भाजपा को घेरने में कांग्रेस सफल हो पाएगी ?

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने व्यापमं मामले की सीबीआई जाँच की माँग को मंज़ूर करके फ़िलहाल अपने ऊपर बढ़ते दबाव को कम कर दिया है.

इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलों के कम होने के बजाय बढ़ने के ही आसार हैं.

व्यापमं मामला हाई कोर्ट में है. मुख्यमंत्री ने अदालत को सीबीआई जांच के लिए पत्र लिखने की घोषणा की है.

इस हफ्ते यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी आएगा. राज्य सरकार वहाँ भी सीबीआई जाँच की माँग करेगी.

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ऐसा लग रहा है कि अचानक भाजपा के घोटालों की वर्षा होने लगी है. चार राज्यों के भाजपा मुखिया कांग्रेस के निशाने पर हैं.

इनमें शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह पर सीधे आरोप हैं. वहीं महाराष्ट्र के देवेंद्र फड़नवीस को पंकजा मुंडे और विनोद तवाड़े के कारण घेरा गया है.

21 जुलाई से संसद का सत्र शुरू हो रहा है. सरकार के सामने भूमि अधिग्रहण और जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पास कराने की ज़िम्मेदारी है.

लेकिन लगता है कि घोटालों का शोर बड़ा होगा.

भाजपा का सूर्यास्त?

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क्या भाजपा के पराभव और कांग्रेस के उदय का समय आ गया है? क्या इतने सुनहरे मौके का कांग्रेस फायदा उठाएगी?

भाजपा की गिरती छवि पर संशय नहीं, कांग्रेस की क़ाबलियत पर शक ज़रूर है. फ़िलहाल राज्यों के सहारे केंद्र सरकार पर दबाव बनाने में कांग्रेस पार्टी काफी हद तक सफल हुई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह से ज़्यादा मौन हैं, बल्कि विदेश यात्रा पर निकल गए हैं. दूसरी ओर सोनिया और राहुल सामने नहीं आते.

यह काम दिग्विजय सिंह, रणदीप सुरजेवाला, चिदम्बरम, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और जयराम रमेश वगैरह को सौंपा गया है.

खास मौकों पर सन्नाटा

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क्या वजह है कि सोनिया, राहुल और प्रियंका महत्वपूर्ण मौकों पर नेपथ्य में चले जाते हैं? विश्व योग दिवस पर ये तीनों अज्ञातवास पर थे.

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में सोनिया, प्रियंका और राहुल को पार्टी पीछे रखती है. गरीबी, धर्म निरपेक्षता और पूँजीवाद के सैद्धांतिक प्रसंगों पर ही वे बोलते हैं.

वजह शायद यह है कि वे जैसे ही भाजपा के ‘भ्रष्टाचार’ शब्द का उच्चारण करते हैं, उनपर पलटवार होता है. इससे बचने की यह रणनीति है.

व्यापमं घोटाले को मध्य प्रदेश के गलियारों से निकाल कर दिल्ली तक लाने के अलावा भी कांग्रेस ने होमवर्क किया है.

नकारात्मक राजनीति से क्या होगा?

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पार्टी की फौरी रणनीति भाजपा को कलंकित करने की है. पर दीर्घकालीन उद्देश्य, केंद्र में वापसी का है. इसके लिए उसे राज्यों में अपनी गिरती दीवारों को बचाना होगा. यह बेहद मुश्किल काम है.

नकारात्मक काम भाजपा ने खुद किया. कांग्रेस ने उनका संकलन भर किया है. व्यापमं की जाँच 2जी की तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कराने से कांग्रेस को क्या मिलेगा? इससे यही साबित होगा कि 'ये भी हमारे जैसे हैं'.

भाजपा ने 2जी को लगातार ख़बरों में रखा था. पर केवल इसी वजह से उसकी सरकार नहीं बनी.

2जी के बावजूद आडवाणी-जोशी-सुषमा का नेतृत्व इतना दमदार नहीं था कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनती.

उस जीत में ‘नरेंद्र मोदी फ़ैक्टर’ और ‘नए मतदाता की उम्मीदों’ की भूमिका भी थी.

राहुल की आक्रामक वापसी

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राहुल कभी ख़ामोश, कभी अनुपस्थित, तो कभी आक्रामक हो जाते हैं. लम्बे अज्ञातवास के बाद उनकी आक्रामक वापसी भी सुर्खियों में रही.

पर यह सिर्फ वापसी थी. पार्टी की नई शक्लो-सूरत नहीं उभरी.

संसदीय बहसों में राहुल अपने पसंदीदा मसलों पर अपनी पसंदीदा टीम के साथ जाते हैं और फिर खामोश हो जाते हैं.

अप्रैल की किसान रैली के पहले रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल खुद बताएंगे कि पार्टी को फिर से उभारने की उनकी योजना क्या है. वह योजना अभी तक सामने नहीं आई है.

हाल में भाजपा ने दस करोड़ नए सदस्य बनाने का दावा किया है. उसके बरक्स कांग्रेस की सदस्यता उत्साहवर्धक नहीं रही. ज़मीनी स्तर पर पार्टी संगठन कमज़ोर हो रहा है.

राज्यों में संभावनाओं की तलाश

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कांग्रेस का लक्ष्य है नरेंद्र मोदी को परास्त करना. वह भी मोदी फॉर्मूला से. कोई अभिनव फॉर्मूला उसने नहीं गढ़ा. मान लीजिए, इस साल बिहार में भाजपा हार भी जाए तो भी कांग्रेस को क्या मिलेगा?

महागठबंधन में शामिल होकर पार्टी कुछ नए अंतर्विरोधों की शिकार भी होने जा रही है.

अगले साल केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव हैं. इनमें केवल असम और केरल में उसकी दावेदारी है. दोनों जगह हार का ख़तरा भी है, जबकि पार्टी को सफलता के शिखरों की तलाश है. पर वे कहाँ हैं?

साल 2017 के विधानसभा चुनावों में वह गोवा, पंजाब, और गुजरात में बाजी पलट सके, उत्तराखंड, हिमाचल में सत्ता कायम रखे और उत्तर प्रदेश में स्थिति बनाए रखे तो केंद्र की लड़ाई में उसका हक़ बनेगा, वरना नहीं.

साल 2018 में कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ उसके लिए बड़ी चुनौती साबित होंगे.

मानसून सत्र पर नज़र

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फिलहाल संसद के मानसून सत्र में उसके प्रदर्शन पर निगाहें हैं. यह साफ है कि राज्यसभा में उसकी मौजूदा बढ़त दो साल बाद ख़त्म हो जाएगी.

फिलहाल भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर बनी संयुक्त संसदीय समिति में अगले हफ्ते ही उसकी रणनीति और दूसरे दलों के साथ उसके समन्वय की परीक्षा होगी.

दरअसल कांग्रेस की परीक्षा केवल नकारात्मक राजनीति तक सीमित नहीं है. ज़्यादा बड़ी परीक्षा उसकी सकारात्मक राजनीति की है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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