लखवी वीटोः 'चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका'

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के बाद दोनों देशों के संबंधों के नई पींग बढ़ाने की उम्मीदों को चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के प्रस्ताव को वीटो कर ज़मीन दिखा दी है.

भारत की शिकायत थी कि 26/11 के मुंबई हमलों के मुख्य अभियुक्त को रिहा कर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के संकल्प 1267 का उल्लंघन किया है.

इस संकल्प के तहत सभी सदस्य देशों को किसी भी घोषित चरमपंथी संगठन, उससे जुड़े लोगों की आवाजाही और पैसा जमा करने के रास्तों को पूरी तरह बंद करना होता है.

संभवतः अगर सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति इस शिकायत को स्वीकार कर लेती तो इससे पाकिस्तान पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध लगने की संभावना बनती. कम से कम इससे पाकिस्तान बुरी तरह शर्मिंदा तो होता ही.

अचरज क्यों?

चीन और पाकिस्तान के बीच नज़दीकी रणनीतिक संबंधों को देखते हुए इसे लेकर कोई आश्चर्य भी नहीं है. चार अन्य स्थायी सदस्यों ने भारत के पक्ष में मतदान करने के बावजूद चीन पाकिस्तान के पक्ष में गया.

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हालांकि यह भी संभव है कि चीन को अन्य चार देशों में से कुछ के समर्थन के संकेत भी मिले हों जो नहीं चाहते कि इस समय पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय रूप से अछूत बन जाए. लेकिन वह एक जुदा किस्सा है.

लखवी मामले में चीन के वीटो को भारत में दग़ाबाज़ी या ग़ैरदोस्ताना हरकत के रूप में देखा जाएगा लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि चीन ने चरपमंथ के मुद्दे पर पाकिस्तान को बचाया हो.

मुंबई हमलों के ठीक बाद जब सुरक्षा परिषद लश्कर-ए-तैयबा/जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध की घोषणा करने जा रहा था तब चीन ने इसे दो बार रोका. चीन का कहना था कि कि इस चरमपंथी गुट के ख़िलाफ़ पर्याप्त आधार नहीं हैं.

जब सभी सुरक्षा परिषद सदस्यों ने चीन पर दबाव डाला तब लश्कर-ए-तैयबा/जमात-उद-दावा को चरमपंथी संगठन घोषित किया गया.

कुछ ही दिन पहले चीन ने अपने वीटो फिर इस्तेमाल किया था जब भारत हिज़्बुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन को हासिल करने की कोशिश कर रहा था.

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इस पृष्ठभूमि में लखवी मामले में चीन का पाकिस्तान का समर्थन करना अचंभित करने वाला कतई नहीं है.

अमरीका ने चुकाई थी कीमत

लेकिन भारतीय और चीनी प्रधानमंत्री के संयुक्त बयान में चरमपंथ के ख़िलाफ़ बढ़-चढ़ कर बातें किए जाने के बाद चीनी वीटो एक तरह से भारत की पीठ में छुरा भोंकना ही है.

इसलिए भी कि यह एक ऐसे व्यक्ति के हक़ में किया गया है जो पहले से चरमपंथी घोषित है और ऐसे हमले में शामिल रहा है जिससे भारत में बहुत से लोगों की गहरी भावनाएं जुड़ी हैं.

एक तरह से चरपमंथ के ख़िलाफ़ अपने घोषित रुख पर अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देकर चीन ने वैसा ही व्यवहार किया है जैसा अमरीका जैसे देश करते हैं.

अस्सी और 90 के दशक से अमरीकी बहुत आसानी से भारत के पाकिस्तान प्रायोजित चरमपंथ के विरोध को नज़रअंदाज़ करते रहे.

पहले तो पाकिस्तान ने पंजाब के खालिस्तानी चरमपंथियों को समर्थन करते हुए उन्हें ठिकाने और शरणस्थल उपलब्ध करवाए और फिर जम्मू-कश्मीर में उसने इस्लामिस्ट चरमपमंथी गुटों को भारत सरकार से लड़ने को भेजा.

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तब अमरीका पाकिस्तान का नज़दीकी सहयोगी था क्योंकि अफ़गानिस्तान में सोवियत संघ का कब्ज़ा था और उसे भारत की शिकायतों की कोई परवाह नहीं थी.

हालांकि इस पूरे वक्त, हालांकि अमरीका पाकिस्तान के पक्ष में था, भारत ने उसके साथ संबंध बनाए और अंततः कारगिल संघर्ष के दौरान अमरीका का पाकिस्तान के प्रति झुकाव ख़त्म हो गया.

लेकिन 9/11 हमलों के रूप में अमरीका को इस्लामिस्ट चरमपंथी गुटों की ओर आंखें मूंदने की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी.

चीन के मामले में भी भारत और चीन संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं हालांकि चीन का पाकिस्तान को समर्थन एक खिझाने वाली चीज़ तो बने ही हुए हैं.

जैसे कि अमरीका को पाकिस्तान प्रायोजित चरमपंथ के द्वेषपूर्ण समर्थन की सज़ा भुगतनी पड़ी है चीन को भी यही झेलना पड़ सकता है.

आगे दिखेगा असर

चीन के पूर्वी तुर्केस्तान या जिसे वह शिनजियांग कहता है वहां वीगर मुसलमानों के बढ़ते विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है.

शायद जब तक चरमपंथ की चुभन बुरी तरह खुद उसे नहीं होने लगती तब तक पाकिस्तान प्रायोजित चरमपंथ को लेकर चीन के दोहरे मापदंड खत्म नहीं होंगे.

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अपनी ओर से भारत को चीन को साफ़ कर देना चाहिए कि द्विपक्षीय संबंध तब तक नहीं फलेंगे और क्षमता से कम ही रहेंगे जब तक चीन भारत की संवेदनाओं को समझना शुरू नहीं करता और इस सूची में चरमपंथ सबसे ऊपर है.

हालांकि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर चीन के सहयोग की भारत ने सराहना की थी लेकिन जो भी साख चीन ने अर्जित की थी वह लखवी मामले पर वीटो कर खो दी है.

दूसरे शब्दों में चीन के लिए यह ठीक नहीं होगा कि वह योग दिवस जैसे हल्के मुद्दों पर तो भारत का समर्थन करे लेकिन चरमपंथ जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर टका सा जवाब दे दे, ख़ासतौर पर जब इसमें पाकिस्तान शामिल हो.

चरमपंथ और इसके प्रायोजक के पक्ष में मतदान कर चीन ने भारत को बेहद नकारात्मक संकेत दिया है द्विपक्षीय संबंध पर इसका असर आने वाले कुछ महीनों में महसूस किया जाएगा.

( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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