राजनीतिक फाँस बनी जातिगत जनगणना

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जाति आधारित सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़े अभी आधे-अधूरे ही जारी किए गए हैं.

पर इसने न केवल विकास के राष्ट्रीय मॉडल पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है, बल्कि उनके कारण राजनीति के मैदान में नई पेशबंदियों की शुरुआत भी हो गई है.

इन दोनों ही पहलुओं के परिणाम दूरगामी होंगे.

बोलते आंकड़े

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मसलन, ये आंकड़े बताते हैं कि देश के करीब 70 से 75 फ़ीसदी परिवार ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और उनमें से आधे से ज़्यादा ग़रीब हैं.

इन ग़रीब परिवारों में हर पांचवां परिवार दलित या आदिवासी है.

इस जनगणना के आंकड़े यह भी बता सकते हैं कि बाकी चार परिवार किन जातिगत समुदायों से ताल्लुक रखते हैं.

तथ्यगत सचाई का यह हिस्सा सरकार ने अभी जानबूझ कर सामने नहीं आने दिया है.

चुनौती

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नीति आयोग के मुखिया अरविंद पनगढ़िया को एक ऐसा सुरक्षित तरीका ईजाद करने का ज़िम्मा दिया गया है जो इस सच्चाई को विकास के मौजूदा शहर आधारित नव-उदारवादी कॉरपोरेट मॉडल के ख़िलाफ़ जाने से रोके. इसके अलावा वह भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक हितों को भी सुरक्षित करे.

पनगढि़या साहब की कम से कम यह कोशिश तो होगी ही कि वे ग़रीबी के चरित्र को ग्रामीण न साबित होने दें.

अब देखना यह है कि अमरीका से लौटा अर्थशास्त्री ऐसा कमाल कैसे दिखा पाता है?

अगर ग़रीबी की संरचना देहाती साबित हो गई तो स्मार्ट सिटी बनाने का पूरा आधार ही ढह जाएगा.

साथ ही यह मान्यता भी ग़लत साबित हो जाएगी कि देश तेज रफ़्तार से शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है.

उस सूरत में दलील यह बनेगी कि अगर शहरीकरण पर्याप्त नहीं हुआ है तो आर्थिक संसाधनों का बंटवारा शहरों की तरफ क्यों झुका होना चाहिए?

चुनाव पर असर?

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भाजपा जब विपक्ष में थी तो जाति आधारित जनगणना का विरोध करती थी.

लेकिन, फिर भी यह गिनती हुई और अब इससे निकलने वाली सच्चाइयों के अंदेशे पार्टी के गले में फँसे हुए हैं.

सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि इस हकीक़त से सबसे पहले बिहार का चुनाव प्रभावित हो सकता है.

अगर इन आंकड़ों ने दिखा दिया कि बिहार में पिछड़ी जातियां अगड़ी जातियों से बहुत ज्यादा पीछे चल रही हैं तो अक्तूबर-नवंबर के चुनाव में पिछड़ा वर्ग एक बार फिर एकजुट हो सकता है. इसी एकजुटता को भाजपा ने पिछले नौ साल में धीरे-धीरे तोड़ कर राजनीति को अपने पक्ष में मोड़ा है.

इस तथ्य को नीतीश कुमार भी मानते हैं कि 2009 के चुनाव में और फिर 2014 के चुनाव में अति पिछड़े मतदाताओं ने बड़े पैमाने पर भाजपा का साथ दिया था.

कारगर रणनीति

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लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को बिहार में अति पिछड़े के रूप में ही पेश किया था. सच यह है कि न तो मोदी की घाँची जाति गुजरात में अति पिछड़ों की श्रेणी में आती है और न ही बिहार में उसका तेली संस्करण अति पिछड़ा माना जाता है.

फिर भी यह रणनीति बड़ी कारगर साबित हुई. दरअसल, अति पिछड़े मतदाताओं की संख्या कोई 30-35 फ़ीसदी (कहार,कुशवाहा,धानुक और ऐसी ही बहुत सी छोटी-छोटी जातियां) मतदाताओं में सबसे ज़्यादा है.

इनके मुक़ाबले खुशहाल पिछड़े मतदाता (यादव-कुर्मी वगैरह) केवल 13-15 फ़ीसदी हैं.

एक बार फिर ये अति पिछड़े मतदाता ही बिहार का राजनीतिक भविष्य तय करने वाले हैं.

किसे होगा लाभ?

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पिछड़े वर्ग का रुझान लालू-नीतीश-कांग्रेस के महागठजोड़ की तरफ तभी हो सकता है जब वर्ग की अस्मिता खुशहाल-बदहाल के फ़र्क पर छा जाए.

यही लालू यादव चाहते हैं. इसीलिए, वे इस जनगणना के पूरे आंकड़े जारी करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं.

इस मसले को जितने ज़ोरदार ढंग से उठाया जाएगा, भाजपा को उतने ही राजनीतिक उलझन का सामना करना पड़ेगा. लेकिन, अगर जातिगत आंकड़ों से यह निकला कि बचे हुए चार ग़रीब परिवारों में दो ऊंची जातियों के हैं और दो अतिपिछड़े वर्ग के, तो इनका लाभ भाजपा को मिल सकता है.

भाजपा ऊंची जातियों और अति पिछड़ों का सामाजिक गठजोड़ बनाना चाहती है.

अगर ऐसा हुआ तो नरेंद्र मोदी की बिहार में राह आसान हो जाएगी. निकट भविष्य में आरक्षण की नीति का चरित्र भी बड़े पैमाने पर बदल सकता है.

ऊंची जातियों को आरक्षण दिए जाने की मांग इससे और ज़ोर पकड़ेगी. कुल मिला कर जाति आधािरत जनगणना राजनीतिक रूप से एक दुधारी तलवार है. यह किसे घायल करेगी और किसकी हिफ़ाजत करेगी, यह भविष्य में ही पता चलेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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