ससुराल, मायका भारत में, पर वो विदेशी कैसे

भारत बांग्लादेश बॉर्डर इमेज कॉपीरइट AFP

असम के करीमगंज की वंदना रानी दास के मायके और ससुराल में सभी लोग भारतीय हैं लेकिन वो ख़ुद इन दिनों ‘विदेशी नागरिक’ होने के आरोप में सिलचर सेंट्रल जेल में बंद हैं.

सिलचर सेंट्रल जेल विदेशी नागरिकों का डिटेंशन शिविर भी है.

विदेशी न्यायाधिकरण के एक फैसले के आधार पर वंदना को स्थानीय पुलिस ने पिछले दिनों उनके घर से गिरफ़्तार किया था.

अब वंदना के पति रिजेन दास तमाम दस्तावेज़ों के साथ पत्नी की रिहाई के लिए अदालत के चक्कर काट रहे हैं.

रिजेन दास का दावा है कि मतदाता सूची में न केवल उनके परिवार का नाम है बल्कि असम में अपडेट किए जा रहे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के लिए भी उन्होंने आवेदन किया है.

मतदाता सूची में नाम

साल 1966 की मतदाता सूची में वंदना के पिता उपेंद्र दास और मां सीमांतीनी दास के नाम वाले दस्तावेज़ भी उनके पास हैं.

इस बारे में पूछे जाने पर करीमगंज के पुलिस अधीक्षक प्रदीप रंजन बताते हैं, "सब इंस्पेक्टर स्तर के पुलिस अधिकारी को जांच के लिए भेजा जाता है. संदिग्ध व्यक्ति को नोटिस देने के एक निर्धारित समय के भीतर उसकी नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ जमा करवाने के लिए कहा जाता है."

वो कहते हैं, "जब वह अपने प्रमाण पत्र लेकर नहीं आता तो पुलिस गवाह के तौर पर आस-पास के लोगों से जानकारी हासिल करती है. अगर गांव वाले भी उस व्यक्ति की पहचान पर संदेह जताते हैं तो पुलिस कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल कर देती है."

कैसे बन गईं विदेशी?

कुकीताल गांव की रहने वाली वंदना का शादी से पहले नाम जयारानी था.

1985 की मतदाता सूची में उनका यही नाम लिखा दिया गया. 1989 में उनकी शादी हुई.

शादी के बाद ससुराल वाले वंदना को वंदना रानी दास बुलाने लगे. वंदना ने 2008 में चुनाव आयोग में आवेदन देकर अपना नाम जयारानी दास से वंदनारानी दास करा लिया.

इमेज कॉपीरइट DILIP SHARMA
Image caption वंदना रानी दास के पति रिजेन दास.

वंदना के वकील धर्मानंद देब का कहना है कि मतदाता सूची से वंदना का पुराना नाम जयारानी दास नहीं हटाया गया.

देब का कहना है कि 1997 में जयारानी दास के नाम के आगे ‘डी’ वोटर लगा दिया गया. ‘डी’ वोटर यानी संदिग्ध मतदाता.

असम में हिंदू लीगल सेल के संयोजक देब का कहना है अधिकतर मामलों में पुलिस और स्थानीय अधिकारी ठीक से जांच नहीं करते और बेकसूर लोगों पर ‘विदेशी’ होने का टैग लग जाता है.

वंदना के मामले में भी करीमगंज पुलिस अधीक्षक (बार्डर) ने कथित रूप से पड़ताल किए बिना मामले को 2006 में विदेशी न्यायाधिकरण के पास भेज दिया.

जो नोटिस भेजे गए वो किसी और आदमी को मिले. ऐसे में विदेशी न्यायाधिकरण ने दिसंबर 2008 में वंदना को ‘विदेशी’ नागरिक क़रार दे दिया.

पहला मामला नहीं

इमेज कॉपीरइट PTI

सिलचर के मालुग्राम की सुचंद्रा गोस्वामी को भी मतदाता सूची में नाम की एक ऐसी ही ग़लती की वजह से न्यायाधिकरण ने ‘विदेशी’ नागरिक क़रार देते हुए डिटेंशन शिविर में डाल दिया था.

लेकिन बाद में दस्तावेज़ जमा करवाने पर अदालत ने उन्हें भारतीय नागरिक मानते हुए बरी कर दिया.

असम पब्लिक वर्क्स नाम के गैर सरकारी संस्था के अध्यक्ष अभिजीत शर्मा का आरोप है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार हिंदू बांग्लादेशी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देना चाहती है और कांग्रेस इन्हें ‘डी’ वोटर के नाम से डरा रही है.

इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने पिछले दिनों कहा था कि जांच के बाद ‘डी’ वोटर वाली सूची से करीब साढ़े तेरह लाख नाम हटाए गए हैं.

गोगोई के मुताबिक अक्तूबर 2014 तक 'डी' वोटर के 1,41,733 मामले लंबित हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार