'मां उन्होंने मुझे ग़लती क्यों कहा?'

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निरुशा निख़त मुंबई की जानी-मानी फ़ैशन डिज़ाइनर हैं. इलाहाबाद के एक निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार से मुंबई तक के सफ़र में उन्होंने काफ़ी संघर्ष किया और मायानगरी में अपना मुक़ाम बनाया.

ज़ाहिर है वह एक मज़बूत औरत हैं लेकिन जब उन्होंने शादी किए बिना मां बनने का फ़ैसला किया तो यह उनके लिए आसान नहीं था.

उसके बाद एक अकेली मां का संघर्ष शुरू हुआ.

बीबीसी संवाददाता रूपा झा ने निरुशा निख़त से बात की तो उन्होंने अपने फ़ैसले से लेकर अपने संघर्ष तक के बारे में बताया.

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निरुशा निख़त की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी

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मैंने बहुत सोच समझ कर फैसला किया कि इस बच्चे की मैं मां बनूंगी और पिता भी रहूंगी. एक लड़की अगर बलात्कार के कारण मां बन जाती है तो उस बच्चे को किसका नाम मिलता है?

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या कभी आप किसी ऐसे संबंध में होते हैं जिसमें पुरुष विवाहित होता है और आप उसका नाम नहीं दे सकते. उस मामले में आप किसका नाम बताएंगे.

ऐसी हालात में आगे चलकर बच्चे के अंदर भी एक शर्मिंदगी आती है. इससे बेहतर है कि आप ख़ुद उसे अपने नाम से पालिए.

पहले ख़ुद इज़्ज़त दो

एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे लीक से हटकर फ़ैसले के साथ-साथ आप ज़िंदगी में अपना मुक़ाम क्या बनाते हैं?

अगर मैं पढ़ी लिखी नहीं होती, अपने पैर पर ख़ुद खड़ी नहीं होती तो मुझे पता है मेरे लिए मुश्किलें और भी बढ़ जातीं.

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सबसे पहले तो आप ख़ुद को इसके लिए तैयार करिए कि आप इस फ़ैसले को सम्मानपूर्वक लेना चाहते हैं, मैंने इसे इज़्ज़त के साथ लिया था.

अगर आप किसी चीज़ को इज़्ज़त देते हैं तो दुनिया उसे इज़्ज़त देने पर मजबूर हो जाती है. अगर मैं इस पर शर्मिंदा होती तो मैं दुनिया में किसी को नहीं बोल सकती थी कि आप इसे इज़्ज़त दें.

मैंने अपने बच्चे को बहुत इज़्ज़त दी, दुनिया में हर जगह दिलवाई. स्कूल से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक.

स्कूल में दाख़िला

स्कूलों की विचारधारा ऐसी होती है कि एक बच्चे की अच्छी परवरिश तभी हो सकती है जब मां और बाप दोनों उसके साथ हों.

इसीलिए जब स्कूलों में बच्चे के दाख़िले से पहले जब मां-बाप के इंटरव्यू होते हैं तो वह देखना चाहते हैं कि दोनों की आपसी समझ कैसी है.

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ऐसे में, एक अकेली मां- वह भी अविवाहित, विधवा को शायद वह इज़्ज़त दे देंगे, लेकिन एक अविवाहिता मां की अवधारणा उनके पास कभी थी ही नहीं, ना है और कभी आएगी भी, इसके बारे में पता नहीं.

हिंदुस्तानी समाज के लिए अभी इसे स्वीकार करना आसान नहीं है. उनके लिए एक अविवाहित मां एक काले धब्बे की तरह है, जो कहीं न कहीं बदचलन ही हो सकती है.

सबसे पहले तो स्कूल ने मुझे उस स्तर पर ही ख़ारिज कर दिया. लेकिन चूंकि मेरी शिक्षा अच्छी है- मैंने समाजशास्त्र, मध्यकालीन इतिहास में एमए किया है.

मैंने मुंबई शहर में अपना मुक़ाम बना लिया था. स्कूल ये सब देखकर - दाख़िले के लिए राज़ी हुआ लेकिन बात फिर वहीं पर अटक गई कि आपको फॉर्म में पिता का नाम भरना पड़ेगा.

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Image caption जाने माने फिल्मकार संजय लीला भंसाली के साथ निरुशा निखत

लेकिन इसके लिए मैं तैयार नहीं थी. मेरे लिए पिता वह है जो बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाता है. नाम कभी बच्चे का पिता नहीं हो सकता. सिर्फ़ कुलनाम लगाने से हम बच्चे को पिता नहीं दे सकते- कि नाम के पीछे ख़ान या बजाज या शर्मा लगा दिया तो बच्चे को पिता मिल गया.

इसके बाद कोर्ट में याचिका दायर की वहां से अपने हक़ में जीत हासिल की और बिना पिता के नाम के उसका दाख़िला करवाया.

'ग़लती क्यों कहा'

इसके बाद जब बच्चे का पासपोर्ट बनवाने गई तो मेरे पास स्कूल का अनुभव था. मैं अदालत से पूरे काग़ज़ात तैयार करवा के ले गई.

अब चूंकि पासपोर्ट बच्चे का है इसलिए बच्चे को ले जाना ज़रूरी है. वहां 50-60 साल की एक औरत ने कहा कि ग़लती आप करते हो और भुगतना बच्चे को पड़ता है.

इसका बच्चे पर इतना असर पड़ा कि जब हम वापस लौट रहे थे तो मेरे बच्चे ने मुझसे पूछा- मम्मी उन्होंने मुझे ग़लती क्यों कहा?

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हालांकि मेरा बेटा काफ़ी संवेदनशील और परिपक्व है, लेकिन वह एक लफ़्ज़ मेरे दिमाग़ में अटक गया. फिर मैंने सोशल मीडिया- फ़ेसबुक, ट्विटर के ज़रिए एक बहुत लंबी लड़ाई लड़ी. मैंने पासपोर्ट आॉफिस की उस महिला से माफ़ी मांगने को कहा और उन्होंने मांगी भी.

अब काग़ज़ात पूरे हो गए हैं और पासपोर्ट मिल जाएगा, बिना पिता के नाम के. नौ साल के इस लंबे सफ़र के बाद अब तो आगे रोशनी से भरा लगता है रास्ता.

मुझे पता है कि मैंने अपनी पूरी इमानदारी से अपनी ज़िंदगी जी है. मेरा समाज अब मेरी इज़्ज़त करता है लेकिन मुझे पता है इसे कमाने में कितना कुछ मेरे अंदर टूटा है. बेटे को देखकर मैं ख़ुश हूं.

अपने बेटे से मैं यही चाहती हूं कि उसके दिल में औरतों के लिए बहुत ज़्यादा इज़्ज़त रहे, जो इज़्ज़त उसके दिल में अपनी मां के लिए है, वही इज़्ज़त बाकी सभी औरतों के लिए भी रहे.

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