लाजवाब है ज़िन्दगी, शतरंज की बिसात पर

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Image caption दिल्ली के मीना बाजार पर शतरंज

शाहजहाँ का बसाया चाँदनी चौक का दरीबा कलां जो आज भी अपनी चमक बरक़रार रखे हुए है.

यहां सोने चांदी की दुकान रविवार को बंद होती है और पटरी पर सामान बिकता नज़र आता है.

यहीं कुछ बंद दुकानों के आगे कुछ लोग दूसरी दुनिया में खोए हुए नज़र आ सकते हैं.

शतरंज की बिसात

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Image caption सौ दुःख देने वाली शतरंज

रविवार को कुछ लोग इन बंद दुकानों के आगे बड़े आराम से शतरंज की बिसात बिछा कर खेलते हैं.

सत्तर साल के एक बुज़ुर्ग का कहना है कि पिछले चालीस साल से तो वो ख़ुद ही इस जगहं हर रविवार को आ जाते है और अपने दूसरे साथियों के साथ शतरंज की बाज़ी खेलते हैं और बचपन से ये देखते आ रहे हैं.

कॉलेज में पढ़ने वाले उन्नीस साल के सागर शर्मा कहते हैं, "ये ठंडे दिमाग़ का खेल है, बड़ों के आशीर्वाद से अब जाकर इस खेल को सीखा है.''

मेरे पूछने पर की शतरंज के मायने क्या है तब सागर कहते हैं कि, ''ये सौ दुःख देती है, ये गणित है, दिमाग़ में शतरंज ही चलती है.''

रविवार इसकी बैठक में सागर जैसे और भी लोग आते हैं.

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Image caption बंद दुकान के आगे शतरंज की बिसात

आज़ाद चेस क्लब

थोड़ा आगे बढ़ते ही जामा मस्जिद के पास मीना बाज़ार के पास स्ट्रीट लाइट के नीचे एक पुराना बोर्ड लगा हुआ देखा जिस पर लिखा था- आज़ाद चेस क्लब 1932, जहाँ तीन शतरंज की बिसात बिछी हुई थी और लगभग आठ दस लोग बैठे शतरंज खेल रहे थे.

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Image caption आज़ाद चैस क्लब

अनिल शिवपुरी जो की इस खेल के पुराने खिलाड़ी हैं और लम्बे समय से यहां शतरंज खेलने आते हैं. आजकल शतरंज की कोचिंग करते हैं.

उनका कहना है कि, ''इस जगह पर कोई भी कभी भी आकर शतरंज खेल सकता है, अस्सी साल से लेकर अट्ठारह साल तक के लोग खेलते हैं और इस क्लब की कोई मेम्बरशिप फ़ीस भी नहीं है.''

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Image caption बचपन से खेलते आ रहे हैं

दिल्ली चेस एसोसिअशन के सचिव एके वर्मा मानते हैं की ये ''कई सालों से अपने मनोरंजन के लिए खेलते हैं अगर ये थोड़ा सेस्टीमेटिक हो जाए तो अच्छा होगा.''

जामा मस्जिद के मीना बाज़ार की सीढ़ियों पर शतरंज खेलने वाली राकेश शर्मा मानते हैं ''अगर सरकार इन पर ध्यान दे तो अच्छे खिलाडी निकल सकते हैं.''

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Image caption यहां कोई भी आकर शतरंज खेल सकता है

बहरहाल कोई कुछ कहे पर यहाँ के लोगों का यही कहना हैं कि पिछले सत्तर सालों से ये लोग इस खेल में अपनी बाज़ी चलते चले आ रहे हैं जिनको देखकर यही कह सकते हैं-

लाजवाब हूँ ज़िन्दगी तेरे ख़्याल पे

सौ दर्द हैं, सौ हमदर्द भी, सौ सवाल, सौ रंज भी, शतरंज भी.

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