ध्रुपद की परंपरा बढ़ाते गुंदेचा बंधु

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ध्रुपद शास्त्रीय संगीत की समृद्ध गायन शैली को बचाने और आगे बढ़ाने में डागर घराने की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

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Image caption रमाकांत गुंदेचा(बाएँ) और उमाकांत गुंदेचा(दाएँ) ध्रुपद गायकी के प्रमुख नाम हैं.

इसी घराने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं उमाकांत व रमाकांत गुंदेचा.

नाट्यशास्त्र के अनुसार वर्ण, अलंकार, गान-क्रिया, यति, वाणी, लय आदि जहां परस्पर सम्बद्ध रहें, उन गीतों को ध्रुव कहा गया है. जिन पदों में यह नियम शामिल हों उन्हें ध्रुवपद या ध्रुपद कहा जाता है.

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Image caption रमाकांत गुंदेचा अपने शिष्य को रियाज़ करवाते हुए.

रमाकांत गुंदेचा बताते हैं, "ध्रुपद संस्कृति के शास्त्रों पर आधारित गायकी है, जिसे हम आज की भाषा में शास्त्रीय संगीत कहते हैं. उसे पहले मार्गीय संगीत कहा जाता था."

रमाकांत कहते हैं, "डागर घराने ने संगीत, राग व स्वर क्या है, संगीत का उद्देश्य क्या है?, इस पर अनुसंधान किया. ध्रुपद गायकी को संरक्षित करने में डागर घराने ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अन्य शैलियां उतनी प्रमुखता के साथ आम जन में अपनी जगह नहीं बना पाईं."

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Image caption उमाकांत व रमाकांत गुंदेचा ने ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर(दाएँ तस्वीर में) से ध्रुपद गायकी की बारीकियां सीखीं.

उमाकांत गुंदेचा और रमाकांत गुंदेचा ने ध्रुपद गायकी में देश-विदेश में एक नई मिसाल खड़ी कर दी है.

ध्रुपद शैली को आगे ले जाने व उसके संरक्षण हेतु गुंडेचा बंधुओं ने अपने कई शिष्यों को तैयार किया है, जो इस सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएंगे.

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Image caption गुरुकुल में सभी शिष्यों को अपना काम स्वयं करना होता है.

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में गुंदेचा बंधुओं ने गुरु-शिष्य परंपरा के तहत 4 नवंबर 2004 में ध्रुपद गुरुकुल की स्थापना की.

पंडित भीमसेन जोशी ने इसका उद्घाटन किया.

तीन एकड़ के दायरे में फैले इस गुरुकुल के दरवाजे दुनिया के हर संगीत प्रेमी के लिए खुले हुए हैं.

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गुरुकुल की स्थापना के पीछे उद्देश्य को बताते हुए उमाकांत कहते हैं, "गुरुकुल की स्थापना का बीज हमारे मन में तभी से पड़ चुका था, जब हम उस्ताद ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर व मोहिउद्दीन डागर से ध्रुपद की शिक्षा ले रहे थे."

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Image caption ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर 'डागर परिवार' की शास्त्रीय संगीत परंपरा की 19वीं पीढ़ी के प्रतिनिधि थे.

उमाकांत बताते हैं, "हम चाहते थे कि जिन कठिनाइयों से जूझते हुए हमारा समय और ऊर्जा नष्ट हुई, उसका सामना अन्य विद्यार्थियों को न करना पड़े."

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Image caption गुरुकुल में विदेशी छात्र भी शिक्षा लेने आते हैं. बांग्लादेश से आया एक छात्र.

उमाकांत कहते हैं कि अपने गुरु से सीखते हुए उन्हें इस बात का भी एहसास हुआ की संगीत सीखने के अलावा जानकारी के लिए पुस्तकों का होना भी आवश्यक है.

इसलिए उन्होंने गुरुकुल में पुस्तकालय भी बनाया जिसमें संगीत से संबंधित हर तरह की पुस्तक सम्मिलित है.

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पुस्तकों के अलावा ऑडियो-वीडियो लाइब्रेरी की व्यवस्था भी गुरुकुल में रखी गई है. ताकि विद्यार्थियों को हर तरह से सीखने और समझने का मौका मिले.

साल 2012 में उमाकांत गुंदेचा और रमाकांत गुंदेचा को ध्रुपद में विशेष योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.

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