'शुक्र है पीट कर छोड़ दिया, गोली नहीं मारी'

कश्मीर मे अफ़्सपा के पच्चीस साल इमेज कॉपीरइट EPA

साल 1993 की बात है. मेरे गृह राज्य भारत प्रशासित कश्मीर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (अफ़्सपा) लगे तीन साल हो चुके थे.

मैं उन दिनों उत्तरी कश्मीर के गुलमर्ग के पास के अपने गांव में रहता था. मेरा एक दोस्त गंभीर रूप से बीमार पड़ गया.

डॉक्टरों ने कहा कि अभी उसे किसी तरह श्रीनगर के मुख्य अस्पताल ले जाएं तो वह बच सकता है.

मैं गाड़ी चला रहा था. सड़क पर बहुत ज़्यादा गाड़ियां नहीं थी. लिहाज़ा, मैं निश्चिंत था कि समय रहते मैं उसे लेकर श्रीनगर पंहुच जाउंगा और उसका इलाज आसानी से हो जाएगा. इसमें बहुत ज़्यादा चिंता की बात नहीं थी.

रेंगते काफ़िले के पीछे मरीज़

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तभी मैंने पाया कि सड़क पर मेरे आगे सेना की गाड़ियों का बहुत बड़ा काफ़िला चल रहा था.

अपने अपने चेहरे ढके गाड़ियों की छतों पर चढ़े सैनिक लंबे लंबे बांसों से लोगों को किनारे होने को कह रहे थे. उनके हाथों में बंदूकें भी थीं.

पर गाड़ियों की रफ़्तार निहायत ही धीमी थी. मैं उनके पीछे धीरे धीरे गाड़ी चला रहा था. मेरी गाड़ी एक तरह से रेंग रही थी और मेरा दोस्त मुझ पर बुरी तरह झल्ला रहा था.

वह मुझे कोस रहा था कि मैं गाड़ी तेज़ क्यों नहीं चला रहा हूँ.

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मैं ऐसे काफ़िले के पीछे चल रहा था, जो कछुए की रफ़्तार से रेंग रहा था. मेरा दोस्त वाक़ई बहुत अधिक दर्द में था.

उसने दर्द से कराहते हुए ही मुझे बुरी तरह कोसना शुरू कर दिया. उसने चिल्ला कर कहा, “तुम गाड़ी का हॉर्न क्यों नहीं बजा रहे हो, तुम ओवरटेक कर इन गाड़ियों के बग़ल से निकल क्यों नहीं जाते. इसी रफ़्तार से तुम गाड़ी चलाते रहे तो मैं जल्दी ही मर जाउंगा.”

कहकहे और बीमारी

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यकायक गाड़ियों का काफ़िला थम गया. मुझे भी अपनी गाड़ी रोक देनी पड़ी. सैनिक गाड़ियों की छतों से कूद कर नीचे आ गए. वे कहकहे लगा रहे थे, हंसी मज़ाक कर रहे थे. उन्होंने गाड़ियां रोक सड़क के किनारे पेशाब की.

मेरा दोस्त अब तक अपना आपा खो चुका था. उसने मुझसे कहा, “अच्छा होता यदि मैंने टैक्सी ले ली होती. तुम तो ऐसे डरपोक हो कि हॉर्न भी नहीं दे सकते, न ही ओवरटेक कर आगे निकल सकते हो. लगता है मैं कभी भी अस्पताल नहीं पंहुच पाऊंगा."

मेरे दोस्त की किस्मत अच्छी थी कि थोड़ी दूर जाने के बाद सेना के काफ़िले ने अपना रास्ता बदल लिया और वह बाईपास की ओर मुड़ गया.

दर्द कम होने के बाद मैंने अपने दोस्त से गाड़ी धीमी चलाने और ओवरटेक नहीं करने का कारण उसे बताया.

'हॉर्न क्यों बजाया?'

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इस घटना के तीन महीने बाद मैं पट्टन के पास अपनी गाड़ी से कहीं जा रहा था. मेरी गाड़ी के आगे सेना की तीन गाड़ियां चल रही थीं. मैं जल्दबाज़ी में था.

मैंने उन्हें ओवरटेक करने की कोशिश की. सेना की गाड़ियां रुक गईं. उन गाड़ियों से सैनिक कूद कर बाहर निकले और उन्होंने मुझे दबोच लिया. 'हॉर्न क्यों बजाया?' उन्होंने पूछा.

मैंने उन्हें बताया कि मैं एक पत्रकार हूँ. मैंने कहा कि मैं जल्दबाज़ी में हूँ. उन्होंने मेरी गाड़ी की खिड़की के शीशे तोड़ दिए और मेरी जम कर पिटाई की. मेरी नाक से ख़ून निकलने लगा. मैंने बाद में एक बड़े अफ़सर से मुलाक़ात की और कहा कि मैं आर्मी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करना चाहता हूँ.

वह मेरा दोस्त था और उसने मुझे दोस्ताना सलाह दी. उसने कहा, “तुम्हारी तक़दीर अच्छी थी कि उन्होंने तुम्हें गोली नहीं मार दी. उनका यह कहना काफ़ी होता कि तुम संदेहास्पद ढंग से गाड़ी चला रहे थे और ख़तरनाक तरीके से उनकी ओर मुड़े थे. एफ़आईआर के बारे में तो भूल ही जाओ. वे बादशाह हैं. आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट ने उन्हें इतनी ताक़त दे दी है कि वे जो मर्ज़ी कर सकते हैं.”

सेना का ख़ौफ़

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आज भी मैं जब कभी आर्मी का काफ़िला देखता हूँ, अंदर से बुरी तरह डर जाता हूँ. सेना ने हमेशा यही कहा कि उसने कभी अफ़्सपा का ग़लत इस्तेमाल नहीं किया है. कश्मीर जैसे अशांत इलाक़े में ऐसा क़ानून होने की कई वजहें गिनाई गईं.

कश्मीर हमारे लिए सुंदर है और वह हमारी मातृभूमि है. पर वहां चरमपंथी हैं, जिन्हें भारतीय सरकार के मुताबिक पाकिस्तान हथियार देता है, चाहे पाकिस्तान इन आरोपों को ख़ारिज करता है.

ये चरमपंथी कुछ भी कर सकते हैं. वे अपहरण, हत्या, बलात्कार, लूट, मारपीट, लोगों को मार कर अपाहिज़ बनाने जैसा कोई भी काम कर सकते हैं.

वे किसी के प्रति ज़िम्मेदार भी नहीं हैं. दूसरी ओर हैं लाखों की तादाद में तैनात सैनिक. वे भी किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं.

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कश्मीर का आम आदमी इन दोनों के बीच पिस रहा है. लोगों का जीवन बदला है, पर यह पहले से ज़्यादा बुरा हुआ है. जंगल में उफ़नती नदियों के नाच की जगह ले ली है मौत के नंगे नाच ने. गीत गा रही बुलबुलों को एके 47 की गूंज ने ख़ामोश कर दिया है.

खुशबू में घुली बारूद की गंध

चीड़ और देवदार के जंगलों से छन कर आने वाली खुशबू में बारूद की गंध घुल गई है.

पूरा राज्य छावनी में तब्दील हो गया है. राजमार्ग, सड़कें, गलियां, गांव, शहर और कस्बे, हर जगह युद्ध की पोशाक में मुस्तैद सैनिक दिखते हैं.

उनके पास आधुनिक हथियार हैं और संदेह से घूरती आंखें हैं, जो हर किसी की आत्मा को छलनी कर देती हैं.

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यह जुलाई का महीना है. पांच जुलाई 1990 को ही भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर में अफ़्सपा लगाया गया था.

आज इसे 25 साल पूरे हो गए हैं. राज्य के लोगों के लिए कभी न ख़त्म होने वाले दुख के पच्चीस साल. सेना की मौजूदगी कम ज़रूर हुई है, पर तक़लीफ़ बरक़रार है.

एमनेस्टी की रिपोर्ट

मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी हालिया रिपोर्ट में अफ़्सपा को हटाने की मांग की है.

उसने बताया है कि किस तरह नियम क़ानूनों की धज्जियां उड़ाई गई हैं और किस तरह ऐसा करने वाले खुले आम घूम रहे हैं, क्योंकि अफ़्सपा उनकी हिफ़ाजत करता है और उन्हें किसी के प्रति जवाबदेह नहीं बनाता.

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उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली पिछली सरकार ने इसके लिए कोशिशें की थीं. तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम इसे हटाना चाहते थे, पर रक्षा मंत्रालय ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया.

मुफ़्ती मोहम्मद सईद की अगुवाई वाली मौजूदा सरकार इसी वादे पर सत्ता में आई कि वह अफ़्सपा हटाएगी.

लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीते दिनों ही श्रीनगर में कहा है कि अफ़्सपा हटाने का सही समय नहीं आया है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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