ललित मोदी और वसुंधरा राजे की 'कहानी'

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उत्तर प्रदेश के मोदीनगर शहर का नाम ललित मोदी के व्यवसायी पुरखों के चलते पड़ा था क्योंकि उन्होंने यहाँ टायर और चीनी से लेकर कपड़ों तक की फैक्ट्रियां लगाईं थीं.

लेकिन ललित मोदी की लोकप्रियता पीछे असल हाथ राजस्थान राज्य का है जहाँ से उन्होंने बतौर क्रिकेट प्रशासक अपने करियर को बुलंदियों तक पहुंचाया.

पारिवारिक बिज़नेस में तो ललित मोदी 1992 में शामिल हो गए थे लेकिन क्रिकेट प्रशासन से वे पहली बार 1999 में जुड़े और वो भी हिमाचल प्रदेश जाकर.

शायद शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में हुई अपनी पढ़ाई के चलते वे यहाँ आए लेकिन असफल रहे.

वसुंधरा का 'प्रभाव'

आखिरकार 2005 में ललित ने राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन में जगह बनाई और नागौर से चुने गए.

ये वही दौर था जब राजस्थान में पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बना चुकी वसुंधरा राजे का शासन था.

वसुंधरा राजे की माँ विजया राजे सिंधिया और ललित के पिता कृष्ण कुमार मोदी दोस्त थे. इसलिए अगली पीढ़ी में दोस्ती होना अचरज की बात नहीं थी.

वसुंधरा के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन में मोदी का प्रभाव इतना बढ़ा कि वे अध्यक्ष चुन लिए गए.

ललित मोदी ने इसके बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

बिज़नस में 'इज़ाफ़ा'

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साल 2005 और 2006 की बात है जब मोदी ने जयपुर के प्रतिष्ठित और बेहद मंहगे रामबाग पैलेस होटल को ही एक तरह से अपना घर बना रखा था.

वजह थी सड़क पार मौजूद सवाई मान सिंह क्रिकेट स्टेडियम में क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़िस की मौजूदगी.

लेकिन यही वो दौर था जब ललित मोदी ने राजस्थान में व्यवसाय में भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी.

आमेर कंस्ट्रक्शन कंपनी नाम की एक कंपनी ने साल 2006 में जयपुर से सटे आमेर में कई हवेलियाँ खरीदीं और बाद में इसे आनंद हेरिटेज होटल ग्रुप में मिला दिया गया.

ललित मोदी और उनकी पत्नी मीनल इस कंपनी के बोर्ड पर हैं. प्रदेश में कांग्रेस सरकार की वापसी के बाद हवेलियों की खरीद पर जांच बैठा दी गई.

आईपीएल

इन्हीं दिनों की बात है जब ललित मोदी ने इंडियन प्रीमियर लीग क्रिकेट टी-20 प्रतियोगिता के लिए प्रयास तेज़ कर दिए थे.

वर्ष 2008 में आईपीएल का आगाज़ हुआ और तब तक ललित मोदी की मित्र वसुंधरा राजे की सरकार राजस्थान में थी.

जब वसुंधरा के नेतृत्व में भाजपा प्रदेश विधान सभा चुनाव हारी तब कुछ अपुष्ट ख़बरों में कहा गया कि टिकट वितरण में भी ललित की कथित दखल थी जिससे नुकसान ज़्यादा हुआ.

दूरियां

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बहरहाल दिसंबर 2013 में वसुंधरा के नेतृत्व में भाजपा ने राजस्थान में दोबारा शानदार वापसी की.

लेकिन लंदन में रह रहे ललित मोदी ने इसके कुछ महीने पहले किए चंद ट्वीटों से राजनीति में भूचाल सा ला दिया.

पहली बार ललित मोदी के ट्वीटों से लगा कि वसुंधरा राजे से उनकी दोस्ती में दरार पड़ चुकी है.

ललित मोदी ने राजस्थान में भाजपा टिकट वितरण प्रणाली पर सवाल उठाए और बिना वसुंधरा का नाम लिए उन्हें अरुण जेटली और सांसद भूपेन यादव जैसों से संभल कर रहने को कहा.

राज्य विधान सभा चुनाव नतीजों के समय तक साफ़ हो चला था कि ललित और वसुंधरा में खाई गहरी होती जा रही है.

वर्ष 2014 में कुछ ट्वीटों के ज़रिए ललित ने वसुंधरा की तो तारीफ़ की लेकिन उनके इर्द-गिर्द रहने वालों की निष्ठा पर लगातार सवाल उठाए.

इस सब के बीच वसुंधरा राजे ने चुप्पी साधे रखी. शायद उन्हें आभास हो चला था कि अब बोलने से भी कुछ बदलने वाला नहीं.

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