'दिग्गज तिकड़ी' का बीसीसीआई कनेक्शन

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संन्यास ले चुके तीन दिग्गज बल्लेबाज़ों को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने बोर्ड से जुड़ने का प्रस्ताव दिया है तो इसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं?

सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण को दुनिया के सबसे अमीर और ताकतवर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का सलाहकार बनाया गया है.

इस फ़ैसले के बाद बीसीसीआई ने बयान दिया, "इन तीनों खिलाड़ियों का पहला काम होगा कि ये टीम को विदेशी धरती पर बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार करेंगे, हमारी क्रिकेट प्रतिभाओं को निखारेंगे और घरेलू क्रिकेट को बेहतर बनाने में मदद करेंगे."

लेकिन इसकी सफलता को लेकर अनिश्चितता की स्थिति है.

मक़सद

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बड़ी अजीब बात है कि इस घोषणा के बाद गांगुली ने कहा कि उन्हें उनकी भूमिका के बारे में कुछ भी नहीं पता.

इसका मतलब है कि खिलाड़ियों से इस फ़ैसले के पहले संपर्क भी नहीं किया गया और ना ही इसके पीछे कोई सोच थी, सिवाय इसके कि इन तीनों खिलाड़ियों को बीसीसीआई से जुड़ना चाहिए.

तो क्या चल रहा है अंदरखाने में? और फिर राहुल द्रविड़ के 'सलाहकार समिति' से जुड़ने से मना करने वाली उस रिपोर्ट के क्या मायने हैं?

इसके पीछे एक अटकलबाजी यह है कि द्रविड़ किसी भी उस चीज़ का हिस्सा नहीं बनना चाहते जिससे सौरव गांगुली जुड़े हों क्योंकि उनके बीच पुरानी प्रतिद्वंद्विता है.

मुझे इस पर यकीन नहीं. दूसरी अटकल यह लगाई जा रही है कि द्रविड़ अंडर-16, अंडर-19 और भारत 'ए' टीम के मेंटर के रूप में जिम्मेदारी संभालेंगे.

लेकिन अगर यह सच है तो फिर इसकी घोषणा क्यों नहीं हुई और ना ही इस संबंध में कुछ भी कहा गया.

पूर्व खिलाड़ी बिशन सिंह बेदी ने कहा कि वे नई समिति का मक़सद नहीं समझ पाए हैं.

अगर उनके जैसे लोगों को नहीं पता तो फिर किसे पता होगा?

पारदर्शिता का सवाल

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सच तो यह है कि बीसीसीआई पूर्व खिलाड़ियों को अपने साथ रखना चाहती है. कमेंटेटर होने के बावजूद सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री ने बोर्ड के साथ गुप्त तरीके से उन कामों के लिए करोड़ों रुपए के वार्षिक अनुबंध किए हैं जिनके बारे में बहुत कुछ साफ़ नहीं है.

जब कुछ अख़बारों ने इसका ख़ुलासा किया तो उनकी सफ़ाई कई लोगों के गले नहीं उतरी.

शास्त्री आज की तारीख़ में अनाधिकारिक रूप से बीसीसीआई के प्रवक्ता बने हुए हैं. वे कथित तौर पर एक निष्पक्ष कमेंटेटर और अब टीम निदेशक (एक नई जिम्मेदारी जो अभी तक अस्तित्व में नहीं थी) भी हैं.

बीसीसीआई इन चीजों में बिल्कुल रहस्यमयी है. एक छोटा सा समूह बीसीसीआई की सारी गतिविधियों को नियंत्रित करता है.

इसमें कुछ व्यवसायी, राजनेता और कुछ पूर्व क्रिकेटर हैं. लेकिन सवाल उठता है कि यह समूह इतना छोटा और रहस्यमयी क्यों है?

आशंकाएं

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इसका कारण यह है कि इसमें घपलों की भरमार है.

आईपीएल शुरू करने वाला भागा फिर रहा है, आईसीसी चेयरमैन का दामाद सट्टेबाजी के चक्कर में जेल की हवा खा चुका है, आईपीएल टीमों के मालिकाना हक़ और दूसरी बातों को लेकर गंभीर आरोप लगे हुए हैं और क्रिकेटर मैच फिक्सिंग के मामले में पकड़े जा रहे हैं.

कौन इस गंदगी को साफ़ करने जा रहा है?

जवाब है कोई नहीं. मैं स्वायत्ता का दावा करने वाली बीसीसीआई की किसी भी बात को लेकर तब संशकित हो जाता हूं जब वे खेल को सुधारने को लेकर कुछ करने का दावा करती है.

यह एक पैसा बनाने की मशीन है और सभी राजनेता जिसमें नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं, इस प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं. नरेंद्र मोदी गुजरात क्रिकेट बोर्ड के मुखिया रह चुके हैं.

दायरा

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बीसीसीआई का रिकॉर्ड नियम, क़ायदों और पारदर्शिता को लेकर बहुत ही ख़़राब रहा है ख़ासकर बात जब आईपीएल की होती है तो.

एक अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ "शायद ही इस नए पैनल को आईपीएल के बारे में अपनी राय देने को कहा जाएगा."

तो फिर ये सब किस लिए और क्यों? सचिन, सौरव और लक्ष्मण को बुलाया गया और द्रविड़ को दूर रखा गया?

मेरा आकलन है कि बीसीसीआई मानती है कि विश्वसनीय लोगों को अपने प्रभाव के दायरे से बाहर रखना ख़तरनाक है. वे इन जैसे खिलाड़ियों को अपने कुनबे से बाहर नहीं रखना चाहती.

बीसीसीआई इन हालात में सीनियर या जूनियर किसी भी टीम को बेहतर बनाने की सोच से प्रेरित नहीं है.

यह ख़ुद को बचाने का एक तरीका है. अगर बीसीसीआई ऐसे पूर्व खिलाड़ियों को जिम्मेवारी देने के लिए इतना व्याकुल ही है, जिन्हें खेल की अच्छी समझ हैं, तो सैयद किरमानी को यह शिकायत क्यों करनी पड़ी कि उन्हें नज़रअंदाज किया जाता रहा है.

दायित्व

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तेंदुलकर जैसे पूर्व खिलाड़ियों का मानना है कि बीसीसीआई को डर लगता है. अगर वे बोर्ड के अंदर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के ख़िलाफ़ बोलते हैं तो बीसीसीआई मुश्किल में फंस सकती हैं.

इसलिए बीसीसीआई उन्हें अपने साथ रखना चाहती है.

मैं मानता हूं कि द्रविड़ ने इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि वे बीसीसीआई के इस प्रस्ताव को समझते हैं जो आख़िरकार बीसीसीआई को बचाने वाला है. बोर्ड के लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि यह किस हद तक नुकसानदायक हो सकता है.

बीसीसीआई के इस 'सलाहकार बोर्ड' को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि बोर्ड के इतिहास के मद्देनज़र नेकनीयती को बरक़रार रखने का दायित्व अब उनके कंधों पर है.

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