पड़ेगा.''

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