डिजिटल इंडियाः सस्ता भी, विश्व स्तर का भी?

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'मेक इन इंडिया' के बाद 'डिजिटल इंडिया' मोदी सरकार का अगला महत्वाकांक्षी अभियान है.

भारत के ढाई लाख गाँवों को इंटरनेट से जोड़ना, सरकारी योजनाओं को गाँव-गाँव तक पहुँचाना इसका लक्ष्य है.

इस अभियान के तहत क्या हो रहा है? मंसूबे कैसे पूरे होंगे? अड़चनें क्या हैं? एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं? डिजिटल इंडिया अभियान के हर पहलू की बारीक़ी से पड़ताल बीबीसी हिंदी की विशेष सिरीज़ में.

भारत में दूरसंचार क्रांति के जनक माने जाने वाले सैम पित्रोदा ने बीबीसी गूगल हैंगआउट में बताया कि कॉल ड्राप और कनेक्टिविटी जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे भारत में कैसे संभव है डिजिटल इंडिया क्रांति?

साथ ही पित्रोदा बता रहे हैं राजीव गांधी से अपने जुड़ाव के बारे में और नरेंद्र मोदी के बुलाने पर भारत वापस आने की संभावना पर.

मोदी सरकार को सुझाव देंगे, पर वापसी नहीं: पित्रोदा

पढ़ें सैम पित्रोदा के विचार

डिजिटल इंडिया की शुरुआत राजीव गांधी के समय में हुई थी. उन्होंने 1980 के दशक में नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर (एनआईएस, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र) बनाया था.

तब से हम इस क्षेत्र में बहुत सारे लोगों को प्रशिक्षित कर रहे हैं. सिस्टम विकसित कर रहे हैं. पिछले 30 सालों में हमने बहुत कुछ सीखा है. बहुत सी नई नई चीज़ें की हैं.

आज जब सरकार कह रही है कि डिजिटल इंडिया बन रहा है तो वो बस रीपैकेजिंग कर रही है. पिछले कई सालों में जो बन रहा है सरकार उसी काम को आगे बढ़ा रही है, जिसके लिए उसे बधाई देनी चाहिए.

ये भी समझना होगा कि केवल एक नई वेबसाइट बनाने से डिजिटल इंडिया नहीं बन सकता. सरकार को इसके लिए बड़े ढांचागत बदलाव करने होंगे. प्रशासन और न्यायपालिका क्षेत्र में व्यापक सुधार करना होगा.

देखें सैम पित्रोदा के साथ बीबीसी हिन्दी का गूगल हैंगआउट

कॉल ड्राप की समस्या

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लोग कॉल ड्रॉप और ख़राब कनेक्टिविटी की शिकायत करते हैं. हमें कॉल ड्रॉप और बैंडविथ को सुधारने के साथ ही डिजिटल इंडिया का ख़ाका भी तैयार करना है.

ये नहीं हो सकता कि जब तक कॉल ड्रॉप नहीं सुधारते तब तक डिजिटल इंडिया का काम बंद कर दें. हमें सभी चीज़ें एक साथ करनी हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि भारत में कॉल ड्रॉप एक बड़ी समस्या है. इसकी एक वज़ह ये है कि हमारे यहां प्रति फ़ोन वार्षिक राजस्व (रेवेन्यू पर यूज़र) बहुत ही कम है.

भारत में हर फ़ोन पर सरकार को क़रीब 6 डॉलर (लगभग 380 रुपए) है, जबकि दूसरे देशों में ये क़रीब 50 डॉलर (लगभग 3172 रुपए) है.

ऐसे में इतने कम राजस्व में नेटवर्क की गुणवत्ता पर ख़र्च नहीं किया जा सकता. ऐसे में जो ऑपरेटर्स हैं वो पैसा बचाते हैं.

मान लीजिए वो नेटवर्क बनाते हैं 20 हज़ार लोगों के लिए लेकिन उससे जोड़ लेते हैं 40 हज़ार लोगों को, ऐसे में कॉल ड्रॉप होना तो तय है.

इसका उपाय ये है कि जितने लोग हैं उतने लोगों के लिए नेटवर्क बनाया जाए. उसके लिए ज़्यादा ख़र्च आएगा, लोगों को कॉल की ज़्यादा दर देनी होगी.

मान लीजिए अगर 6 डॉलर के बजाय 12 डॉलर रेवेन्यू पर यूज़र कर दिया दिया जाए तो पैसा आएगा और नेटवर्क को बेहतर किया जा सकेगा.

लेकिन भारत में लोगों को सस्ता फ़ोन चाहिए. भारत में लोगों को बाक़ी दुनिया से पाँच-छह गुना सस्ता फ़ोन चाहिए लेकिन गुणवत्ता बाक़ी दुनिया जैसी चाहिए.

जनता को ऑपरेटरों पर भी दबाव बनाना चाहिए ताकि वो बेहतर गुणवत्ता दें.

मोदी का बुलावा आया तो?

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Image caption भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी.

राजीव गांधी के बुलावे पर मैं भारत आया था. मैं उस समय 10 साल रहा. मैंने अपनी नागरिकता तक बदल दी, अमरीकी से भारतीय हो गया.

मैंने उस दौरान बहुत सारा काम किया. टेलीफ़ोन, तकनीक मिशन, टीकाकरण, साक्षरता, पेयजल, दुग्ध उत्पाद जैसे मुद्दों पर काम किया.

लेकिन जब राजीव गांधी की हत्या हुई तो मुझे बहुत दुख हुआ. लोगों के लिए वो प्रधानमंत्री थे, मेरे लिए वो सब कुछ थे. मेरे लिए वो प्रेरक और दोस्त थे. उन्होंने हमें नई ज़िंदगी दी.

मैं जब तक भारत में था मैंने कभी वेतन नहीं लिया. एक रुपए में काम किया. अपना ख़र्च खुद वहन करता था. लेकिन बच्चों की पढ़ाई के चलते वापस अमरीका आना पड़ा.

बाद में मैं यूपीए शासन में फिर आया और नॉलेज कमीशन में काम किया.

अगर मोदी सरकार बुलाती भी है तो मैं वापस नहीं आऊँगा क्योंकि उनका हिसाब अलग है और मेरा अलग. लेकिन नागरिक होने के नाते सब काम करेंगे, हमें जो भी कहा जाएगा हम करेंगे लेकिन हमें कोई पद-वद नहीं चाहिए.

अगर हमारे देश को हमारे किसी काम से फ़ायदा होता है तो हम ज़रूर करेंगे.

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