पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल बनने का मानोबी का सफ़र

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Image caption मानोबी बंद्योपाध्याय भारत की पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल होंगी.

पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर वूमेंस कॉलेज में एसोशियट प्रोफ़ेसर मानोबी बंद्योपाध्याय किसी भी भारतीय कॉलेज की प्रिंसिपल बनने वाली पहली ट्रांसजेंडर होंगी.

इस कॉलेज में विज्ञान और मानिविकी की स्नातक स्तर की पढ़ाई होती है. पिछले 20 साल से यहाँ पढ़ा रही मानोबी जून में अपना नया पद ग्रहण करेंगी.

इस मौके पर बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य ने की मानोबी से ख़ास बातचीत.

पढ़ें बातचीत के चुनिंदा अंश

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आपके कॉलेज में पहले आप को हटाने का प्रयास किया गया था और अब आप उसी कॉलेज की प्रिंसिपल बन गई हैं?

मैंने जब साल 2003 में लिंग परिवर्तन का ऑपरेशन करवाया तभी से मुझे हटाने के प्रयास किए गए. अभी भी मेरे खिलाफ़ ऐसे प्रयास जारी थे. ये तो सुप्रीम कोर्ट ने हम लोगों को कानूनी तौर पर पहचान दी, तो ये सब बदलाव हुआ.

पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल बनने के बाद आप किस तरह की चुनौती महसूस कर रही हैं?

जैसे किसी आम व्यक्ति को ऐसी ज़िम्मेदारी का दबाव महसूस होता, वैसा ही मुझे भी हो रहा है. मैं चाहती हूं कि मैं शिक्षा को ज़्यादा से ज़्यादा ट्रांसजेंडर लोगों तक पहुंचाऊं क्योंकि इस अधिकार से वो अक्सर वंचित रह जाते हैं.

एक ट्रांसजेंडर टीचर के रूप में छात्रों के साथ आपका क्या अनुभव रहा है?

छात्रों ने हमेशा मुझे बहुत बहुत प्यार दिया. कभी भी मेरे साथ उनका कोई अलग व्यवहार नहीं रहा. ये कुछ अध्यापक ही हैं जो शिक्षित होने के बावजूद सोचते हैं कि एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति अध्यापक नहीं हो सकता. वो तो मुझे कहते थे कि मेरी जगह सड़क पर भीख मांगने और बच्चों के जन्म के मौके पर नाचने-गाने की ही है.

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लिंग परिवर्तन के ऑपरेशन के बाद से अब तक आपका क्या अनुभव रहा है? क्या आप अपने जीवन में आए इस बदलाव से खुश हैं?

मैं खुश हूँ. मेरी आत्मा जो चाहती थी वो मुझे मिल गया. पहले मेरी आत्मा स्त्री की थी और शरीर पुरुष का, अब मेरी आत्मा और शरीर दोनों एक हो गए हैं. अब तो स्त्री बने हुए मुझे 12 साल हो चुके हैं.

भारत में लिंग परिवर्तन कराने वालों के लिए किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

सबसे बड़ी चुनौती परिवार से होती है. परिवार समाज की एक इकाई है. परिवारवालों को समाज में बोला जाता है कि ये बच्चा तो हिजड़ा है, ये है...वो है...इसे बाहर वालों को दे दो.

ऐसे में बच्चों को अक्सर परिवार छोड़ना पड़ता है और वो स्कूल-शिक्षा से भी महरूम हो जाते हैं. इसीलिए उनकी ज़िन्दगी इतनी सीमित हो जाती है.

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आपने लिंग परिवर्तन कराने के बाद अपना नाम सोमनाथ से बदलकर मानोबी रखा, क्यों?

इसका अर्थ है कि हम सभी मनुष्य हैं. मनुष्य केवल पुरुष नहीं होता...बंगाली में मानबी का मतलब मानवता से है, इसलिए मैंने ये नाम चुना.

आप अध्यापन के अलावा किन चीज़ों में रुचि रखती हैं?

हमारा एक ग्रुप थिएटर है जिनमें मैं अभिनय करती हूँ. मैं स्क्रिप्ट भी लिखती हूं. मैंने दो किताबें लिखी हैं, पीएचडी की है. शास्त्रीय नृत्य में भी पारंगत हूं. अध्यापन, नाटक, अभिनय लेखन सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और मुझे ये सब हिम्मत औऱ रस देते हैं.

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