'शिक्षा नीति पर स्मृति ईरानी के दावे गलत'

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शिक्षा नीति को लेकर मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के दावों को लेकर शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल ने गंभीर सवाल उठाए हैं.

उन्होंने मोदी सरकार द्वारा शिक्षा बजट में हज़ारों करोड़ रुपए की कटौती को शिक्षा का बाज़ारीकरण बताया है.

अनिल सद्गोपाल ने शिक्षा के निजीकरण और बाज़ारीकरण में राज्य की भाजपा सरकारों के योगदान पर भी सवाल करते हुए कहा कि मोदी सरकार वो करने जा रही है जो पिछले साठ सालों में किसी सरकार ने नहीं किया.

पढ़ें, क्या कहते हैं अनिल सद्गोपाल

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मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने शुक्रवार को अपनी बातचीत में दो बातें कहीं जो सही नहीं थीं.

पहला ये कि मौजूदा शिक्षा नीति दिल्ली में बैठे चंद एक लोग बनाते हैं और पूरे देश के ऊपर थोप देते हैं. यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है.

1986 में शिक्षा नीति संसद में पारित हुई. इससे एक साल पहले 1985 में केंद्र सरकार ने ‘शिक्षा की चुनौती’ नाम से एक दस्तावेज़ तैयार कर पूरे देश के हायर सेकेण्डरी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को भेजा. इसमें बड़े पैमाने पर गांवों और कस्बों तक के लोगों ने हिस्सा लिया. तब जाकर इसके आधार पर एक नई शिक्षा नीति बनी.

दूसरा ये कि पिछले 20-22 सालों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. इससे बड़ी कोई भ्रामक बात नहीं हो सकती है.

पिछले 20-22 सालों में भारत की शिक्षा नीति वर्ल्ड बैंक, विश्व व्यापार संगठन और तमाम अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों के पास गिरवी रख दी गई और देश के संविधान से भटक गई.

इस सारी प्रक्रिया में अकेले कांग्रेस ही शामिल नहीं है, संसद में शामिल सभी पार्टियां इसमें हिस्सेदार रहीं. भाजपा ख़ुद इसमें हिस्सेदार रही.

शिक्षा बजट में कटौती

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और भाजपा की जिन राज्यों में सरकारें थीं, उनमें उन्होंने शिक्षा के निजीकरण, बाजारीकरण करवाने और उसे बिकाऊ माल के रूप में मुनाफ़ाखोरी का धंधा बना देने में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया. सब इसमें शामिल हुए.

पिछले एक साल में मोदी सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कोई अहम क़दम तो उठाया नहीं.

पिछली सरकारों ने शिक्षा के लिए जो निजीकरण का एजेंडा बनाया था उसे इस सरकार ने और तेज करने का काम किया है.

इसका सबसे बड़ा सबूत ये कि इस साल (2014-2015) जो बजट पेश किया गया था उसमें शिक्षा के बजट को 83 हज़ार करोड़ रुपये से घटाकर उसे 69 हज़ार करोड़ रुपए कर दिया गया, यानी 13,700 हज़ार करोड़ रुपए की कमी कर दी गई. कुल मिलाकर 16.5 प्रतिशत की कटौती.

हम पिछले सरकारों को इसलिए कोसते थे कि जितना बजट बढ़ाना चाहिए उतना वो बढ़ाते नहीं थे.

साठ साल के इतिहास में पहली बार ये हुआ है कि किसी सरकार ने शिक्षा का बजट बढ़ाने की बजाए घटा दिया.

एजेंडा निजीकरण

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कुल मिलाकर इस समय एजेंडा निजीकरण और बाज़ारीकरण का है और शिक्षा को मुनाफ़ाखोरी का धंधा बना देने का है.

और इस मामले में मोदी सरकार पिछली सरकारों को मात करने वाली है.

अभी मानव संसाधन मंत्री कहती हैं कि हम शिक्षा नीति पर लोगों से बात करेंगे लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों का एक एक्ट लगभग तैयार है और इस पर कोई बात करने को तैयार नहीं है.

पिछले साल बिना किसी से पूछे यूजीसी ने नौकरशाहों का तैयार किया हुआ नवीन पाठ्यक्रम सारे केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर थोप दिया. उनको आदेश दे दिया गया कि इसका पालन करो.

जो साठ सालों के इतिहास में नहीं हुआ, मोदी जी वो करवाने जा रहे हैं.

(शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल के साथ बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी की बातचीत के आधार पर)

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