वो यूपी का 'आधा मुज़फ़्फ़रनगर' चाहते हैं

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पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री रहे लियाक़त अली ख़ान को अब भारत में कम ही लोग जानते हैं.

लेकिन कभी लियाकत अली ख़ान का परिवार उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में काफी संपत्ति का मालिक हुआ करता था.

इन दिनों उनके रिश्तेदारों और मुज़फ़्फ़रनगर के स्थानीय प्रशासन के बीच संपत्ति के मालिकाना हक़ को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है.

असल में वर्ष 1926 से लेकर 1940 तक पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान मुज़फ़्फ़रनगर से प्रांतीय विधान परिषद के सदस्य थे.

उनके पिता रुस्तम अली ख़ान के दो भाई और थे और बंटवारे के बाद जब लियाक़त अली ख़ान पाकिस्तान चले गए तो उनके चचेरे भाइयों के क़ब्ज़े में उनकी पुश्तैनी संपत्ति का कुछ हिस्सा आया जबकि कुछ सरकार के हिस्से में रही.

बंटवारे के बाद मुज़फ़्फ़रनगर के कंपनी गार्डन के पास का बंगला भी नीलाम हुआ.

कौन है वारिस?

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अब कुछ लोगों ने ख़ुद को लियाक़त अली ख़ान के परिवार की संपत्ति का वारिस बताते हुए उस पर मालिकाना हक़ का दावा ठोक दिया है.

उनके दावे के हिसाब से तो करीब-करीब आधा मुज़फ़्फ़रनगर उनका हो जाएगा. जिन संपत्तियों पर दावा पेश किया जा रहा है उनमें ज़िले के कलेक्टर के बँगले सहित रेलवे का प्लैटफॉर्म भी शामिल है.

लेकिन मुज़फ़्फ़रनगर के ज़िला प्रशासन ने इस दावे को 'धोखाधड़ी' बताया है. इस बारे में सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.

ज़िला मजिस्ट्रेट निखिल चंद्र शुक्ला ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि जिस संपत्ति पर दावा किया जा रहा है वो दर-अ-सल सरकारी है और दावा करने वालों के पास इसके मालिकाना हक़ के पुख़्ता सबूत भी नहीं हैं.

वो कहते हैं, " राजस्व के रिकॉर्ड में ये सरकारी संपत्ति है और सरकार के क़ब्ज़े में है. कुछ लोगों ने एक 'पार्टनरशिप डीड' बनाई और उसमें कुछ लोगों को शेयर देकर अपना साझेदार बनाया है. यह सब कुछ बनावटी है. राजस्व के रिकॉर्ड की हमने जांच कराई और उसके बाद ही प्राथमिकी दर्ज की."

वो कहते हैं कि रिकॉर्ड में कहीं भी दावेदारों के नाम नहीं हैं.

रेलवे स्टेशन पर भी दावा

मुज़फ़्फ़रनगर के ज़िला मजिस्ट्रेट का कहना है कि दावा करने वालों ने तो लोक निर्माण विभाग तक की सड़कों पर तक दावा ठोक रखा है.

प्रशासन के अनुसार कुछ लोगों ने वर्ष 2003 में खुद को लियाक़त अली ख़ान का रिश्तेदार घोषित कर दिया.

बाद में उन्होंने उत्तर प्रदेश के राजस्व आयोग के सामने अपना दावा पेश किया.

इसी दौरान कुछ लोगों ने मिलकर एक निर्माण कंपनी बनाई. इस कंपनी में वो लोग भी शामिल हैं जो लियाक़त अली ख़ान के चचेरे भाइयों के वंशज हैं. कंपनी में परिवार के बाहर के लोग भी हैं जो उनके साझेदार भी हैं.

इन्ही में से एक पंकज मित्तल भी हैं जिन्होंने आरोप लगाया है कि जिला प्रशासन की कार्रवाई एकतरफा है.

'प्रशासन की दुर्भावना'

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मित्तल कहते हैं, "यह सब कुछ प्रशासन दुर्भावना से कर रहा है. अफसरों को कुछ पता ही नहीं है. प्रशासन के लोगों ने इसे लियाक़त अली ख़ान से जोड़ दिया है जबकि इस संपत्ति से लियाक़त अली ख़ान का कोई लेना देना नहीं है."

वो आगे कहते हैं, "हकीकत यह है कि मुज़फ़्फ़रनगर के तीन ज़मींदार हुए. यह थे उम्रदराज़ अली ख़ान, रुस्तम अली ख़ान और अज़मत अली ख़ान. लगभग सभी संपत्तियों में यह तीनों भाई ही साझेदार रहे हैं. राजस्व के दस्तावेज़ों में उम्रदराज़ अली ख़ान की औलादों के नाम ही चढ़े हुए हैं."

यह उत्तर प्रदेश में दूसरा ऐसा मामला है जब किसी ज़मींदार की संपत्ति को लेकर इतना विवाद खड़ा हुआ हो.

इससे पहले महमूदाबाद के तत्कालीन राजा की संपत्ति के मालिकाना हक़ को लेकर इसी तरह का विवाद चला जो सरकारी क़ब्ज़े में थी.

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन राजा के हक़ में फैसला दिया था.

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