गुजरात मुठभेड़: 'बड़े लोग बचे केवल छोटे फंसे'

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Image caption गुजरात हाईकोर्ट ने इशरत जहां मुठभेड़ केस सीबीआई को सौंपा था.

हमारे प्रधानमंत्री और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने के लिए अब तक कुल 14 आतंकवादी आ चुके हैं, और सारे पुलिस की मुठभेड़ में मारे भी जा चुके हैं ऐसा गुजरात पुलिस का दावा है.

पुलिस का यह भी दावा है कि यह सारे ऑपरेशन सेंट्रल इंटेलीजेंस ब्यूरो की ओर से मिली जानकारी के आधार पर हुए थे.

2003 से लेकर 2007 के बीच हुए मुठभेड़ों का सच तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की जांच सीबीआई को सौंपी, उसी प्रकार गुजरात हाईकोर्ट ने इशरत जहां मुठभेड़ केस भी सीबीआई को सौंपा था.

दोनों मुठभेड़ मामलों की जांच कर रही सीबीआई ने 2010 में गिरफ़्तारी शुरू की जिस में भाजपा के दिग्गज नेता अमित शाह और उनके करीबी माने जाने वाले आईपीएस अधिकारी अभय चुदास्मा को भी दोषी पाया गया.

अब यह बात पुरानी हो चुकी है कि गुजरात में हुए तमाम मुठभेड़ फर्ज़ी थे. लेकिन जब सीबीआई ने गिरफ़्तारियां शुरू कीं और चार्जशीट दाखिल कीं तो उसमें जो नाम आरोपी के तौर पर सामने आए तो मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिवारजनों को लगा कि न्याय में देर हुई है लेकिन न्याय हुआ.

न्याय

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इन मामलों में जिनको दोषी पाया गया उसमें गोली चलाने वाले छोटे पुलिस अफ़सरों के अलावा गुजरात के पूर्व गृहराज्य मंत्री अमित शाह, राजस्थान के पूर्व गृहराज्य मंत्री गुलाबचंद कटारिया, गुजरात के पूर्व डीजीपी पीसी पांडे, आईपीएस अफ़सर ओपी माथुर, गीथा जौहरी, अभय चुदास्मा, सेंट्रल इंटेलीजेंस ब्यूरो के राजेन्द्र कुमार तथा अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट बैंक के चेयरमैन अजय पटेल और डायरेक्टर यशपाल चुदास्मा पर चार्जशीट दाखिल किया गया था.

इन बड़े नामों को छोड़ के गुजरात की सीआईडी, क्राइम ब्रांच और सीबीआई ने छोटे-बड़े कुल 37 पुलिस अफसरों को गिरफ़्तार किया था. ये सभी लोग मुठभेड़ की जगह पर हाजिर थे.

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Image caption सीबीआई ने अमित शाह और उनके करीबी माने जाने वाले आईपीएस अधिकारी अभय चुडासमा को भी दोषी पाया था.

गिरफ़्तार हुए आरोपियों में सब से कम वक्त जेल में रहने वाले अमित शाह ही थे. उन्हें सिर्फ दो महीने जेल में रहना पड़ा था, बाद में उनको गुजरात हाईकोर्ट की ओर से जमानत मिल गई थी. जबकि बाकी के सभी अफ़सरों को सात साल तक बिना ट्रायल जेल में रहना पड़ा था.

हाल तक 37 आरोपियों में से सिर्फ पांच छोटे अफ़सर जेल में हैं बाकी सभी की जमानत हो चुकी है.

2014 में देश का राजनीतिक माहौल बदला. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हो गए, उसके बाद जो हुआ वह आश्चर्यजनक था.

अभी तक मुठभेड़ के एक भी केस में ट्रायल शुरू नहीं हुआ है. फिर भी में एक के बाद एक आरोपी अदालत में जा कर कह रहे हैं वो बेकसूर है ऐसी याचिका दायर करके केस से डिस्चार्ज करने की मांग कर रहे हैं.

सवालिया निशान

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Image caption पूर्व आईपीएस अफ़सर डीजी बंजारा ने भी गुजरात सरकार को खत लिखकर अपनी नाराज़गी जताई थी.

आश्चर्य इस बात का है कि कोर्ट ने याचिका को मानते हुए सबसे पहले अमित शाह को केस से डिस्चार्ज किया उसके बाद तो डिस्चार्ज होने वालों की क़तार लग गई.

जिसमें सारे नेता और आईपीएस अफ़सर शामिल थे. बस रह गए तो छोटे अफ़सर.

इस मामले के अभियुक्त और पूर्व आईपीएस अफ़सर डीजी बंजारा ने भी गुजरात सरकार को खत लिखकर अपनी नाराज़गी जताई थी.

इसका मतलब साफ़ था कि राजनेता और बड़े अफ़सरों की आदेश का पालन करने वाले छोटे अफ़सरों को मुठभेड़ की ट्रायल सामना करना पड़ेगा.

यहां पर जिस प्रकार बड़े मगरमच्छ निकल गए उससे हमारी जांच एजेंसी पर सवालिया निशान खड़े होते हैं.

(बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त से बातचीत पर आधारित)

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