मोदी ऐसे मुसलमानों तक पहुँच पाएंगे?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुसलमानों से रिश्ते एक ऐसी राजनीतिक चर्चा है जिस पर पिछले एक साल से काफ़ी कुछ लिखा और बोला जा चुका है.

चाहे वह दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम का मोदी को अपने बेटे की दस्तार बंदी में न बुलाए जाने की बात हो या फिर मोदी-समर्थक मुस्लिम उद्योगपति ज़फर सरेशवाला को हैदराबाद की राष्ट्रीय उर्दू यूनिवर्सिटी का चांसलर बनाने पर होने वाली बहस.

ऐसा लगता है कि मोदी और मुसलमान दो ऐसे राजनीतिक ध्रुव हैं, जिनके बीच बिना विवाद के बिना कोई बातचीत संभव नहीं है.

मुलाक़ात के मायने

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शबे बारात के मौके पर उमैर इल्यासी की कयादत में 30 मुसलमानों के एक प्रतिनिधिमंडल का नरेंद्र मोदी से मिलना इस श्रंखला की अगली कड़ी बन गया है.

अख़बारी रिपोर्टों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रतिनिधिमंडल को बेहद दोस्ताना लहजे में यह आश्वासन दिया कि “मैं आधी रात को भी आपकी सेवा में हाज़िर हूं ”.

मीडिया में इस मुलाकात का कोई विस्तृत ब्यौरा नहीं आया और न ही मुसलमानों के किसी खास मुद्दे पर हुई कोई विशेष चर्चा का ज़िक्र किया गया, लेकिन राजनीतिक तौर पर सही कहे जाने वाले कई ऐसे बयान जो नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री पिछले एक वर्ष से देते रहे है, एक बार फिर अखबारी सुर्खियां बने.

विकास का राग

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मसलन, मोदी का यह कहना कि वे ऐसी राजनीति में विश्वास नहीं करते जो समाज को बांटती हो.

वे भारत के 125 करोड़ लोगों के सेवक हैं और इसमें निसंदेह हिंदुस्तानी मुसलमान भी शामिल हैं.

बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों की राजनीति से देश को बहुत नुकसान हुआ है. अल्पसंख्यकों की समस्याओं का समाधान रोजगार और विकास से ही हो सकता है.

किसी को भी नुकसान पहुंचे, ऐसी कोई बात बर्दाश्त नहीं की जाएगी, वगैरा वगैरा.

इस बहस के दो सीधे पक्ष उभर कर सामने आये है. कुछ बुद्धीजीवी (जो अपने आप को वक्त के साथ चलने वाला कहते है) इस मुलाक़ात को सकारात्मक बता रहे है.

यह कहा जा रहा है कि आज के माहौल में जबकि हिंदू कट्टरवाद बेलगाम होता सा दिख रहा है मोदी के साथ चलने में ही मुसलमानों की भलाई है.

इसके बरक्स एक ऐसा तबका भी है जो सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता के चश्मे से इस मुलाक़ात को देख रहा है.

एजेंडे पर सवाल

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इस तबके का तर्क यह है कि इस मुलाक़ात के पीछे कुछ मौकापरस्त तत्व शामिल थे जिनका मकसद संघ परिवार के वास्ताविक (सांप्रदायिक!) एजेंडे को अप्रत्यक्ष वैधता देना था.

दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों ही तर्क एक ही तरह की स्थापित मान्यताओं से निकल रहे है. ऐसा माना जा रहा है कि मुसलमान नामक समूह निहायत एकरूप है.

तमाम मुसलमान एक ही तरह सोचते हैं और यही वजह है कि गुजरात 2002 के बाद से नरेंद्र मोदी इस समुदाय के भीतर अलोकप्रिय है. ये धारणाएं काफ़ी सरल और एकतरफ़ा हैं.

भारत के मुस्लिम समुदाय विविधता से भरे है. यही स्थिति मुस्लिम राजनीतिक रुझानों की भी है.

बदलती पसंद

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सीएसडीएस के चुनाव सर्वेक्षण यह बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर की चुनावी राजनीति में भाजपा मुसलमानों की पहली पसंद नहीं रही है लेकिन यह भी सच है कि 2014 के आम चुनावों में भाजपा को मिलने वाला मुस्लिम मत प्रतिशत पिछले लोकसभा चुनावों के मुकाबले तीन प्रतिशत बढ़ा है.

यह तब हुआ है जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ा और जीता.

इस तथ्य का अर्थ यह नहीं निकालना चाहिए कि मुसलमान मोदीमय हो चुके है.

ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि मुस्लिम राजनीतिक व्यवहार बेहद बिखरे हुए हैं और स्थानीय स्तर पर भाजपा भी मुसलमानों की राजनीतिक पसंद बन सकती है.

Image caption नरेंद्र मोदी के समर्थक माने जाते हैं ज़फर सरेशवाला

गुजरात में, विशेषकर स्थानीय निकायों में, भाजपा की सफलता इस विषय में उल्लेखनीय है. दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी- मुस्लिम समीकरण को व्यक्ति बनाम धार्मिक समूह के नज़रिए से देखना सही नहीं है.

इस संदर्भ में दूसरा महत्वपूर्ण सवाल मुस्लिम नुमाइंदगी का है. क्या मोदी से मिलने वाले मुस्लिम रहनुमा हिंदुस्तान के 14 करोड़ मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे?

निसंदेह ऐसा नहीं था और ऐसा होना संभव भी नहीं था. विविधताओं से भरे मुस्लिम समुदायों के हित बेहद अलग-अलग हैं.

इस हिसाब से चंद दाढ़ी-टोपी वाले मौलवियों को मुस्लिम हितों का वास्तविक संरक्षक मानना लगातार बदलते मुसलमानों की सांस्कृतिक गतिशीलता को नकारने जैसा है.

बदलेगा विमर्श?

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मुस्लिम धार्मिक रुझानों के विषय में हुए सीएसडीएस के हाल के राष्ट्रीय सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि भारत में 60 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी के मसलों (जिनमे वोट डालना भी शामिल है) के लिए मज़हबी रहनुमाओं से न तो कोई मशवरा करते हैं और न ही उनकी राजनीतिक सलाहों पर कोई ख़ास तवज्जो देते है.

नरेंद्र मोदी से मुस्लिम प्रतिनिधिमंडलों का मिलना कोई राजनीतिक अपराध नहीं है.

लेकिन जब तक इस तरह की मुलाकातें लगे बंधे दायरों में होती रहेंगी, राजनीतिक विमर्श हिंदू-मुस्लिम सीमितताओं में बंधा रहेगा.

इसलिए यह ज़रुरी है कि राजनीति और नीति दोनों के स्तर पर मुस्लिम विविधताओं और बदलते मुस्लिम समाज के नए सवालों पर चर्चा हो.

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