बाहर तूफ़ान तो संसद में शांति कैसे रहेगी?

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री, भाजपा इमेज कॉपीरइट Reuters

भारतीय संसद के मॉनसून सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संसद की कार्यवाही चलने देने, न देने को लेकर ठनी हुई है.

विपक्षी दल भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान के मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं. वहीं भाजपा इस माँग को जायज़ नहीं मान रही.

संसद की कार्यवाही में उत्पन्न गतिरोध को लेकर बुद्धिजीवी तबक़े में भी बहस हो रही है.

भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में संसद की कार्यवाही का हंगामाख़ेज़ होना स्वाभाविक है.

पढ़ें लेख विस्तार से

इमेज कॉपीरइट PTI
Image caption जद(यू) नेता केसी त्यागी(फ़ाइल फ़ोटो)

जनता दल (यूनाइटेड) के नेता केसी त्यागी ने भारतीय जनता पार्टी के अपने पूर्व-सहयोगियों से पूछा है कि पिछली सरकार के ज़माने में हमने और आपने मिल कर संसद को चार महीने तक नहीं चलने दिया था. इसलिए आप हफ़्ते भर में ही क्यों घबरा रहे हैं?

त्यागी के इस सवाल का भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है. लेकिन, मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग में मोदी सरकार का समर्थन करने वाले पत्रकारों, एंकरों और टिप्पणीकारों के पास कहने के लिये कुछ ऐसा है जिसपर विचार किया जाना चाहिए.

संसद ठप्प किए जाने के मुद्दे पर चार प्रमुख तर्क दिए जा रहे हैं.

पहली दलील ये है कि जो भाजपा ने किया था वह कांग्रेस को नहीं करना चाहिए क्योंकि तब कांग्रेस ही कहती थी कि भाजपा ठीक नहीं कर रही है.

दूसरा तर्क

इमेज कॉपीरइट AFP AND REUTERS

दूसरा तर्क है कि संसद को हंगामा करके न चलने देना विकास-विरोधी रवैया है. जो सांसद संसद चलने न देने के पक्ष में हैं उन्हें अपना वेतन और भत्ता लेने का कोई अधिकार नहीं है.

तीसरे, संसद न चलने पर प्रति दिन करोड़ों रुपयों की जो हानि होती है, वह ख़र्चा आख़िरकार जनता की जेब से ही जाता है.

चौथे, भारतीय लोकतंत्र के नियम-क़ानूनों में कुछ ऐसा सुधार किया जाना चाहिए जिसके तहत हर पार्टी के सांसद संसद में काम करने के लिये मजबूर हों, ताकि किसी भी क़ीमत पर सदन को ठप्प न किया जा सके.

ये तमाम दलीलें पहली नज़र में जायज़ लगती हैं. इनके पक्ष में यूरोपीय देशों के उदाहरण भी दिए जा रहे हैं. लेकिन, असलियत में ये तर्क या तो राजनीति-विरोधी हैं या राजनीतिक हक़ीक़त को नज़रंदाज़ करके दिए जा रहे हैं.

भारतीय विशेषता

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption राहुल गांधी की रैली में कांग्रेस समर्थक

भारतीय लोकतंत्र की यह ख़ास विशेषता है कि यहाँ हर घटना राजनीति के ज़रिए ही अपना आकार-प्रकार ग्रहण करती है. चाहे वह अर्थनीति हो, विदेशनीति हो या रोज़ाना की पार्टी-पॉलिटिक्स. पश्चिमी लोकतंत्रों में स्थिति अलग है.

वहाँ का विकास कुछ इस तरह हुआ है कि अर्थनीति, विकासनीति और विदेशनीति वग़ैरह ठोस राजनीतिक प्रक्रिया से काट कर अलग कर दी गई है.

यही कारण है कि इन मामलों में वहाँ सत्ता-पक्ष और विपक्ष के बीच हमेशा एक राष्ट्रीय क़िस्म की आम सहमति बन जाती है.

वोटों की गोलबंदी के समय होने वाली बहसें मुख्य तौर पर नीतियों को अपने विरोधियों के मुक़ाबले ठीक से लागू कर पाने या न कर पाने के दावेदारियों के इर्द-गिर्द होती हैं.

संसद में होने वाली बहसों पर सभा-गोष्ठी क़िस्म का या वकीलाना अंदाज़ छाया रहता है. इसके उलट भारत में इन तमाम सवालों पर बुनियादी बहस होते हुए राजनीति होती है, क्योंकि हमारा लोकतंत्र बहुत से मसलों पर बनने की प्रक्रिया में है.

यूरोप से अलग

हमारे देश की समस्याएँ यूरोपीय लोकतंत्रों के मुक़ाबले कहीं जटिल हैं. इसीलिए राजनीति में अधिक टकराव, तनाव और कड़वाहट दिखाई देती है. जो संसद के बाहर होता है, उसका असर संसद की कार्यवाही पर पड़ना लाज़िमी है.

संसद के बाहर राजनीति में अशांति रहने पर संसद के भीतर की राजनीति कभी शांतिपूर्ण नहीं हो सकती.

जब भारत का प्रधानमंत्री चुनाव जीतने के बाद विदेशों में जा कर पिछली सरकारों पर सार्वजनिक आरोप लगाता है कि उन्होंने भारत का नाम डुबाया था, तो उसे विपक्ष से किसी क़िस्म की हमदर्दी या गुंजाइश की उम्मीद क्यों करनी चाहिए?

मिसाल के तौर पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी राहुल गाँधी को धमकी दे सकते हैं कि अगर उन्होंने सुषमा स्वराज को अपराधी कहने के लिए माफ़ी नहीं माँगी तो वे उन पर मानहानि का मुक़द्दमा कर देंगे.

लेकिन, वही नितिन गडकरी कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी को यह धमकी नहीं दे सकते, बावजूद इसके कि येचुरी ने भी ठीक वही कहा है जो राहुल ने कहा था.

येचुरी से अलग बर्ताव

येचुरी ने तो भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून की धाराएँ तक पढ़ कर बताईं थी कि सुषमा भ्रष्टाचार के किस मामले में फँसी हुई हैं.

गडकरी राहुल की तरह येचुरी को अदालत में क्यों नहीं घसीट सकते? इसलिए कि राहुल ने वही बात संसद के बाहर कही है, और येचुरी ने संसद के भीतर.

बात एक ही है, और एक ही तरह की राजनीति से निकली है. लेकिन, भाजपा को एक का विरोध करने के लिये अलग रणनीति अपनानी पड़ रही है, और दूसरे के लिए अलग. इसके बावजूद वह संसद के बाहर और भीतर को अलग-अलग कर पाने में नाकाम है.

वास्तव में राजनीति संसद के बाहर से लेकर भीतर एक ही है. उसे दो टुकड़ों में बाँट कर नहीं देखा जा सकता.

बाहर तूफ़ान, अंदर शांति

इमेज कॉपीरइट PTI

यह नहीं हो सकता कि बाहर राजनीतिक तूफ़ान आता रहे और भीतर सांसद शांति से दोस्ताना अंदाज़ में बहस-मुबाहिसा करते रहें.

रुपये भी ख़र्च होंगे, समय भी बर्बाद होगा और इसी तरह इस देश का लोकतंत्र चलेगा.

अगर संसद को शांतिपूर्वक चलाना है तो संसद के बाहर की राजनीति को बदलना होगा शायद जिसका समय अभी नहीं आया है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में भारतीय भाषा कार्यक्रम का निदेशक हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार