व्हाट्स ऐप, स्काइप से मुफ़्त कॉल नहीं हो पाएगी?

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दूरसंचार विभाग (डीओटी) की एक कमेटी ने व्हाट्स ऐप और स्काइप जैसी सेवाओं और उन पर हो रही मुफ्त कॉल को देश के अंदर बंद करने की सिफारिश की है.

इसमें लोकल और एसटीडी दोनों कॉल शामिल हैं. अगर कंपनियां चाहती हैं कि उनके नेटवर्क पर लोकल या एसटीडी कॉल हों, तो उनको दूरसंचार विभाग से लाइसेंस लेना पड़ेगा.

लेकिन अगर उन्हीं कंपनियों के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय कॉल करने की इजाज़त दे दी गई है. उसके लिए कंपनियों को लाइसेंस लेने की कोई ज़रूरत नहीं होगी.

रिपोर्ट को समिति ने पिछले महीने दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद को दिया था. सरकार फिलहाल इस मुद्दे पर विचार कर रही है.

समिति की तरफ से जो रिपोर्ट दी गई है वो सिर्फ सुझाव हैं.

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लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के लिए बढ़ती होड़ वाली स्थिति में अगर इन सुझावों को मान लिया गया तो मोबाइल फ़ोन कंपनियों के लिए जीत होगी और देश के करीब 98 करोड़ मोबाइल ग्राहकों की हार.

वजह साफ़ है. व्हाट्स ऐप, स्काइप, वाइबर और निंबज़ जैसी कंपनियों की सर्विस इंटरनेट पैक खरीदने के बाद ग्राहकों को मिलती है.

एक बार अगर इंटरनेट कनेक्शन के लिए फ़ोन कंपनियों को पैसा दे दिया उसके बाद दूसरी कंपनियों को भी पैसा देना ज़्यादती होगी.

एक दूरसंचार विभाग के अधिकारी ने कहा, "व्हाट्स ऐप और वाइबर जैसी कंपनियों ने हमसे कहा है कि ग्राहक एक ही सर्विस खरीदने और इस्तेमाल करने के लिए भला दो बार पैसे क्यों दे."

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कॉल

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टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि उन्होंने लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के लिए पैसे दिए हैं और उनके नेटवर्क का इस्तेमाल करके व्हाट्स ऐप, स्काइप और निंबज़ जैसी कंपनियां फ़ोन पर कॉलिंग सेवा मुफ्त नहीं दे सकती हैं.

लेकिन अंतर्राष्ट्रीय कॉल और देश के अंदर के कॉल को आखिर कैसे अलग किया जाएगा?

निंबज़ के सीईओ विकास सक्सेना का कहना है कि, "ये करना तो संभव है, लेकिन ये किसी तलवार से मक्खी मारने जैसी बात होगी."

व्हाट्स ऐप, स्काइप, वाइबर और निंबज़ जैसी कंपनियां जो सेवा देती हैं उन्हें 'ओवर द टॉप' या ओटीटी सर्विस कहते हैं.

ओटोटी सेवाएं टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिए ही काम करती हैं. लेकिन ये सर्विस इंटरनेट कनेक्टिविटी होने पर ही काम करती हैं.

मुफ़्त कॉल

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ऐसी दर्जनों ओटीटी कंपनियां हैं जिसके ज़रिये आप मुफ्त फ़ोन कॉल कर सकते हैं.

दूरसंचार विभाग की कमेटी के रिपोर्ट के मुताबिक़, फ़ोन कंपनियों को और व्हाट्स ऐप, स्काइप, वाइबर और निंबज़ जैसी कंपनियों को ट्राई के नज़रिए से एक जैसा ही माना जाना चाहिए.

मतलब टेलीकॉम कंपनियों की तर्ज पर व्हाट्स ऐप, स्काइप, वाइबर और निंबज़ जैसी कंपनियों को भी सरकार से लाइसेंस उन्ही शर्तों पर लेना चाहिए, जिनपर दूसरी कंपनियों को मिला है.

विकास सक्सेना ने माना कि रिपोर्ट अगर लागू कर दी गई तो ओटीटी कंपनियों के लिए ये धक्का होगा.

टेलीकॉम कंपनियां चाहती हैं कि ओटीटी कंपनियों की सर्विस के कारण उनकी कमाई पर कोई असर न हो.

लाइसेंस

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अगर व्हाट्स ऐप जैसी कंपनियों को अपनी सर्विस के लिए लाइसेंस लेना पड़ेगा तो ग्राहकों से उन्हें भी पैसे लेने पड़ेंगे. उसके बाद ये कंपनियां मुफ्त में अपनी सेवाएं नहीं दे पाएंगी.

फिलहाल वॉइस कॉल के लिए टेलीफ़ोन कंपनियां पचास पैसे प्रति मिनट तक ग्राहकों से लेती हैं.

इसके मुकाबले उन्हें वीओआईपी (वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल- इंटरनेट के जरिये वॉइस कॉल) कॉल के लिए सिर्फ चार पैसे प्रति मिनट मिलते हैं.

इन दोनों में कौन सी स्थिति कंपनियों के लिए बेहतर है ये साफ़ है. अगर व्हाट्स ऐप जैसी कंपनियों को विदेशी कॉल की इजाज़त बिना लाइसेंस के दी जाती है तो फ़ोन कंपनियों की कमाई पर कोई ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उनकी सिर्फ आठ फीसदी कमाई विदेश में हो रही कॉल्स से होती है.

एयरटेल ज़ीरो जैसी स्कीम के ख़िलाफ़ समिति ने साफ़ किया है कि उसकी इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए.

सस्ती कॉल

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मुद्दा एक और भी है - टेक्नोलॉजी का. अगर टेक्नोलॉजी की वजह से आज लोगों को सस्ती कॉल करने का फायदा मिल रहा है तो क्या उन्हें फायदा लेने से रोकना चाहिए?

अगर मोबाइल उपभोक्ता अपने किसी दोस्त को ऑडियो नोट या वीडियो कॉल के ज़रिये संदेश देते हैं तो ये साफ़ नहीं है कि उसको अंतर्राष्ट्रीय कॉल माना जाएगा या देश के अंदर का.

विकास सक्सेना का कहना है कि जो मौजूदा टेलीकॉम की बुनियादी संरचना है उसका बेहतर इस्तेमाल करने के तरीके खोजने होंगे.

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ओटीटी सेवाओं से कॉल अगर सस्ते होते हैं तो उससे फायदा लोगों को ही होगा.

करीब 20 साल पहले सभी के पास पेजर होना आम बात थी. लेकिन जैसे जैसे मोबाइल फ़ोन आये पेजर का धंधा बंद हो गया. टेक्नोलॉजी ने लोगों को विकल्प दिया और उसका फायदा सभी को हुआ.

अब सवाल ये है कि क्या टेक्नोलॉजी की रफ़्तार एक बार फिर हम सब की सोच से आगे चल रही है?

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