आईआईटी: पिछड़े छात्रों से भेदभाव?

सोशल मीडिया पर छात्रों का अभियान इमेज कॉपीरइट facebook Page Take Them Back
Image caption बाहर निकाले गए छात्रों ने सोशल मीडिया पर 'टेक दैम बैक' नाम से अभियान भी चलाया है.

फ़ेल होने पर आईआईटी रुड़की से 73 छात्रों को निकाले जाने के बाद से छात्र और उनके परिजन आंदोलन पर उतर आए हैं.

निकाले गए छात्रों में से 90 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षित श्रेणी से हैं. राजनैतिक दलों से जुड़े छात्र संगठन भी छात्रों के पक्ष में आ गए हैं.

पहली बार किसी आईआईटी से इतनी बड़ी संख्या में छात्र निकाले गए हैं. छात्र संस्थान के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट जाने की तैयारी भी कर रहे हैं.

फ़ैसला वापस नहीं होगा

वहीं संस्थान का कहना है कि वह अपने फ़ैसले पर क़ायम रहेगा. रजिस्ट्रार प्रशांत गर्ग कहते हैं, “फ़ैसले में कोई परिवर्तन न किया गया है और न ही किया जाएगा.”

बीटेक के इन छात्रों का पहले वर्ष के दोनों ही सेमेस्टर की परीक्षा में मानकों से कम प्रदर्शन रहा था.

इस पर संस्थान की सीनेट ने आठ जून को हुई एक बैठक में इन्हें बाहर करने का फ़ैसला लिया था.

छात्रों ने आईआईटी प्रशासन के समक्ष दया याचिका डाली लेकिन कार्यकारी समिति ने सीनेट के फ़ैसले को ही बरक़रार रखा.

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Image caption आईआईटी प्रवेश परीक्षा को भारत की सबसे मुश्किल परीक्षाओं में से एक माना जाता है.

दोबारा मेहनत का मौक़ा मिले

निकाले गये छात्रों में से एक, अनुराग कहते हैं, “मैंने परीक्षा की पूरी तैयारी तो की थी लेकिन रिज़ल्ट बहुत अच्छा नहीं हो पाया. संस्थान को ऐसा नहीं करना चाहिए था. आगे और मेहनत कर सकते हैं.”

अभिभावकों भी ग़ुस्से में है. एक अभिभावक दलजीत सिंह कहते हैं, “ मेरे बच्चे की आईआईटी की तैयारी में डेढ़ लाख ख़र्च हुआ, पहले साल की पढ़ाई में दो लाख ख़र्च हो गए. अब उसका तीसरा साल भी ख़राब हो जाएगा, वो आगे क्या करेगा, उसका क्या भविष्य रह जाएगा?”

सही फ़ैसला

संस्थान का कहना है कि फ़ैसला नियमों के तहत है और 100 से अधिक प्रोफ़ेसरों की रज़ामंदी से किया गया है.

दो सेमेस्टरों में ख़राब प्रदर्शन करने वाले छात्रों को निकालने का नियम पिछले साल ही बनाया गया था. प्रवेश के वक़्त अभिभावकों से सहमित पत्र भी लिए गए थे.

आईआईटी संस्थानों में इस तरह के विवाद पहले भी हुए हैं.

आईआईटी दिल्ली ने 2009 में पांच छात्रों को खराब प्रदर्शन के कारण निष्कासित कर दिया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप किया और कहा कि छात्रों का प्रदर्शन सुधारने की ज़िम्मेदारी संस्थान की होनी चाहिए.

आईआईटी खड़गपुर में भी 2006 में ख़राब रिज़ल्ट पर बाहर निकाले गए छात्र अदालत के हस्तक्षेप के बाद वापस लिए गए थे.

प्रदर्शन

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Image caption बाहर निकाले गए छात्रों के समर्थन में छात्र संगठनों ने प्रदर्शन भी किया है.

छात्र अब इस लड़ाई को सोशल मीडिया और सड़क पर धरने प्रदर्शन और पोस्टरों के ज़रिए लड़ रहे हैं.

उन्हें नैनीताल हाईकोर्ट से भी उम्मीद है कि वो संस्थान से ज़्यादा छात्रों के हित देखेगा.

संस्थान से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मामला हाई कोर्ट जाने की रिपोर्टों के बाद अधिकारियों की बैठक बुलाई गई है.

छात्र भी सीनेट के समक्ष दोबारा दया याचिका करने का मन बना रहे हैं. ऐसे में संस्थान के लिये अपने फ़ैसले पर अडिग रहना आसान नहीं होगा.

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