'मानो उन्हें जादू आता हो'

चार्ल्स कोरिया और बी.वी. दोशी इमेज कॉपीरइट BV Doshi

एक दिन तड़के, मेरे दोस्त चार्ल्स कोरिया ने मुझे फ़ोन किया और कहा, “दोशी, ये सुनो”, और उन्होंने मुझे एक गाना सुनाया, “वो भी क्या दिन थे मेरे दोस्त, जो हमें लगता था कभी खत्म ना होंगे”.

आज मुझे वही गाना याद आ रहा है और मन चाहता है कि काश यही सच होता. हमारे 60 सालों की दोस्ती के ख़ूबसूरत दिन खत्म ना हुए होते.

चार्ल्स अपनी ज़िंदगी कुछ सिद्धांतों पर जीते थे. वही उनके काम में भी झलकते थे. वो ज़िंदगी खुशी से जीना पसंद करते थे जैसे वो ख़ुदा की कोई नेमत हो.

वही सोच उनके आर्किटेक्चर में दिखाई देती था जिसमें वो जीने, काम करने, चलने-फिरने और रिश्ते बनाने के सभी आयामों को जगह देते थे.

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सामाजिक सरोकार उनके काम की रीढ़ थी. नवी मुंबई की कल्पना करना और उसे बनाना शायद इसका सबसे बड़ा प्रतीक है.

शहर में लोगों की तादाद बढ़ रही थी और इसको ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने शहर को बढ़ाने की परिकल्पना की पर वो वैसे पूरी ना हो सकी.

उनके काम को जो सरकारी मदद चाहिए थी वो नहीं मिली, इसलिए नवी मुंबई बनने के बाद भी, स्कूल-कॉलेज, व्यापार, नौकरियां, सांस्कृतिक केंद्र और सरकारी दफ़्तर वगैरह मुंबई शहर में ही रहे.

सरकार ये कभी समझ नहीं पाई कि उनकी सोच ‘सैटेलाइट शहर’ बनाने की थी जो अपनेआप में हर सुविधा से भरे-पूरे हों.

वो गांधीवादी थे. कोरिया की सोच सबको साथ लेकर चलने की थी. वो अमीर और गरीब दोनों के बारे में सोचते थे. एक का दूसरे पर क्या असर होगा.

हमारी संस्कृति, जीने का तरीका, समाज के बीच रहने की ज़रूरत ये सब कोरिया के लिए बहुत अहमियत रखते थे.

उनकी इमारतों में हमेशा खुलापन था. बड़ी छतें, धूप आने के रास्ते, छाया वाली जगहें, सर्दी और गर्मी के मुताबिक डिज़ाइन, वो इन सबका ख़्याल रखते थे.

शहर की योजना बनाते हुए रहने की जगह के साथ-साथ स्कूल अस्पताल की ज़रूरत उनकी समग्र सोच का हिस्सा थी.

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उन्होंने अपने काम में हमेशा संसाधनों और इच्छाओं के बीच सामंजस्य बनाने के नए रास्ते ढूंढने की कोशिश की. अपने हर काम में वो लंबे दौर तक उसके मज़बूत रहने और चलने की व्यावहारिकता का ध्यान करते थे.

वो अलग-अलग तरीके की इमारतें बनाने के लिए हाई-टेक और लो-टेक तकनीक और हुनर का इस्तेमाल ऐसे कर पाते थे, मानो उन्हें जादू आता हो.

वो अपने काम में क्रिएटिव तो थे ही साथ ही वो हर डिज़ाइन में आसपास के माहौल, संस्कृति और रहन-सहन का ध्यान रखते थे.

उनके सिद्धांतों और इमारतों के ज़रिए वो हमेशा हमारे बीच रहेंगे.

(बीवी दोशी भारत में आधुनिक वास्तुकला के सबसे नामचीन चेहरों में से एक हैं. वो प्रसिद्ध अमदावाद नी गुफा और आई आई एम बैंगलोर शिल्पकार भी हैं)

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