नहीं हटेगी मैगी की ब्रिकी से पाबंदी

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बांबे हाई कोर्ट ने मैगी नूडल्स पर लगी रोक के खिलाफ़ नेस्ले कंपनी की याचिका पर राहत देने से इनकार किया.

अदालत ने कहा कि केंद्र और राज्य मैगी के खिलाफ़ नियमों के अनुसार कार्रवाई जारी रख सकते हैं लेकिन उन्हें कंपनी के खिलाफ़ कोई भी कदम उठाने के 72 घंटे पहले कंपनी को नोटिस देना होगा.

कंपनी ने केंद्र और राज्य सरकार की ओर से लगाई गई पाबंदी के ख़िलाफ़ न्यायिक जांच की मांग की थी.

नेस्ले के वकील इकबाल चावड़ा ने अपनी दलील में कंपनी के खिलाफ़ कार्रवाई करने के केंद्र और राज्य सरकार के अधिकार को चुनौती दी थी.

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उन्होंने कहा कि जांच के लिए नूडल्स और टेस्टमेकर की अलग-अलग जांच की गई जबकि ये दोनों पदार्थ इकट्ठे खाए जाते हैं.

जांच का तरीका गलत

नेस्ले के वकील ने जांच के इस तरीके को गलत बताया है साथ ही उनका कहना था कि बहुत से सैंपलों में सीसे की मात्रा तय मानकों से कम पाई गई थी.

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केंदीय खाद्य जांच संस्था एफएसएसआई के वकील महमूद प्राचा और महाराष्ट्र सरकार के वकील जनरल अनिल सिंह ने कंपनी की दलीलों का खंडन करते हुए कहा कि खाद्य उत्पाद की किसी भी समय जांच करने का केंद्र और राज्य सरकार को पूरा अधिकार हैं .

दोनों वकीलो का कहना था कि क्योंकि मैगी खाने की वस्तु है और लोगों के स्वास्थ्य से इसका सीधा संबंध है इसलिए कंपनी की ये दलील कतई मानी नहीं जा सकती.

महमूद प्राचा ने कहा कि मैगी नूडल्स का भारत में उत्पादन करके बेचने की अनुमति लेते वक्त इसमें डाली जाने वाले पदार्थो की जो मात्रा तय की गई थी वो अब नहीं है और ये सरकार और जनता के साथ धोखा हैं.

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दिल्ली स्थित सामाजिक संस्था कंज्यूमर ऑनलाइन ने भी इस मामले में अलग याचिका दायर की है. इस संस्था के वकील अहमद आबदी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि मैगी टेस्टमेकर में जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल होता है जो बीफ या पोर्क से आती है लेकिन नेस्ले के उत्पाद पर इसका जिक्र नहीं हैं और मैगी को शाकाहारी खाद्य के रूप में बेचा जाता हैं .

अदालत ने सारी दलीलें सुनने के बाद नेस्ले को बिना कोई अंतरिम राहत दिए राज्य और केंद्र सरकार को दो सप्ताहों में हलफनामा दायर करने को कहा है.

इस मामले की मामले की अगली सुनवाई 30 जून को होगी.

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