अंध राष्ट्रवादी क्यों बन जाता है मीडिया

इंडियन मीडिया, भारतीय मीडिया, टीवी चैनल इमेज कॉपीरइट Getty

मुंबई बम विस्फोटों के लिए दोषी करार दिए गए याक़ूब मेमन को फाँसी से जुड़े सवालों से पूरे माहौल में उत्तेजना और बेचैनी रही. मीडिया में तो ये और भी बढ़-चढ़कर दिखाई दिया.

ऐसे मौकों पर सोशल मीडिया तो ख़ास तौर पर सारे नियंत्रण खो देता है जहां उन्मादग्रस्त अभिव्यक्तियाँ हिंसा की हदें लांघने लगती हैं.

सोशल मीडिया का इस तरह बेकाबू हो जाना समझ में आता है. वहाँ कोई गेटकीपर नहीं है, कोई संपादक नहीं है जो लोगों की टिप्पणियों को सावधानीपूर्वक काटे-छाँटे. वहाँ कोई कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है.

मगर मुख्यधारा का मीडिया क्यों अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूलकर उन्माद फैलाने में जुटा हुआ है? क्यों बेकाबू रिपोर्टर और टीवी बहसों में टकराव के बिंदुओं को बढ़ावा देते एंकर घृणा और हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं?

और भी हैं मुद्दे

इमेज कॉपीरइट AP

मुद्दा केवल याकूब मेमन की फाँसी का नहीं है. ऐसा बार-बार देखा जा रहा है कि जब भी पाकिस्तान, कश्मीर, नक्सलवाद, चरमपंथ या अल्पसंख्यकों से जुड़े मसले उठते हैं तो मीडिया अंध राष्ट्रवादियों जैसा व्यवहार करने लगता है.

मीडिया उदार नज़रिया रखने वालों के प्रति कठोर हो जाता है. रिपोर्टर और एंकर उनसे बदतमीज़ी करते हैं. उन्हें कठघरे में खड़ा करने लगते हैं, उन पर आरोप लगाने लगते हैं.

याकूब मेमन के मामले में न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाने और फाँसी का विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और राजनेताओं के साथ उसका व्यवहार कतई ऐसा नहीं रहा, जिसे कोई लोकतांत्रिक समाज मंज़ूर करे.

कहाँ गई संपादकीय व्यवस्था

इमेज कॉपीरइट AP

ये बहुत चिंताजनक है कि मीडिया अपने लिए निर्धारित मानदंडों और आचरण संहिता को भूलकर किसी राजनीतिक दल के अनुयायी या अति राष्ट्रवादी संगठनों की तरह व्यवहार कर रहा है.

टीवी चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं में ख़बरों और विचारों के प्रकाशन एवं प्रसारण से पहले उन्हें कई स्तरों पर जाँचा-परखा जाना चाहिए, ताकि समाज में वैमनस्य न फैले.

कौन सी ख़बरें किस तरह कवर करनी और दिखानी है, इसका फ़ैसला वरिष्ठ पत्रकारों पर होता है. लेकिन लगता नहीं है कि वे अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं.

ये भी एक सच है कि चैनलों या पत्र-पत्रिकाओं में या तो संपादक होता नहीं या फिर बेहद कमज़ोर होता है. उसे धंधे से जुड़े दूसरे काम भी सौंप दिए जाते हैं. इसलिए सामग्री तय करने में उसकी भूमिका भी नज़र नहीं आती.

संपादकीय नेतृत्व

इस बात में भी सच्चाई है कि अनुभवहीन पत्रकारों की वजह से भी ऐसा हो रहा है. लेकिन उन्हें प्रशिक्षित करने और उनकी योग्यता के अनुसार काम देने की ज़िम्मेदारी भी संपादकीय नेतृत्व की ही होती है.

ज़ाहिर है कि अधिकांश जगहों पर ये संपादकीय व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, सवाल उठता है कि क्यों? क्या इसके लिए मीडिया में चलने वाली होड़ ज़िम्मेदार है या फिर और भी कारण हैं?

इसमें शक़ नहीं कि टीवी चैनल और पत्र-पत्रिकाएं एक दूसरे से आगे निकलने के लिए खुद को ज़्यादा बड़ा राष्ट्रभक्त दिखाने की कोशिशों में जुट जाते हैं. नतीजा ये होता है कि छोटी-छोटी चीज़ें भी उन्माद की शक्ल ले लेती हैं.

लोकप्रियता हासिल करके उसे व्यावसायिक लाभ में तब्दील करने की ये ख़तरनाक़ प्रवृत्ति दिनों-दिन मज़बूत होती जा रही है. लेकिन इसका संबंध केवल बाज़ार से ही नहीं, राजनीति से भी है.

सत्ता के साथ कदमताल

इमेज कॉपीरइट Reuters

मीडिया जब सत्ता के एजेंडे से जुड़ जाता है या उसमें अपना स्वार्थ देखने लगता है तो सत्ताधारियों को खुश करने की चेष्टाएं बढ़ा देता है. इस समय यही हो रहा है.

ये तो जगज़ाहिर तथ्य है कि कॉरपोरेट जगत वर्तमान सरकार के साथ कदमताल कर रहा है.

इसलिए ये भी स्वाभाविक है कि उसके नियंत्रण वाला मीडिया भी सत्तापक्ष की राजनीति का समर्थन करे और वह ऐसा ही कर रहा है.

इसीलिए मीडिया के कंटेंट में बहुसंख्यकवाद हावी हो चुका है. वह कट्टरता के साथ उदार या भिन्न विचारों का विरोध कर रहा है. सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वालों को धड़ल्ले से मंच मुहैया करवा रहा है.

कड़े नियमन की ज़रूरत

इमेज कॉपीरइट AP

हालाँकि कुछेक लोग और संगठन अभी भी ये दावा करते रहते हैं कि सब ठीक है और अगर कुछ गड़बड़ है तो वह आत्म-नियमन से ठीक कर लिया जाएगा.

लेकिन सचाई ये है कि मीडिया में आत्म-नियमन पूरी तरह से फेल हो चुका है.

भारतीय मीडिया के इस वर्तमान चरित्र को देखते हुए एक बार फिर से रेग्यूलेशन (नियमन) की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जाना ज़रूरी है.

स्वतंत्र मीडिया नियामक की स्थापना से ही इस बीमारी के इलाज़ की दिशा में पहल संभव है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार