म्यांमार ऑपरेशन: भारत की मंशा क्या है?

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सहयोग के विषय पर 1980 के दशक में हुए एक अध्ययन में राजनीति विज्ञानी रॉबर्ट एक्सेलरॉड ने दिलचस्प बात कही थी.

उन्होंने दिखाया था कि अपने विरोधी से मनचाहा व्यवहार पाने का बेहतरीन तरीका है कि उसे ‘जैसे को तैसा’ की रणनीति में उलझाए रखा जाए.

अधिकांश सभ्य लोगों को यह रणनीति बचकानी और घृणा के लायक लगती है. हालांकि जैसे को तैसा वाली रणनीति उन कट्टर विरोधियों के बीच शांति और स्थिरता लाने के लिए जानी जाती है, जो एक दूसरे पर कतई भरोसा नहीं करते.

मोदी सरकार ने कुछ ही दिन पहले भारतीय सुरक्षा बलों को सीमापार स्थित कथित चरमपंथी शिविरों पर हमले की इजाजत देकर एनएससीएन (खापलांग) और केवाईसीएल के गुरिल्ला लड़ाकों को उनकी कार्रवाई का जवाब दिया है.

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म्यांमार में किया गया भारत का बदले का अभियान ख़ासा घातक है और सोच समझकर किया गया ऑपरेशन है.

यह 'चरमपंथियों' और भारत के लोगों, दोनों को दिल्ली के नए इरादे का एक संदेश है कि 'दुश्मन को बख़्शा नहीं जाएगा.'

अगर चरमपंथी यह संदेश समझ जाते हैं और भविष्य में किसी और हमले से परहेज करते हैं तो यह अध्याय यहीं ख़त्म हो जाता है.

अगर ऐसा नहीं होता और वो लड़ने का फ़ैसला करते हैं, तो नई दिल्ली को और कड़े फ़ैसले करने पड़ सकते हैं.

जैसा कि इस अभियान में दिखा है, भारतीय सुरक्षा बल केवल सफलतापूर्वक बदला लेने में ही नहीं, बल्कि विरोधी पर दबदबा बनाने में भी पर्याप्त सक्षम दिखे हैं.

यदि ये विवाद खिंचता है, तो अन्य क्षेत्रों में - राजनीतिक और राजनयिक क़ीमत, विदेशी सरकारों से सहयोग, जनता की धारणा आदि के लिहाज़ से भारत को नुकसान होगा.

चरमपंथी ये जानते हैं और अगर वे मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने के लिए भारतीय सुरक्षाबलों को और बड़ी लड़ाई में खींचने की कोशिश करते हैं, तो हैरान नहीं होना चाहिए.

मौदी सरकार के लिए चुनौतियां

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मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी इस घटना से मनोवैज्ञानिक और सैन्य बढ़त को मज़बूत करना और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए खुफ़िया और राजनीतिक तरीक़े इस्तेमाल करना.

इस हमले का व्यापक असर क्या हो सकता है?

पहला, भारत की सीमा और देश के अंदर सक्रिय चरमपंथी समूहों को स्पष्ट हो जाएगा कि नई दिल्ली उनके ख़िलाफ़ अधिक जवान तैनात करेगी.

सरकार के बल प्रयोग का आम तौर पर जनता में समर्थन का मूड देखते हुए यह संभव है कि चरमपंथी समूह लंबे समय तक शांत बने रहें.

दूसरा, यहां ध्यान देना चाहिए कि नई दिल्ली की कार्रवाई, सज़ा देने वाली और बदले की कार्रवाई थी, न कि किसी विवाद में बिना उकसावे के हस्तक्षेप करने की.

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यह एक ‘आक्रामक आत्मरक्षा’ की कार्रवाई थी, जिसकी एक सीमा है. यानी, नई दिल्ली बलपूर्वक कोई कार्रवाई नहीं करेगी जब तक हद पार न हो जाए.

यह स्थिति बातचीत से समस्या सुलझाने का मौका खोलती है.

'दख़ल के रवैए की उम्मीद नहीं'

तीसरी अहम बात, मोदी सरकार से, भारत के उपमहाद्वीपीय और समुद्री पड़ोसी देशों में विवादों में दखलंदाज़ी वाले नज़रिये की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

मालदीव जैसे देशों के साथ हल्की सी 'राजनयिक झिड़की' ही बहुत है.

इसलिए इस अभियान का यह मतलब नहीं निकालना चाहिए कि भारत पड़ोसी देशों के घरेलू या उन अंतरराष्ट्रीय विवादों में हस्तक्षेप करने का इच्छुक हो गया है, जिनसे भारतीय रक्षा का कोई सीधा संबंध नहीं है.

पाकिस्तान को संकेत

इस प्रकरण की चौथी बात है कि इस अभियान में एक किस्म का बड़बोलापन रहा है. कुछ हद तक तो ये मोदी सरकार के नेताओं ने जानबूझकर किया है. इससे लगता है कि नई दिल्ली ऐसा ही कुछ पाकिस्तान के साथ भी कर सकती है.

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हालांकि, अधिकांश समीक्षकों, खासकर पाकिस्तान के समीक्षकों ने परमाणु हथियारों के नज़रिये से इसे ख़ारिज़ किया है.

यह भी तथ्य है कि म्यांमार की तरह पाकिस्तान सरकार अपनी ज़मीन पर भारतीय फ़ौज के ऐसे किसी अभियान का समर्थन नहीं करेगी.

हालांकि इस अभियान से पाकिस्तानी फ़ौजी-जिहादी समूह यह सोच कर राहत नहीं ले सकते कि वो भारत के ख़िलाफ़ हमले कर सकते हैं लेकिन परमाणु हथियार के कारण भारत के हाथ बंधे रहेंगे.

पाकिस्तान को यह संदेश पहुंचाने की ज़रूरत है कि अगर भारत संयम बरत रहा है तो उसने यह विकल्प चुन रखा है. वो बलपूर्वक जवाब देने का भी विकल्प चुन सकता है.

हालांकि स्वाभाविक रूप से यह बहुत ख़तरे वाला है. मोदी सरकार संकेत दे रही है कि वो ऐसा ख़तरा लेने को तैयार है.

चरमपंथ

उदाहरण के लिए, यह सभी जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों के जवान छोटे मोटे रणनीतिक अभियानों के लिए नियंत्रण रेखा के पार आते जाते रहते हैं.

लेकिन अगली बार यदि किसी चरमपंथी हमले के तार पाकिस्तान तक जाते हैं तो भारत पाकिस्तान प्रशासित इलाक़ों में भीतर तक ऐसी कार्रवाई का फ़ैसला ले सकता है.

क्योंकि नियंत्रण रेखा कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है.

लेकिन, कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री, बल्कि नरेंद्र मोदी भी ऐसी स्थिति में फंसना नहीं चाहते कि उन्हें ऐसा आदेश देना पड़े.

मूल्यांकन की ज़रूरत

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रही बात पाकिस्तान की तो उसे अब पहले जैसा पश्चिम का समर्थन नहीं है. पाकिस्तान के जनरलों को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना चाहिए.

और अंत में मोदी सरकार को इस बात का एहसास करना चाहिए कि ऐसा हर बार नहीं होगा.

जनता की याददाश्त छोटी होती है और उल्टा दांव पड़ने पर उनकी प्रतिक्रिया भी गंभीर होती है.

इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हलचल के शांत होने के बाद, सादगी और जनता में संदेश देने को लेकर संयम का मूल्यांकन कर लिया जाए.

(लेखक तक्षशिला संस्थान के निदेशक और स्वतंत्र चिंतक हैं. वो स्कूल ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी से भी जुड़े हैं.)

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