लेस्बियन विज्ञापन एक प्रतिरोध भी है..

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मेरे एक दोस्त ने कहा, "लेस्बियन के बारे में एक विज्ञापन आया है!"

मुझे लाइब्रेरियन सुनाई दिया था सो मैं थोड़ा कन्फ्यूज़ था, मुझे लगा ये अच्छी चीज़ है.

इस देश की पढ़ने की आदतों को लेकर मैं अक्सर चिंतित हो जाता हूँ. लेकिन तभी उसने मुझे वो विज्ञापन दिखाया. महिलाओं के कपड़ों के चर्चित ब्रांड ने अपने विज्ञापन में दो महिलाओं को दिखाया है जो एक दूसरे से प्यार करती हैं.

ये विज्ञापन बहुत ही सटीक और प्रभावी था. इसका मज़ाक उड़ाना काफ़ी मुश्किल था.

लेकिन क्या सचमुच ऐसा विज्ञापन छपवाना बहुत बड़ा क़दम था?

पहले मुझे भी यही लगा, लेकिन तभी मुझे परवीन बॉबी याद आ गईं.

परवीन बॉबी और रज़िया सुल्तान

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परवीन बॉबी वो हिरोइन थीं जो हमारी जवानी के दिनों में दिलों पर राज करती थीं. टाइम मैगज़ीन के कवर पर आकर भी उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया था.

लेस्बियन का मुद्दा भारत के लिए कोई नया विषय नहीं है, जैसा कुछ लोग बताना चाह रहे हैं.

1983 की फ़िल्म रज़िया सुल्तान में परवीन बॉबी और हेमा मालिनी एक आलीशान नाव में आनंद ले रही हैं. हेमा आंखें बंद करके लेटी हुई हैं, परवीन उन्हें एकटक निहारते हुए लोरी गा रही हैं.

एक बार हेमा की आँख खुलती है और वो दोनों एक दूसरे को चूमती हैं. उस समय चूमने के दृश्य किसी पर्दे की आड़ में दिखाए जाते थे तो ये सीन भी पंखों के पीछे होता है. पक्षियों के पंख, फूल या दुपट्टे उस दौर में ऐसे सीन में काफ़ी प्रयोग किए जाते थे.

इस विज्ञापन में थोड़ा आधुनिक रुख अपनाया है, जिसमें ज़्यादा पर्दा नहीं किया गया है. जिसकी वजह से देखने वाले इससे ज़्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं. आपको लग सकता है कि "ये लड़की तो मेरी क़जन है" या "मेरे दोस्त की बहन है."

लेकिन सिनेमा तो पहले आ गया था. भारत में सिनेमा सामाजिक परिवर्तन का एक बड़ा माध्यम रहा है.

सिनेमा बदलाव का माध्यम

भारत की स्वतंत्रता के बाद के फ़िल्मकारों की फ़िल्मों में नई-नई मिली आज़ादी की गुनगुनाहट महसूस की जा सकती है.

अपनी फ़िल्मों में सकारात्मक सामाजिक संदेश देने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती थी. ये एक तरह से राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा था.

1990 के दशक में हमें टेलीविज़न के बारे में एक अहम जानकारी मिली. आपको घर से निकलने की ज़रूरत नहीं. इसकी वजह से सिनेमा की अहमियत थोड़ी कम हुई.

जितना टीवी बढ़ता गया उतना ही विज्ञापन भी बढ़ता गया. यहीं से बाज़ार की भूमिका शुरू हुई.

टीवी के कई निर्माता अपने चालूपन के लिए बहुत ही बदनाम थे. उनके बारे में लोग दबे-छुपे बात करते थे.

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एक एपिसोड में जो तीर छोड़ा जाता था वो अपने टारगेट तक कई एपिसोड बाद पहुँचता था.

टीवी लेखकों को बहुत कम पैसे मिलते थे. विज्ञापन जगत में उसकी तुलना में ज़्यादा पैसे मिलते थे.

जिसके कारण विज्ञापन टीवी सीरियलों से बेहतर हुआ करते थे. विज्ञापन जगत के कुछ कॉपीराइटर अच्छी चीजें नहीं करना चाहते थे. क्लाइंट भी उन्हें सपोर्ट करते थे.

शायद यही वजह थी कि भारतीय विज्ञापनों में सामाजिक संदेश काफ़ी कम हुआ करते थे.

विज्ञापनों के तीन दौर

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मोटामोटी हमने भारतीय विज्ञापन के तीन दौर देखे हैं.

हम एक ग़रीब देश हैं इसलिए कुछ उत्पादों को अपना मार्केट ज़मीनी स्तर से बनाना पड़ता है.

1970 और 1980 के दशक में विज्ञापनों ने हमें बहुत बुनियादी चीज़ें सिखाईं, जैसे नहाने के फ़ायदे, ब्रश करने की अहमियत और आदमी को अपनी पत्नी के साथ क्यों अच्छे से पेश आना चाहिए.

ये दौर था जब हमने लिरिल साबुन के विज्ञापन में पहली बार बिकनी में किसी महिला को देखा. सो विज्ञापन मुझे आज भी अच्छी तरह याद है. मुझे आज भी उस विज्ञापन की लड़की का नाम याद है.

जिस तरह से समाज आगे बढ़ा, विज्ञापनों के संदेश भी आगे बढ़े.

दूसरे चरण में औरतें ज़्यादा अहम भूमिकाओं में दिखीं. विज्ञापनों ने दिखाया कि महिलाएं कपड़े ख़रीदने, क्रेडिट कार्ड प्रयोग करने या गाड़ी चलाने जैसे काम करने में सक्षम हैं.

तीसरा वर्तमान चरण

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तीसरा चरण, जो अभी चल रहा है, उसमें सामाजिक रूप से सचेत विज्ञापन वाले हकलाने की समस्या, त्वचा के रंग, कैंसर जैसी बीमारियों, बंटवारे (भारत-पाकिस्तान विभाजन) से उपजी त्रासदी और लेस्बियनों जैसे विषय उठाने लगे हैं.

आप पूछ सकते हैं कि लेस्बियनों के विज्ञापन को लेकर इतना शोर क्यों मचा.

क्या ये महिलाओं के ख़िलाफ़ कोई साजिश है? क्या कामसूत्र में लेस्बियनों पर कोई रोक है? क्या भारतीय समाज में समलैंगिकों की कोई जगह नहीं रही है? ये सच नहीं है.

यहाँ उदाहरण के लिए दो हज़ार साल पुरानी चर्चित मनु संहिता में समलैंगिकता से जुड़ा विधान देखें. इसमें समलैंगिकता के दंड के लिए कपड़े पहने हुए स्नान करने का विधान है. इसके बाद आप फिर से शुद्ध हो जाते हैं.

अगर आपको ये ज़्यादती लगती है तो ज़रा इसके इस विधान पर भी विचार करें जिसके अनुसार जबरदस्ती यौन संबंध बनाने पर तत्काल दो उंगलियाँ काट लेने का दंड है.

कौटिल्य की अर्थशास्त्र और राजनीति पर टीका में इस पर ज़्यादा अर्थशास्त्रीय नज़रिया अपनाया गया है और मामूली आर्थिक दंड का प्रावधान है.

कामसूत्र में समलैंगिकता

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Image caption खजुराहो के मंदिर में यौन संबंधों से जुड़ी कई मुद्राएं बनी हैं.

कामसूत्र में सभी तरह के यौन संबंधों पर विस्तार से लिखा गया है, जिनमें समलैंगिक संबंध भी शामिल हैं.

मानवीय इतिहास के सबसे बड़े चिकित्सकों में एक सुश्रुत की सुश्रुत संहिता क़रीब 600 ईसा पूर्व लिखी गई थी.

चिकित्सा के क्षेत्र में उनके कई योगदानों में से एक ये भी था कि नाक को फिर से कैसे जोड़ा जाए. उन्होंने समलैंगिक व्यवहार के प्रकार निर्धारित किए. उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि समलैंगिकता जन्मजात प्रवृत्ति है.

उन्होंने समलैंगिकों और किन्नरों के बीच भी फर्क किया है.

किन्नरों के लिए भारत में जीवन कभी बहुत आसान नहीं रहा है लेकिन फिर भी उनके लिए हमारे समाज में एक जगह रही है.

वो टीवी शो होस्ट कर चुके हैं. चुनाव में जनता का वोट पाकर जीत चुके हैं. कई बार तो उन्हें नेताओं को संदेश देने के लिए जिताया गया है.

1000 ईस्वी में बने खजुराहो मंदिर में यौन संबंधों से जुड़ी कई तरह की मुद्राएं बनाई गई हैं. उनमें से कुछ तो संभव भी नहीं लगतीं.

पाखंडी कैसे हो गए?

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Image caption महारानी विक्टोरिया

आप पूछ सकते हैं कि फिर ग़लती कहाँ हो गई? हम कबसे इतने पाखंडी हो गए?

इसकी बुनियादी वजह छोटे क़द की एक गोरी महिला. लेकिन क्वीन विक्टोरिया पर ही सारी ज़िम्मेदारी थोप देना उनके संग नाइंसाफ़ी होगी. इसमें हमारी भी एक भूमिका रही है.

ब्रितानी शासन के ख़िलाफ़ 1857 में हुए विद्रोह के दमन के बाद एक नई भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) विकसित हुई, जो 1861 में लागू हुई.

इसका मक़सद ऐसा क़ानून लागू करना था जिससे यहाँ के लोग दोबारा सिर न उठा सकें.

इस क़ानून को तैयार करने वालों ने अपनी ब्रितानी आकाओं की इच्छाओं भी का ख़्याल रखा.

क्वीन विक्टोरिया की यौन संबंधों के बारे में राय काफ़ी रूढ़िवादी थी. इसलिए 1861 के आईपीसी में मिशनरी पोजीशन (स्त्री नीचे, पुरुष ऊपर) के अलावा करीब करीब दूसरे किसी भी तरह से सेक्स करना आपराधिक बना दिया गया.

भरोसे के काबिल

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आज़ादी के क़रीब 68 साल बाद भी भारतीय शायद भरोसे के काबिल नहीं हैं, क्योंकि अब भी आईपीसी प्रभावी है.

यानी जिन लाखों लोगों ने यूट्यूब पर इस फ़िल्म को पसंद किया है उनके लिए ये महज एक फ़िल्म नहीं है.

उनके लिए ये एक नागरिक प्रतिरोध का तरीका है. इसमें एक ऐसे अपराध को होते हुए दिखाया गया है जिसके लिए भारतीय क़ानून की धारा 377 के तहत 10 साल तक की जेल हो सकती है.

मुझे नहीं पता इसके निर्देशकों को क्या सज़ा हो सकती है लेकिन अगर पुलिस अपना काम करती है, जैसा कि महारानी का आदेश था, हमें जल्द ही इस सवाल का जवाब मिल जाएगा.

(विज्ञापन जगत में काम करने वाले शोवोन चौधरी दिल्ली स्थित एमेच्योर ह्यूमरिस्ट हैं. 'मर्डर विद बंगाली कैरेक्टरिस्टिक' उनका दूसरा नॉवेल है.)

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