मोदी के डीएनए कमेंट को भुनाना चाहते हैं नीतीश

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लग रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डीएनए संबंधी कमेंट बिहारी अस्मिता का मुद्दा बन जाएगा.

नीतीश कुमार ने उसी दिन शाम को प्रधानमंत्री के कमेंट का जवाब दिया और वही बातें कही थीं जो अब उन्होंने अपने पत्र में लिखी हैं.

नरेंद्र मोदी के नाम नीतीश का खुला ख़त

उसके बाद उन्होंने प्रिंट मीडिया के साथ इंटरव्यू में भी वही सब दोहराया.

पटना के अखबारों ने 26 जुलाई को प्रधानमंत्री की रैली की खबर के साथ ही प्रमुखता से उनकी प्रतिक्रिया भी प्रकाशित की. इंटरव्यू भी प्रमुखता से छपा.

मुद्दा बनाने की कोशिश

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नीतीश कुमार को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री द्वारा डीएनए खराब करार दिए जाने संबंधी बयान को राज्य के लोग बिहार की अस्मिता पर हमले के रूप में लेंगे.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं और यह मुद्दा आया गया हो गया. 9 अगस्त यानी इस रविवार को प्रधानमंत्री की सभा गया में होने वाली है.

इस मौके पर प्रधानमंत्री के नाम पत्र डीएनए वाले मुद्दे को गरमाने के लिए ही लिखा गया है.

खबर यह भी है कि गया में प्रधानमंत्री के इस बयान के खिलाफ प्रदर्शन की तैयारी भी चल रही है. बिहार विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और जदयू, दोनों ही विकास के मुद्दे को लेकर चल रहे हैं.

विकास का मुद्दा अहम

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भाजपा जदयू के विकास के नारे पर सवाल भी उठा रही है कि लालू प्रसाद के रहते विकास नहीं जंगलराज आएगा.

नीतीश कुमार की दिक्कत यह है कि कर्मठ-ईमानदार-विजनरी की छवि के बावजूद तमाम लोग भरोसा नहीं कर पा रहे कि लालू प्रसाद के रहते नीतीश कुमार पहले वाले नीतीश कुमार (यानी एनडीए के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार) बने रह पाएंगे.

भाजपा नेता चौतरफा हमला बोल रहे हैं कि जदयू के एनडीए से अलग होने के बाद से राज्य में क़ानून-व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है.

नीतीश कुमार ने ट्विटर पर रहीम का दोहा पोस्ट कर यह विश्वास दिलाने की कोशिश की थी कि उन पर किसी का दबाव नहीं चलेगा.

लेकिन उनके इस ट्वीट पर विवाद खड़ा हो गया और उनको सफाई देनी पड़ी. इससे मामला और बिगड़ गया.

नीतीश कुमार चाहते हैं कि बिहारी गौरव और अस्मिता का सवाल भावनात्मक स्तर पर खड़ा किया जाए.

बिहार का गौरव और अस्मिता

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शुरुआत में उन्हें सफलता नहीं मिली लेकिन प्रधानमंत्री के दौरे से ठीक पहले इस मुद्दे को गरमाने की एक और कोशिश पत्र लिखकर की गई है.

अगर ऐसा हो जाता है तो इसमें नीतीश कुमार दो फायदे देख रहे होंगे.

एक तो, लालू प्रसाद के साथ को लेकर भाजपा के नीतीश कुमार के खिलाफ चलाए जा रहे आक्रामक अभियान की धार कुंद हो जाएगी.

और दूसरा, भाजपा बैकफुट पर आ जाएगी.

वैसे सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार क्षेत्रीय अस्मिता को उभार कर बिहारी गौरव के प्रतीक बन जाने का प्रयास करते रहे हैं.

इसके लिए उन्होंने नालंदा विश्व विद्यालय की पुनर्स्थापना, बिहार स्थापना दिवस और बिहार गीत जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल करने की शुरुआत की.

यही नहीं, बाल ठाकरे की तर्ज़ पर बिहार में नीतीश कुमार ने 'जय भारत' के साथ 'जय बिहार' का नारा भी लगाना शुरू किया.

हिंदी पट्टी की विशेषता रही है कि यहां तमाम मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों के बावजूद क्षेत्रवाद की भावना कभी नहीं रही.

नीतीश कुमार के अलावा किसी और नेता ने ये भावना जगाने की कोशिश भी नहीं की.

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