दिल्ली में सिगरेट पीने वाले कम हुए क्या?

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भारत और धूम्रपान का रिश्ता सैकड़ों वर्ष पुराना है और इसके आयाम बदलते रहे हैं.

पिछले कई दशकों से धूम्रपान करने वालों की तादाद भी बढ़ी है और इससे होने वाले नुक़सान पर सरकार की नज़र भी पड़ी है.

ख़ासतौर से 2008 के उस क़ानून के बाद, जिसके अनुसार धूम्रपान का सेवन प्रतिबंधित है.

लेकिन ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि इस प्रतिबंध के बाद राजधानी दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर अब कोई आपको धूम्रपान करते नहीं मिलेगा.

उल्लंघन

इस क़ानून के अनुसार जिन जगहों पर सिगरेट पीना मना है उसमे सिनेमा हॉल, अस्पताल, जन यातायात, एयरपोर्ट, रेस्तरां या शॉपिंग मॉल जैसी कई जगह शामिल हैं.

लेकिन दिल्ली के नेहरू प्लेस इलाके को ले लीजिए या फिर कनॉट प्लेस को, हर जगह-हर समय कोई न कोई सिगरेट के कश बिंदास उड़ा रहा होता है.

चंद्रा रामकृष्णन, वॉलन्टरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया में काम करती हैं, जो स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर धूम्रपान के रोकथाम के लिए काम करती है.

उन्होंने बताया, "किसी भी तरह के तम्बाकू का सेवन भारत की सामाजिक संस्कृति का हिस्सा रही है इसलिए इसे जड़ से मिटाना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है. दिल्ली क्या, भारत के तमाम शहरों में आज भी लोग सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीते दिखते हैं. सरकार को इसके लिए अब कुछ ठोस और सख़्त क़दम उठाने की ज़रूरत है."

डर

हालांकि प्रतिबन्ध का असर उन लोगों पर पड़ता दिख रहा है जिनके घरों में सिगरेट-तम्बाकू बेचने से ही चूल्हा जलता रहा है.

कनॉट प्लेस में मिश्र पान-सिगरेट भण्डार के मालिक जितेंद्र बड़ी मन्नतों के बाद बात करने को तैयार हुए.

उन्होंने कहा, "पहले डर नाम की तो कोई चीज़ थी नहीं. लेकिन अब लोग हमसे सिगरेट ख़रीद कर पूछते हैं कि भैय्या पीने कहाँ जाएं. हम उन्हें कोने की तरफ़ भेज देते हैं. मुद्दे की बात यही है कि लोगों में जागरूकता बढ़ी है".

वैसे चंद्रा रामकृष्णन जागरूकता वाली बात से सहमत नहीं और कहती हैं कि धूम्रपान के नुकसान और इसके उल्लंघन पर होने वाले जुर्माने पर फ़ोकस ज़्यादा होना चाहिए.

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उनके अनुसार, "भारत में सार्वजनिक जगह पर सिगरेट पीते हुए पकड़े जाने पर 200 रुपए ही जुर्माना लगता है, जबकि आज के दौर में महँगी सिगरेट के पैकेट ही 200 से 300 रुपए में मिल जाते हैं.

लेकिन सच ये भी हैं कि तमाम लोगों ने अब घरों और दफ्तरों में सिगरेट पीना बंद कर दिया है".

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ अकेले भारत में ही दुनिया की 12 प्रतिशत सिगरेट पीने वाली जनसँख्या रहती है.

वहीँ हर वर्ष इससे मरने वालों की तादाद भी लाखों पार जाती है.

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