तुरंत सफलता पर कम ध्यान देना चाहिएः मनु

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मनु पारेख मॉडर्न कंटेम्पररी आर्टिस्ट हैं और उनका जन्म 1939 में गुजरात में हुआ.

बहुत छोटी सी उम्र से उनमें एक चित्रकार के लक्षण दिखाई होने लगे थे.

पर मनु चित्रकार और ड्राइंग टीचर का फर्क नहीं जानते थे, तब दशरथ पटेल के मार्गदर्शन पर वे सर जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट, मुंबई पढ़ने चले गए.

दस साल वीवर्स सर्विस सेंटर, कोलकता में काम करने के बाद मनु दिल्ली चले आए.

1980 से मनु ने बनारस सीरीज़ की शुरुआत की जो अब तक चल रही है.

वो युवा चित्रकारों को नसीहत देते हैं कि तुरत फुरत मिलने वाली सफलता के पीछे भागने के बजाय वो ईमानदारी से अपनी कला पर ध्यान लगाएं.

मनु की पत्नी भी जानी-मानी चित्रकार हैं, उन्हें चित्रकला की तरफ प्रेरित करने से लेकर मार्गदर्शक की भूमिका भी मनु ने ही निभाई है.

1992 में मनु पारेख भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से नवाज़ा गया.

मनु की बेटी मनीषा पारेख भी जानी-मानी चित्रकार है.

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Image caption मनु पारेख कला में तकनीक को महत्वपूर्ण मानते हैं.
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Image caption उनका मानना है कि कला उस क्षितिज के समान है, जिसका कोई छोर नहीं इसमें अनंत संभावनाएं हैं.
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Image caption मनु के चित्र उनके आस-पास के वातावरण व समाज से प्रभावित होते हैं.
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Image caption अपनी रंगों से भरी तूलिका से चित्रकार जनभावनाओं को व्यक्त करता है.
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Image caption उनका कहना है कि चित्रकार के चित्रकर्म में उसके स्टूडियो का बहुत महत्व होता है.
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Image caption मनु पारेख का बनारस से विशेष लगाव है, आजकल वे बनारस सीरीज पर काम कर रहे हैं.
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Image caption मनु मानते हैं कि भारतीय ग्रामीण कलाकार तकनीक के बड़े माहिर हैं.
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Image caption मनु का कहना है, युवा कलाकारों को तुरंत मिलने वाली सफलता पर ध्यान न देते हुए ईमानदारी से चित्रकर्म में लगे रहना चाहिए. उनके चित्रों की प्रदर्शनी पहली बार 1968 में अहमदाबाद में लगी थी.

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