नवाज़ ने कश्मीर का ज़िक्र क्यों नहीं किया ?

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भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच रूस में हुई मुलाक़ात को पाकिस्तान के उर्दू मीडिया ने अच्छी पहल बताया है, लेकिन कुछ सवाल भी उठाए हैं.

‘एक्सप्रेस’ ने नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ़ की मुलाक़ात को एक बड़ी प्रगति बताया है.

अख़बार लिखता है कि मोदी ने सत्ता में आते ही पाकिस्तान के प्रति आक्रामक नीति अपनाई थी, लेकिन अब उन्हें हक़ीक़त का अहसास होने लगा है.

अख़बार के मुताबिक़, मोदी को अहसास होने लगा है कि उनका रवैया न सिर्फ़ क्षेत्र में तनाव बढ़ाएगा, बल्कि विश्व स्तर पर भारत को भी इससे नुक़सान होगा क्योंकि अमरीका, चीन और अन्य ताक़तवर देशों ने मोदी के इस रवैये को पसंद नहीं किया है.

‘देश को बताएं नवाज़’

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‘नवा-ए-वक्त’ कहता है कि नवाज़ शरीफ़ देश की जनता को बताएं कि उन्होंने मोदी से मुलाक़ात में कश्मीर का ज़िक्र करना भी क्यों ज़रूरी नहीं समझा.

अख़बार के मुताबिक़, मोदी चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर का खुल कर विरोध कर रहे हैं तो भारतीय विदेश मंत्री ये याद दिला रही हैं कि कश्मीर को विश्व मंच पर उठाने से पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं होगा.

ऐसे में भारत से कैसे उम्मीद करें कि वो कश्मीर मुद्दे के शांतिपूर्वक हल की राह पर आएगा.

अख़बार लिखता है कि बावजूद इसके, नवाज़ शरीफ़ और पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय को अगर भारत से किसी तरह की उम्मीदें हैं तो वो वतन वापस आते ही संसद का सत्र बुलाएं और देश को मोदी से अपनी मुलाक़ात का ब्योरा दें.

कश्मीर

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‘जंग’ लिखता है कि पूरी दुनिया जानती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की असल वजह कश्मीर मुद्दा है और जब तक इसे कश्मीरियों की उम्मीदों के मुताबिक़ हल नहीं किया जाता, तब तक दक्षिण एशिया में स्थाई शांति की कल्पना नहीं की जा सकती.

अख़बार लिखता है कि अगर अमरीका और दूसरी बड़ी ताक़तें दक्षिण एशिया में वाक़ई शांति चाहती हैं तो उन्हें इस समस्या के उचित हल के लिए अपना क़िरदार अदा करना होगा.

रोज़नामा पाकिस्तान की टिप्पणी है कि अगर अमरीका और चीन एक दूसरे के क़रीब आ सकते हैं तो पाकिस्तान और भारत अतीत से निकल कर भविष्य की तरफ़ कदम क्यों नहीं बढ़ा सकते हैं.

तालिबान से बातचीत

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उधर 'रोज़नामा दुनिया' ने पाकिस्तान की मेज़बानी में अफ़गान सरकार और तालिबान की बातचीत जारी रखने के फ़ैसले का स्वागत किया है.

अख़बार लिखता है कि बेशक ये एक सकारात्मक पहल है लेकिन सवाल ये भी है कि इस बातचीत को नाकाम बनाने के लिए सक्रिय ताक़तों में से किसी ने कोई कार्रवाई कर दी तो फिर क्या होगा?

‘आज’ ने पाकिस्तान में इंटरनेट इस्तेमाल करने पर अतिरिक्त 14 फ़ीसदी टैक्स लगाने के संघीय सरकार के फ़ैसले की आलोचना की है.

अख़बार कहता है कि ये वृद्धि तब की गई है जब संघीय और राज्य की सरकारें शिक्षा के प्रोत्साहन और सूचना तकनीक के इस्तेमाल को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर बताती हैं.

कलई खुली?

रुख़ भारत का करें तो हर तरफ़ व्यापमं की चर्चा है.

‘जदीद ख़बर’ लिखता है कि भाजपा ने आम चुनावों में भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का वादा किया था, लेकिन व्यापमं घोटाले ने उसकी कलई खोल दी है.

वहीं ‘क़ौमी तंजीम’ ने व्यापमं की जांच सीबीआई को दिए जाने पर लिखा है कि हाई प्रोफाइल मामलों की जांच में सीबीआई का जो रवैया और रफ़्तार रहती है, उससे ज़्यादा उम्मीद तो नहीं बंधती, लेकिन अच्छी बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट जांच की निगरानी करेगा.

उधर, ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने एक टीवी इंटरव्यू में पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ के इस बयान को गैर जिम्मेदाराना बताया है कि अगर ज़रूरत हुई तो उनका देश एटमी हथियार का इस्तेमाल भी कर सकता है.

अख़बार के मुताबिक़ भारत ने भी इस पर ऐसी ही प्रतिक्रिया दी, लेकिन मोदी-शरीफ मुलाकात से ठीक पहले ऐसे बयान बातचीत में रोड़ा अटकाने की कोशिश के सिवाय कुछ नहीं हैं.

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