हरे-भरे बाग के साथ सड़कों पर दौड़ती टैक्सी

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कोलकाता की सड़कों पर इस टैक्सी पर निगाह पड़ते ही लोग चौंक जाते हैं और दोबारा मुड़कर देखने पर मजबूर होते हैं.

पीले रंग की इस पारंपरिक टैक्सी में आखिर ऐसी क्या खास बात है? इसमें खास है टैक्सी में चलता-फिरता बागान और इसमें लगे हरे पौधे.

महानगर के लोगों में खासी लोकप्रिय साबित हो रही इस टैक्सी को लोग अब ‘सबूज रथ’ यानी हरे रथ के नाम से जानने और पुकारने लगे हैं.

खास सवारी

टैक्सी चालक धनंजय चक्रवर्ती उर्फ बापी ने अपनी टैक्सी को ठंडा रखने और पर्यावरण बचाने का संदेश देने के दोहरे मकसद से यह अनूठी तरकीब निकाली है.

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कोलकाता के तपते मौसम में यह टैक्सी आंखों को तो सुकून देती ही है, शरीर को भी ठंडक भी पहुंचाती है. टैक्सी की छत पर हरी घास लगी है और भीतर पर्यावरण रक्षा के संदेश लिखे गमलों में पौधे.

आम लोगों में बापी की इस टैक्सी के प्रति काफी क्रेज है और वह कभी खाली नहीं रहती. इसमें सवारी के इच्छुक लोगों के अलावा कॉलेज के युवक-युवतियों में भी उनकी टैक्सी के साथ सेल्फ़ी खींचने की होड़ मची रहती है.

टॉलीगंज इलाके का एक युवक सुबोध मंडल कहते हैं, "मैं अपनी महिला मित्र के साथ डेट पर जाने के लिए बापी दा की टैक्सी को ही तरजीह देता हूं. यह अपने-आप में एक ख़ास सवारी है."

प्रेरणास्रोत

एक यात्री सुरेश मोहंती कहते हैं कि बापी की टैक्सी से सबक लेकर दूसरे लोग भी ऐसा कर सकते हैं. यह एक अच्छी पहल है.

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जाने-माने पर्वारणविद् सुभाष दत्त कहते हैं, "बापी महज एक टैक्सी चालक नहीं, बल्कि लोगों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गया है."

बापी कहते हैं कि वे अपनी इस टैक्सी के जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि पेड़-पौधे कहीं भी लगाए जा सकते हैं. इसके लिए बागानों की जरूरत नहीं है.

आखिर इसका ख्याल कैसे आया? बापी बताते हैं, "कुछ दिनों पहले टैक्सी में शराब की एक खाली बोतल मिली थी. उसमें मनी प्लांट लगा कर मैंने उसे टैक्सी में रख दिया. लोग जब इसकी सराहना करने लगे तो मैंने और पौधे लगाने का फैसला किया."

सबक

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बापी फिलहाल किराए की टैक्सी चलाते हैं. टैक्सी की छत पर लगे बागान का वजन लगभग 65 किलो है. धातु की बनी उस ट्रे में छोटे-छोटे छेद हैं ताकि अतिरिक्त पानी बाहर निकल जाए. इस चलते-फिरते बागान पर बापी ने लगभग 22 हजार रुपए खर्च किए हैं.

मिट्टी और पौधों की वजह से टैक्सी का वजन ज्यादा होने के कारण डीजल की खपत कुछ जरूर बढ़ गई है. लेकिन बापी कहते हैं कि प्रकृति और पर्यावरण को बचाने में वे इतना मामूली योगदान तो कर ही सकते हैं.

बापी को उम्मीद है कि दूसरे लोग भी इससे सबक लेकर पौधे लगाने की प्रेरणा लेंगे.

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