'राष्ट्रपति शासन की तरफ़ बढ़ती दिल्ली'

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के साथ ही उप-राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच खींचतान शुरू हो गई थी, लेकिन पिछले कुछ समय से यह सीधी लड़ाई में बदल गई है.

दिल्ली के उप-राज्यपाल अधिकारी की नियुक्ति करते हैं तो सरकार उन्हें काम करने से रोक देती है.

दिल्ली सरकार अधिकारी नियुक्त करती है तो उप-राज्यपाल उन्हें मंजूरी देने से इनकार कर देते हैं.

दोनों ही अपने पास संविधान प्रदत्त अधिकार होने का दावा करते हैं, लेकिन कौन सही है और यह लड़ाई कब तक चलेगी?

बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा ने पूर्व क़ानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण से इस मुद्दे पर खास बात की.

पढ़िए क्या कहना है शांति भूषण का

Image caption आम आदमी पार्टी छोड़ चुके शांति भूषण पार्टी के संस्थापक सदस्यों में थे.

अरविंद केजरीवाल या तो यह समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं, बल्कि केंद्र शासित प्रदेश है.

संविधान के धारा 239 में स्पष्ट है कि केंद्र शासित प्रदेश का शासन, केंद्र की चुनी हुई सरकार उप-राज्यपाल के माध्यम से करेगी.

स्थानीय शासन को, विधायकों को कोई अधिकार नहीं है. उन्हें सिर्फ़ यही अधिकार है कि जो फ़ैसला वह लें उसे उप-राज्यपाल को भेजें.

अगर उप-राज्यपाल को सही लगेगा तो वह लागू होगा, वरना वो मामले को केंद्र को भेज सकते हैं. केंद्र के फ़ैसला लेने तक मामले में उप-राज्यपाल के निर्देश लागू होंगे.

आज जो स्थिति है उसमें केंद्र सरकार जब चाहे तब राष्ट्रपति शासन लगा सकती है, विधानसभा को भंग कर सकती है.

बहुमत का तर्क

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इस मामले में बहुमत की सरकार का तर्क भी बेकार है, क्योंकि जो सरकार संविधान के ख़िलाफ़ काम करेगी उसे बर्खास्त किया जा सकता है.

और दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार तो बिल्कुल संविधान के ख़िलाफ़ काम कर रही है.

संविधान उप-राज्यपाल को फ़ैसले लेने का अधिकार देता है. वह किसी अधिकारी को नियुक्त करते हैं और यह (दिल्ली सरकार) उन्हें काम नहीं करने देते.

इस तरह वह संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं और ऐसे में संविधान केंद्र सरकार को यहां राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार भी देता है.

मान लीजिए कि दिल्ली के बीजेपी विधायक विजेंद्र गुप्ता यह ऐलान कर दें कि उनके विधानसभा क्षेत्र में जो भी होगा उसका फ़ैसला वही करेंगे, राज्य सरकार नहीं, क्योंकि वहां से बहुमत उन्हें मिला है तो?

तोमर की गिरफ़्तारी

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दिल्ली के कानून मंत्री जितेंद्र तोमर की गिरफ़्तारी में कुछ भी ग़ैर कानूनी नहीं है.

यह पूरी तरह संविधान सम्मत है, इसके लिए किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं है.

विधायक या मंत्री की गिरफ़्तारी के बाद पुलिस को इसकी सूचना विधानसभा अध्यक्ष को देनी चाहिए.

दिल्ली पुलिस के अनुसार उसने फ़ैक्स कर के दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष को इसकी जानकारी दे दी थी.

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