लकीरें हाथ में थीं तो मुक़द्दर थीं...

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पिछले दिनों दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडीटोरियम में गुलज़ार के एक नाटक ‘लकीरें’ का मंचन हुआ.

मशहूर रंगकर्मी एनएसडी के सलीम आरिफ़ ने इस नाटक का निर्देशन किया.

सलीम आरिफ़ गुलज़ार की कहानियों, नज़्मों, गीतों और ग़ज़ल को एक साथ पिरो कर दर्शकों के सामने नाटक के रूप में पेश करते रहे हैं.

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Image caption रंगकर्मी और निर्देशक सलीम आरिफ़

‘लकीरें’ के पहले गुलज़ार की कृतियों पर सलीम आरिफ़ ‘खराशें’ और ‘पांसा’ नाटक भी कर चुके हैं.

गुलज़ार की कहानियों और नज़्मों को नाटक में रूपांतरित करने को लेकर सलीम आरिफ़ कहना है, "अमूमन नाटक होते थे और कहानियाँ होती थीं. मैं उन्हें अपनी तरह से जोड़-तोड़ रहा हूँ. इस प्रयोग का बड़ा कारण यह है कि गुलज़ार साहब दोनों चीज़ें लिखते हैं और दोनों विधाओं में दक्ष लेखक कम हुए हैं."

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Image caption लुब्ना सलीम के साथ गुलज़ार

इस तरह के प्रयोग में दिक्कतों और सहूलियतों पर वो कहते हैं, "कहानी और कविता दो अलग विधाएं हैं, दोनों का लहजा अलग है...नाटकों की बुनाई कुछ ऐसी होती है कि दोनों एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाती हैं, कविताएं कहानी को और मजबूत करती हैं और कहानी, कविताओं को समझना आसान करती है."

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Image caption अभिनेता यशपाल शर्मा

सलीम के मुताबिक़, "हम कहानी को कहानी की तरह मंच पर प्रस्तुत करते हैं, लेकिन नाटकीयता तलाशनी पड़ती है, आप मंच पर कितना दिखा रहे हैं मसलन यशपाल शर्मा (अभिनेता) कहानी सुनाते-सुनाते पात्र बन जाते हैं."

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Image caption 'लकीरें' नाटक का एक दृश्य

कभी कभी कहानी में बदलाव भी करना पड़ता है. इस बारे में सलीम आरिफ़ का कहना है, "कहानी ‘कुलदीप नैयर और पीर साहब’ में माँ को हमने जोड़ा है, क्योंकि कहानी माँ के बारे में है तो चरित्र का स्टेज पर आना ज़रूरी लगा, हमने गुलज़ार साहब से बात की और उन्होंने कहानी में इसे लिखा."

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Image caption गुलज़ार और आरिफ़ सलीम

वो कहते हैं, "बिना वर्तमान परिदृश्य को नाटक में रखे मैं नाटक नहीं कर सकता, दर्शक को किसी म्यूजियम में तो ले नहीं जा रहे. मसलन सीमा पर सैनिक जिस तरह की मुसीबत का आज सामना कर रहा है उसे दिखाना तो होगा."

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Image caption नाटक में अभियन करने वाले अभिनेताओं और निर्देशक सलीम आरिफ़ के साथ गुलज़ार

वो कहते हैं, " नाटक ‘लकीरें’ में सीमा पर तैनात चौकीदार को न छुट्टी मिल रही है, न ही इतनी तनख्वाह कि वो अपने घर की मरम्मत करा सके. पात्र कहता है कि महंगाई तो इतनी बढ़ गई है, लेकिन सुना है कि संसद में खाना सस्ता मिलता है."

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नाटक में कविताओं के इस्तेमाल को लेकर वो कहते हैं, "नज़्मों से आसानी होती है और कभी ज़रूरत पड़े तो गुलज़ार साहब लिख देते हैं. 'लकीरें' में उन्होंने तीन नज़्में लिखीं, जिनमें एक से नाटक शुरू होता है और 'लकीरें' से ख़त्म होता है."

यह नज़्म कुछ यूं है-

''लकीरें हाथ में थीं तो मुक़द्दर थीं,

इन्हें हम बन्द रखते थे!

ज़मीनों पर बिछीं तो फिर समंदर, मुलक, घर, आंगन सभी को काटती गुज़रीं!"

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