अगर रामानुजन यूरोप में पैदा हुए होते ...

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भारतीय गणितज्ञों में शायद सबसे ऊँचा स्थान रखने वाले श्रीनिवास रामानुजन को लोग कहीं न कहीं पूर्वी दर्शन, ख़ासकर भारतीय विचारों की एक फंतासी भरी दुनिया से जोड़ कर देखते हैं.

जो गणितज्ञ रामानुजन को याद करते हैं, वो भी इसी अंदाज़ में उनका ज़िक्र करते हैं.

हंगरी के गणितज्ञ पॉल इरोज़ पर दिलचस्प किताब 'द मैन हू लव्ड ओनली नंबर्स' लिखने वाले पॉल हॉफ़मैन लिखते हैं, "हार्डी और रामानुजन की साझेदारी जब तक चली, दोनों लोग विशुद्ध गणित की दुनिया को शीर्षासन कराते रहे. ये पूरब और पश्चिम का मेल था. आध्यात्म का औपचारिकता से मेल था और इसे रोकना मुश्किल था."

'मंदिर नहीं, स्कूल में पढ़े'

Image caption गणितज्ञ रामानुजन

रामानुजन की जीवनी लिखने वाले रॉबर्ट कैनिगल ने अपनी किताब 'द मैन हू न्यू इन्फिनिटी' के पहले अध्याय में उस धार्मिक और सामाजिक परिवेश का ब्योरा दिया है जिसमें रामानुजन पले-बढ़े थे.

एक व्यक्ति के तौर पर रामानुजन के लिए ये चाहे जितना भी अहम हो लेकिन उनके गणितीय जीवन पर इस परिवेश के असर का दावा ज़्यादा सही नहीं ठहरता.

रामानुजन ने गणित का ज्ञान किसी मंदिर में हासिल नहीं किया. वो जिस वक्त स्कूल गए तब सिर्फ कुछ पारंपरिक वैदिक स्कूल ही बचे थे.

ज़्यादातर स्थानों पर वैदिक स्कूलों की जगह यूरोपीय विज्ञान के पाठ्यक्रम पर आधारित स्कूलों ने ले ली थी.

19 वीं सदी के स्कूल

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एस सच्चिदानंदन ने वर्ष 1894 की अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ एजुकेशन इन द मद्रास प्रेसिडेंसी' में बेल्लारी के कलेक्टर एडी कैम्पबेल के हवाले से साल 1822 के दक्षिण भारत में ऐसे पारंपरिक स्कूलों में दी जाने वाली गणित की शिक्षा की तस्वीर खींची है.

उन्होंने कहा है, "वो (छात्र) उसके बाद एक अतिरिक्त पहाड़ा याद करता है और एक से सौ तक गिनता है. उसके बाद जोड़-घटाव के आसान सवाल लिखता है. पैसे के गुणा, घटाव, माप आदि करता है. यहां छात्र को पूर्णांक का भिन्न सिखाने में बहुत प्रयास किया जाता है, ये हमारी दशमलव प्रणाली की तरह दस के बजाए चार के क्रम में घटता है और उसी क्रम में आगे बढ़ता है."

इस क्रम में भागफल के साथ जोड़ गुणक के अंकगणतीय पहाड़ों और क्षमता, भार के त्रिज्यामितीय परिमाण छात्रों के दिमाग को खासे जाने-पहचाने लगते होंगे.

छात्र दिन में दो बार एक क़तार में खड़े हो जाते और एक मॉनिटर के बोलने के बाद सब कुछ दोहराते थे.

अगर इस अंदाज़ में पढ़ाई करने के बाद रामानुजन गणितज्ञ बने होते तो उन्हें गणित के बारे में सबकुछ फिर से पढ़ना होता. शुक्र था कि उन्हें पढ़ाई के लिए इससे बेहतर माहौल मिला.

बदली शिक्षा प्रणाली

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भारत में ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बेन्टिक ने वर्ष 1835 में पारंपरिक स्कूल प्रणाली के खिलाफ फ़ैसला किया और वर्ष 1954 में मद्रास प्रेसिडेंसी में नई स्कूल प्रणाली स्थापित हुई.

सच्चिदानंदन की किताब में पहली चार कक्षाओं के परिणामी पाठ्यक्रम के बारे में जानकारी है, रामानुजन के समय में भी संभवत: यही पाठ्यक्रम रहा होगा.

इससे साफ है कि रामानुजन ने जो स्कूल में सीखा वो आज जो पढ़ाया जाता है, उससे ज़्यादा अलग नहीं है.

गुमनाम रही प्रतिभा

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इतना ज़रूर लगता है कि औपनिवेसिक भारत में रामानुजन की प्रत्यक्ष गणितीय योग्यता उस तरह उभर नहीं सकी, जैसी वो किसी और देशकाल में उभर सकती थी.

रामानुजन की बायोग्राफी में रॉबर्ट कैनिगल बताते हैं कि 11 साल की उम्र में 'सहपाठी उनसे मदद मांगने आने लगे थे' एक साल बाद वो 'अपने शिक्षकों को चुनौती देने लगे थे' और जब वो 13 साल के थे वो एसएल लोनी की त्रिकोणमिति के मास्टर हो गए थे. इस किताब को अब भी कुछ भारतीय छात्र पढ़ते हैं.

यूरोप में पुनर्जगारण के बाद रामानुजन जैसी प्रतिभा वाले किसी छात्र को आसानी से एक मार्गदर्शक मिल जाता. जिससे उसकी प्रतिभा को मांजने में काफ़ी मदद मिलती.

ब्रिटेन के उपनिवेश भारत में उन्हें बेहद आम तरीके से आगे बढ़ने के मौके मिले.

योग्यता बनी बाधक

हकीकत में उनकी क्षमता ही उनके विकास में बाधा बन गई. जब वर्ष 1904 में 17 साल की उम्र में वो कुंभकोणम के गर्वनमेंट कॉलेज में गए तो उन्हें इंग्लिश राइटिंग में फेल होने के बाद एक साल पढ़ाई से दूर रहना पड़ा.

उन्होंने पचियप्पा कॉलेज में डिग्री की पढ़ाई दोबारा शुरू की लेकिन फिजियोलॉजी की परीक्षा में फेल हो गए और वर्ष 1907 में उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा.

जीएच हार्डी की मदद से वर्ष 1913 में गुमनामी से बाहर आने के पहले वर्ष 1910 में उन्हें क्लर्क की नौकरी मिल गई.

रामानुजन एक ऐसे मेधावी छात्र जैसे थे जो गणित की दुनिया की हलचलों और उनकी प्रतिभा पहचान सकने वाले गणितज्ञों की संगत से दूर था.

मुश्किलों के पार

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उनपर ईएच कार की 'सिनॉप्सिस ऑफ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स' का भी प्रभाव था.

यह किताब शायद उन्हें उनके घर में रहने वाले कॉलेज के छात्रों से मिली थी.

यह छात्रों को चिर-परिचित अंदाज़ में परीक्षा के लिए तैयार करने वाली किताब थी. इससे उन्हें क्या और कितना लाभ हुआ होगा इसके बारे में ठोस रूप से कुछ भी कहना संभव नहीं.

यूरोप में उनके जैसी प्रतिभा वाले लड़के को कम से कम फ्रेडरिक गास की 'डिस्क्विज़िशन अर्थमेटिके' पढ़ने के लिए कहा जाता.

अगर वो यूरोप में होते तो उन्हें 19वीं सदी के कई महान गणितज्ञों के काम से सीधे जुड़ने का का मौका मिलता.

ये सिर्फ रामानुजन की प्रतिभा ही थी कि वो औपनिवेशिक दौर की लाचारियों के बावजूद कामयाब हो सके.

'महाभारत के एकलव्य'

शायद महाभारत में ऐसी ही कहानी है, जहां द्रोण तीरंदाजी की जानकारी देने की अपनी फ़ीस के तौर पर एकलव्य से अंगूठे की मांग करते हैं.

ये तुलना भले ही सटीक न हो लेकिन तब भी ये सोचना मुश्किल नहीं कि रामानुजन के काम में सावधानी की कमी वो क़ीमत है जो औपनिवेशिक दौर ने उन्हें आधुनिक गणित की दुनिया की झलक पाने की इजाज़त देने के लिए वसूली.

इस बात की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि अगर रामानुजन भारत में सौ साल बाद पैदा होते तो आधुनिक दौर के महानतम गणितज्ञ होते.

महानतम होते रामानुजम!

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लेकिन, ये दावा सिर्फ उनके तमिल ब्राह्मण या फिर भारतीय होने की वजह से नहीं बल्कि रामानुजन होने के कारण है.

हार्डी ने एक बार खुद कहा था, "अगर उन्हें कम उम्र में तलाश कर शिक्षित किया गया होता तो वो शायद कहीं महान गणितज्ञ होते . दूसरी तरफ वो रामानुजन से ज़्यादा यूरोपीय प्रोफेसर होते और ये घाटा लाभ से कहीं ज़्यादा होता."

ये विचार रामानुजन के इर्दगिर्द की रुमानियत को बनाए रखता है. ये पूर्वी रहस्यवाद और पश्चिमी तार्किकता के साथ आसानी से तालमेल बिठा लेता है. लेकिन यह एक ऐसी तुलना है जो हमेशा एक ही पक्ष के लिए फायदेमंद होती है.

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गणित की दुनिया में मान्यता पाने के लिए रामानुजन को जो जीवनशैली अपनानी पड़ी, उनकी मर्जी चलती तो शायद उन्होंने उसे नहीं चुना होता.

ये कोई हैरत नहीं कि एक दशक के बाद हार्डी ने खुद अपने आकलन को 'बेतुकी भावुकता' बताया था.

16 साल की उम्र में ईएच कार की किताब के भरोसे छोड़ दिए गए रामानुजन ने अपनी मजबूरी को अपनी खूबी में बदला.

वो खुद अपनी प्रतिभा के बल पर मौलिक तर्कशक्ति के जरिए गणित के विभिन्न सत्यों तक पहुंचे.

सोचिए, अगर गॉस, यूलर और जैकोबी जैसे गणितज्ञ उन्हें गाइड के रूप में मिले होते तो उन्होंने गणित की दुनिया में क्या किया होता...

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