जयपुर को चला रही हैं ये औरतें

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राजस्थान सरकार के विभिन्न नौकरियों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था के बाद से परंपरागत तौर पर पुरुषों के माने जाने वाले पेशों में महिलाएं अपने हुनर दिखा रही हैं.

इस साल जून में शुरू हुई जयपुर मेट्रो के कुल 24 मेट्रो ऑपरेटरों में पांच महिलाएं कुसुम, मोनिका, योगिता, ज्योति और मीना भी शामिल हैं.

बीबीसी हिन्दी ने इन पांचों महिलाओं से बात करके जानना चाहा पुरुषों का पेशा माने जाने वाले क्षेत्र में काम करने का उनका अनुभव.

कुसुम कँवर

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मेरी ख़ुशहाल ज़िंदगी की बुनियाद उस वक़्त बुरी तरह हिल गई जब मैंने दो साल पहले एक सड़क हादसे में अपने पति को खो दिया.

वे भवन निर्माण व्यवसाय से जुड़े थे. हम अपना एक सुन्दर घर बनाने का सोच पाते, उससे पहले ही सब सपने ढह गए. अब मुझे अपनी डेढ़ साल की छोटी बच्ची अन्वी की चिंता थी.

जयपुर मेट्रो ऑपरेटर की नौकरी मिलने के बाद अब मेरी जीवन की गाड़ी धीरे-धीरे फिर से पटरी पर आई है.

इससे मुझे हौसला मिला है कि मैं अपनी बच्ची की परवरिश ठीक से कर सकूंगी. मेरे मुश्किल वक़्त में मेरी हिम्मत बना मेरा परिवार.

मेरी सबसे बड़ी ढाल बनीं मेरी माँ, जो मेरी बेटी को अपने साथ रखती हैं ताकि मैं अपना करियर बना सकूँ.

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राजपूत परिवारों में अमूमन महिलाओं पर काफ़ी पाबंदियां रहती हैं. एक विधवा के लिए तो और भी ज़्यादा. पर मेरे पिता ने मुझे सदा से ही पढ़ने और आगे बढ़ने की पूरी आज़ादी दी.

ससुराल में भी मुझे शादी के बाद जल्दी ही राजपूती पोशाक के अलावा सलवार-क़मीज़ पहनने की इजाज़त मिल गई थी. अब मेट्रो ड्राईवर की यूनिफ़ार्म पहनकर एक नया आत्मविश्वास और संतुष्टि मिली है.

जी ख़ुश हो जाता है जब यात्री, ख़ास तौर पर बच्चे कहते हैं, दीदी सुनो, आप चला रही थीं मेट्रो? मज़ा आ गया... “मेट्रो वाली दीदी, ज़रा एक फ़ोटो प्लीज़ हमारे साथ!”

ज्योतिरानी खंडेलवाल

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मैं बीकानेर से हूँ और मुझे सबसे ज़्यादा ख़ुशी तो इसी बात की है कि मैंने अपना पारिवारिक पेशा अपनाया है. मेरे दादा लोको पायलट थे. पिता, ताऊ और ननिहाल में भी बहुत से लोग रेलवे की नौकरी में हैं. इसलिए मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा है.

वैसे ऐसा कभी सोचा नहीं था कि रेलवे की नौकरी करुँगी. मेट्रो ड्राईवर बनना तो बस बाय लक, बाय चांस हो गया.

मेट्रो ड्राइवर की ख़्वाहिश रखने वाली युवा लड़कियां हमसे अक्सर पूछती हैं कि हमने इसके लिए कौन सा फॉर्म भरा? क्या परीक्षा पास की? तो मैं बताती हूँ कि बस विज्ञान का विद्यार्थी होना ज़रूरी है. बाक़ी ख़ास मुश्किल नहीं.

यह काम बिल्कुल स्ट्रेसफुल नहीं है बल्कि मैं कहूँगी कि पूरे डिपार्टमेंट में इससे ज़्यादा अच्छी नौकरी दूसरी नहीं.

जयपुर मेट्रो की उदघाटन यात्रा में जब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने साथ में सफ़र किया, उन्होंने पूरा मेट्रो ड्राइविंग का सारा सिस्टम समझा तो उन्हें बहुत गर्व महसूस हुआ.

हमें ट्रेन चलाते हुए सब लोगों का, ख़ास तौर पर महिलाओं और लड़कियों का रिएक्शन देखकर बहुत अच्छा लगता है, गर्व महसूस होता है. क्योंकि उन्हें लगता है हमने जो किया है यह उनके लिए गर्व की बात है.

योगिता तिवारी

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जब हम प्लेटफ़ार्म पर एंट्री करते हैं तो लोग थोड़े चकित होकर देखते हैं, अरे लड़कियां मेट्रो चला रही हैं.

एक बार जब मैं कैब से उतरकर आ रही थी तो एक बच्ची ने कहा “मम्मा मैं भी बनूगीं मेट्रो ड्राईवर.”

यदि कोई आपके जैसा बनना चाह रहा है ये देखकर बहुत अच्छा लगता है.

ऐसा कोई काम नहीं है जो महिलाएं नहीं कर सकतीं. ट्रेनिंग और पूरे एक्स्पोज़र के बाद हम इसे बहुत आसानी से यह कर रहे हैं. हम अपने काम से जनता की धारणा भी बदल रहे हैं.

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हमारा कॉमन कैडर “स्टेशन कंट्रोलर कम ट्रेन ऑपरेटर” का है. स्टेशन कंट्रोलर को पार्किंग, एस्केलेटर, फेयर कलेक्ट करना और ट्रेनों का संचालन देखना होता है.

हमें ज़रूरत के हिसाब से बाक़ी ज़िम्मेदारियां भी संभालनी होगीं. पर मेट्रो ड्राइविंग का अनुभव बहुत ही अच्छा है.

मेरे पिता पुलिस सेवा में हैं पर मुझे मेट्रो ड्राइविंग ख़ूब रास आ रही है.

मोनिका मित्तल

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मैं कोटपुतली से हूँ. अभी तक सिर्फ़ फोर व्हीलर ही चलाया था उससे भारी कुछ नहीं.

मेरा भाई बोलता था कि देख तू कहीं ठोक देगी. चलाने नहीं देता था. कार बड़ी मुश्किल से देता था. देता नहीं था तो ज़िद्द करके लेनी पड़ती थी. अब यहाँ तो कोई रोकटोक है नहीं.

वो आया था और मुझे मेट्रो चलाते देखकर बहुत ख़ुश हुआ. मज़ाक़ में कहने भी लगा कि मुझे भी चलाने देगी मेट्रो? और मैंने कहा बिलकुल नहीं.

कार तो इतना अच्छे से नहीं चलाती थी पर अब मेट्रो ज़्यादा आराम से चला पा रही हूँ.

हमें दिल्ली मेट्रो से बहुत अच्छी ट्रेनिंग मिली. 200 किलीमीटर की “हैंडलिंग” और रात को भी मेट्रो चलाने के अभ्यास के बाद ही हमें ड्राइविंग की ज़िम्मेदारी मिली है.

इस नौकरी में समय की पाबंदी और सही अलाइनमेंट का अभ्यास ज़रूरी है क्योंकि “ओवर शूट या अंडरशूट” होने की सूरत में दरवाज़ा अपने आप नहीं खुलता.

रात को ट्रेन चलाने में कोई दिक़्क़त नहीं आती बल्कि शाम के वक़्त ज़्यादा भीड़ रहती है, ज़्यादा लोग सफ़र करते हैं तो और अच्छा लगता है.

अपनी आठ घंटे की ड्यूटी के दौरान हम जयपुर में मानसरोवर से चांदपोल के बीच प्रतिदिन पांच राउंड ट्रेन चलाते हैं यानी क़रीब 95 किलोमीटर.

पर दिन सफल हो जाता है जब रोज़ ढेर सारे “कॉम्प्लिमेंट्स” मिलते हैं.

मीना सोनी

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मेट्रो स्टेशन पर बहुत सी लड़कियां आकर मुझे यह कहती हैं, 'आप ही मीना सोनी हो?' दरअसल वो हमें अपने रोल मॉडल की तरह देखती हैं. वे भी हमारे जैसा बनना चाहती हैं.

हमें देखकर लोगों को थोडा आश्चर्य होता है कि लड़कियां ट्रेन चला रही हैं क्योंकि आम तौर पर हम ट्रेनों में पुरुष चालक ही तो देखने के आदी हैं.

दिल्ली मेट्रो में छह महीने की ट्रेनिंग लेने के बाद ऐसा एक बार भी नहीं लगा कि हम कोई ऐसा प्रोफ़ेशन अपनाने जा रहे हैं जिसमें महिला होना बाधा हो.

लोगों को लगता ज़रूर है कि इसमें कोई विशेष शारीरिक क्षमता या श्रम की ज़रूरत है.

बल्कि हमें ज़्यादा ट्रेनिंग इस बात की दी गई है कि जब राइडरशिप ज़्यादा हो तो हम यात्री सुरक्षा का ध्यान कैसे रखें.

यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रखना हमारी प्राथमिकता है.

कुल मिलाकर मेट्रो चलाना मस्त लग रहा है, बहुत बढ़िया लग रहा है.

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