सरकार के पास डीएनए प्रोफ़ाइल होने से परेशानी क्यों?

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ह्यूमन डीएनए प्रोफ़ाइलिंग विधेयक 2015 को संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना जताई गई है.

भारत सरकार ने सबसे पहले ये विधेयक 2007 में पेश किया था. साल 2012 में एक विशेषज्ञ कमेटी बनाई गई जिसे विधेयक में शामिल निजता के मुद्दे पर विचार करना था.

इस विधेयक और इससे जुड़ी बहस पर बीबीसी की ख़ास सिरीज़ की दूसरी कड़ी.

डीएनए प्रोफाइलिंग को लेकर क़ानून बनाने की बात भारत में सबसे पहले 2003 में शुरू हुई थी.

क्यों जांचना चाहती है सरकार आपका डीएनए?

इसका मक़सद शुरू में अपराधियों का डीएनए सूचकांक बनना था ताकि बार-बार अपराध करने वालों की जानकारी एकत्र की जा सके.

तब से लेकर इस क़ानून का दायरा बढ़ता गया है.

अब प्रस्तावित विधेयक में डीएनए प्रोफ़ाइल के अंतर्गत अपराध स्थल, संदिग्धों, अपराधियों, लापता लोगों के परिवार की डीएनए सूची, अज्ञात मृतक और 'नियमन के तहत तय किए गए अन्य ऐसे डीएनए सूचकांक' हो सकते हैं.

नियमन तय करने के लिए एक बोर्ड होता है जो डीएनए सूचकांक का दायरा बिना संसद की अनुमति के बढ़ा सकता है.

डीएनए प्रोफ़ाइल का क्या इस्तेमाल?

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प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक़ डीएनए प्रोफ़ाइल का इस्तेमाल सिर्फ 'अपराध और अपराध को अंज़ाम देने वालों को पहचानने' के लिए ही नहीं किया जाएगा बल्कि 'दुर्घटना या आपदा के पीड़ितों, लापता लोगों को पहचानने या नागरिक विवाद के मामलों' में भी किया जाएगा.

इसके अलावा नियमन की ओर से तय किए गए अन्य मक़सदों में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा.

इसलिए डीएनए प्रोफ़ाइल के तहत बनाए गए सूचकांक का इस्तेमाल पूर्वनिर्धरित मकसद के मुकाबले काफी व्यापक हो सकता है.

सबसे बड़ी परेशानी क्या है?

निजता से संबंधित साहित्य में एक शब्द का इस्तेमाल होता है जिसे 'फंक्शन क्रीप' कहते हैं.

इसका मतलब होता है कि एक मक़सद से इकट्ठा किए गए चिज़ों का दूसरे मक़सद के लिए इस्तेमाल करना.

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इसलिए जब एक लापता बच्चे के मां-बाप अपना डीएनए अपने लापता बच्चे को खोजने के लिए देंगे तो हर बार किसी भी अपराध या मातृत्व से जुड़े विवाद को निपटाने के सिलसिले में उनका डीएनए प्रोफ़ाइल जांच में आएगा.

ऐसा होने पर यह उनके लिए अपमानजनक हो सकता है और वे एक संदिग्ध के तौर पर नहीं पेश होना चाहेंगे.

अगर डीएनए प्रोफ़ाइल के तहत उनका नाम नहीं भी आता है और वे निर्दोष पाए जाते हैं फिर भी उनकी समाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच सकती है और यह सब उनकी मर्जी के बिना उन पर थोपा जाएगा.

जानकारी रखी कहाँ जाएगी?

विधेयक के मुताबिक़ डीएनए प्रोफ़ाइल को रखने के लिए डीएनए बैंक बनाए जाएंगे.

बोर्ड को अगर सही लगता है तो फिर वे इन डीएनए प्रोफ़ाइल का इस्तेमाल करेगा.

डीएनए प्रोफ़ाइल का इस्तेमाल 'पूरी आबादी के आकड़े का डेटा बैंक' बनाने में हो सकता है.

इस डेटा बैंक का इस्तेमाल फिर कई मक़सदों में किया जाएगा जिसे विधेयक में 'पहचान शोध' कहा गया है.

क्या जानकारी जुटाई जाएगी?

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अभियुक्त के डीएनए सैंपल के साथ सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिटिंग एंड डायग्नोस्टिक, हैदराबाद का एक पहचान पत्र जुड़ा होगा जिसमें 'जाति' और 'स्पष्ट अनुवांशिक विषमता' की जानकारी दर्ज करनी होगी.

अगर डीएनए प्रोफ़ाइलिंग का मक़सद इस बात का जवाब खोजना है कि अपराध स्थल पर मौजूद डीएनए से प्रोफ़ाइल में मौजूद डीएनए मैच करता है कि नहीं, तो फिर उसके लिए जाति या अनुवांशिक विषमता जानने की क्या ज़रूरत है?

अगर वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी ज़रूरत है तो फिर बिना इस पर सार्वजनिक रूप से विचार किए इसे अपनाया जा सकता है?

जानकारी कैसे और कब हटेगी?

विधेयक में डीएनए प्रोफ़ाइल, डेटाबेस, और डेटा बैंक तैयार करने की तो बात कही गई है. लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि एक बार मक़सद पूरा होने के बाद डीएनए प्रोफ़ाइल या सैंपल को ख़त्म कर दिया जाएगा.

मसलन एक आदमी के डीएनए का इस्तेमाल अगर किसी लापता आदमी को पहचानने में मदद लेने के लिए किया गया, तो इस विधेयक में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है कि लापता आदमी के मिलने के बाद प्रोफ़ाइल लौटा दी जाएगी या नष्ट कर दी जाएगी.

डीएनए और डीएनए प्रोफ़ाइल, डीएनए बैंक के पास तब तक रहेगी जब तक कि वे उसे रखना चाहें.

यह एक ऐसा दौर है जब आबादी आधारित आकड़ों को इकट्ठा करने में राज्य और अन्य सरकारी संस्थाएं विशेष दिलचस्पी ले रही हैं.

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हाल ही में यह घोषणा की गई थी कि एसपी से ऊपर के रैंक के अधिकारी को पासपोर्ट जारी करने के पहले यूनीक आइडेंडिटी (यूआईडी), क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम (सीसीटीएनएस) और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर की जांच की जाएगी.

और...!

ह्यूमन डीएनए प्रोफ़ाइलिंग विधेयक 2015 में ऐसा कुछ भी नहीं है जो डीएनए डेटाबेस को इनमें से किसी भी डेटाबेस के साथ मिलाने से रोकता हो.

इसका मतलब हुआ कि डीएनए डेटाबेस में यूआईडी नंबर भी 'मौजूद' होगा.

अब चिंता की बात यह है कि हमारी ज़िंदगी के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं.

(उषा रामनाथन विधेयक की ड्राफ्टिंग कमिटी की सदस्य, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता है.)

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