म्यांमार से बड़े थे ये 4 सीमापार अभियान

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भारत के बारे में प्रचलित है कि सरकार अपनी ताक़त का इस्तेमाल करने के लिए अनिच्छुक रही है, यहां तक कि हमलों को सह जाती है और अपने विरोधियों को सज़ा भी नहीं देती है लेकिन सच्चाई इससे जुदा है.

भारत ने देश को एक करने के लिए न केवल फ़ौजी ताक़त का इस्तेमाल किया (हैदराबाद, जूनागढ़, जम्मू एवं कश्मीर, गोवा और सिक्किम इसकी बानगी हैं), बल्कि मित्रवत पड़ोसी मुल्कों की सरकारों की रक्षा के लिए सरहद पार भी सैन्य हस्तक्षेप किया.

अगर पिछले कुछ दशकों में भारत को एक अनिच्छुक शक्ति के रूप में देखा गया है तो इसकी वजह ये नहीं है कि उसके पास ताक़त नहीं है. बल्कि इसलिए कि उसमें राजनीति इच्छाशक्ति, मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और शायद एक ऐसी योजना की भी कमी थी, जिसे प्रभावी तरीक़े से अंजाम दिया जा सके.

म्यांमार के अंदर विशेष सुरक्षा बलों के अभियान को देखा जाए तो इन चीज़ों में शायद बदलाव आ रहा है.

बड़ा बदलाव

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म्यांमार अभियान इस मायने में अलग था कि भारत ने कार्रवाई की योजना बनाई और म्यांमार सरकार को तभी सूचना दी जब कार्रवाई शुरू हो चुकी थी.

अभी तक संयुक्त फ़ौजी कार्रवाइयां ज़्यादातर दिन में होती थीं और इसलिए शुरू होने से पहले ही वो अपनी मारकता खो देती थीं.

जो संदेश भेजा गया है वो अपने आप में अमरीका जैसा है; यदि लक्ष्य मौजूद है तो उस पर निशाना साधा जाएगा, चाहे ऐसी कार्रवाई एकपक्षीय ही क्यों न हो.

पिछली कार्रवाईयों की बनिस्बत यह एक बड़ा बदलाव है, जिनमें आमतौर पर भारत ने हस्तक्षेप किया या तालमेल या सहमति के चलते अपनी सरहद के पार कार्रवाई की या उन देशों के नेतृत्व के आमंत्रण पर उन देशों में कार्रवाई की. इनमें से कुछ फ़ौजी कार्रवाईयां अघोषित थीं, कुछ गोपनीय थीं और कुछ खुले तौर पर की गई थीं.

1971- श्रीलंका

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वर्ष 1971 में भारतीय सेना श्रीलंकाई प्रधानमंत्री के आमंत्रण पर जेवीपी (पीपुल्स लिबरेशन फ़्रंट) के विद्रोह को दबाने श्रीलंका गई थी.

सैकड़ों भारतीय जवानों ने जेवीपी विद्रोहियों को साफ करने में बहुत शानदार भूमिका निभाई थी. लेकिन यह पूरा अभियान बिना किसी बड़ी योजना या प्रचार के अंजाम दिया गया और जैसे ही स्थिति काबू में आई, भारतीय फ़ौज लौट आई.

1980 के दशक में भारतीय फ़ौज ने कई कार्रवाईयों को अंजाम दिया.

1983- मॉरिशस

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साल 1983 में भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ को मॉरिशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री की मदद के लिए लगाया गया, जिन्हें उग्र राजनीतिक विरोधियों से कड़ी चुनौती मिल रही थी.

यह अभियान बहुत खामोश और असरदार तरीक़े से अंजाम दिया गया और मॉरिशस के भारतीय मूल के प्रधानमंत्री के पक्ष में राजनीतिक समर्थन जुटाकर उनके विरोध को दबाया गया.

1986- सेशेल्स

साल 1986 में भारतीय नौ सेना ने सेशेल्स की सरकार को बचाने और भाड़े के सैनिकों की तख़्तापलट की कोशिशों को विफल करने के लिए एक अभियान चलाया था.

यह अभियान सेशेल्स की क़ानूनी सरकार के पक्ष में समर्थन जुटाकर, बिना एक गोली चलाए पूरी सफलता के साथ अंजाम दिया गया.

1988- मालदीव

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इसके दो साल बाद 1988 में भारतीय विशेष सुरक्षा कमांडोज़ ने मालदीव में तख़्तापलट की एक कोशिश को विफल करने के लिए शानदार अभियान चलाया.

एक बहुत ही बेहतरीन तालमेल वाला अभियान चलाया गया, जिसमें भारतीय सेना के तीनों अंगों ने भाग लिया.

अस्थिरता फैलाने वाले अधिकांश चरमपंथी श्रीलंकाई तमिल विद्रोही संगठनों से जुड़े थे. उनका सफ़ाया कर क़ानून व्यवस्था क़ायम की गई.

जिस रफ़्तार से भारत की सरकार ने निर्णय लिया और जितनी तेज़ी से कार्रवाई की इसने सबको हैरान कर दिया और सुरक्षा देने की क्षमता वाले देश के रूप में भारत ने ख्याति अर्जित की.

राजनीतिक स्पष्टता

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इन बड़े अभियानों के अलावा भारतीय विशेष सुरक्षबलों ने कारगिल युद्ध के दौरान एलओसी के पार अघोषित अभियान चलाये और कुछ मौकों पर तो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भी घुसकर छापे डाले.

इन सब अभियानों में सबसे महत्वपूर्ण बात थी, एक स्पष्ट राजनीतिक निर्देश और सशस्त्र बलों को दिया गया साफ साफ लक्ष्य.

इसके बाद सुरक्षा बलों ने उस लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल करने के लिए योजना बनाई.

इसके अलावा भारत के एक और बड़ा सशस्त्र अभियान था, बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी लेकिन वो एक घोषित युद्ध था.

(लेखक दिल्ली स्थित विवेकानंद इंटरनैशनल फ़ाउंडेशन से जुड़े हुए हैं.)

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