एंकलेव तो भारत में आ गया, बीवी कब आएगी?

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ऐनुल हक़ अब भी अपनी बीवी और नवजात बच्ची को घर लाने के लिए इंतज़ार कर रहे हैं. ऐनुल एक एंकलेव में रहते हैं.

31 जुलाई की आधी रात को ऐनुल के गांव पोएतुरकुथी और 50 अन्य बांग्लादेशी एंकलेव भारत-बांग्लादेश सीमा समझौते के तहत भारत में शामिल हो गए.

ऐनुल की बीवी कई महीने पहले अपने माता-पिता के घर गई थी और फिर एंकलेव नहीं लौटी- उनके ससुराल के गांव पोएतुरकुथी के भारत का हिस्सा बनने के बाद भी नहीं.

ऐनुल की मां मैना बीबी कहती हैं, "ऐनुल की शादी पिछले अगस्त में हुई थी. यह दोनों परिवारों के बीच तय हुई थी. मेरी बहू का बर्ताव मेरे साथ और पड़ोसियों के साथ भी बहुत अच्छा था. मैं उसे बहुत याद करती हूं."

उम्मीद और निराशा

दुल्हन पश्चिम बंगाल के कूचबिहार ज़िले के दिनहाटा क़स्बे के नज़दीक के एक भारतीय गांव की थी. उसके घर में बिजली है और मनोरंजन के लिए टीवी और सीडी प्लेयर भी है.

ऐनुल कहते हैं, "वह अक्सर इस बारे में शिकायत करती थी. लेकिन मुझे क़त्तई भी अंदाज़ा नहीं था कि वह इसे मुद्दा बना देगी और घर वापस नहीं आएगी. वह बारहवीं की परीक्षा देने अपने गांव थी. मैं ख़ुद उसे हर रोज़ परीक्षा हॉल तक छोड़ने जाता था".

जब बांग्लादेशी और भारतीय प्रधानमंत्रियों ने 162 एंकलेव की अदला-बदली की घोषणा की तो ऐनुल को उम्मीद बंधी थी कि उनकी बीवी वापस आ जाएगी.

वह ससुराल जाते रहते हैं और अपनी बीवी से वापस आने की प्रार्थना करते हैं.

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ऐनुल कहते हैं, "चूंकि अब हमारा गांव भारतीय धरती है, इसलिए यहां बिजली आ जाएगी. मैं उसके लिए टीवी ख़रीद सकता हूं. लेकिन मेरे ससुराल वाले उसे वापस भेजने के बारे में कुछ नहीं कर रहे. मेरे ससुर ने मुझे पीटा भी- क्योंकि मैं एंकलेव में रहता हूं".

उनका गांव उन 51 बांग्लादेशी एंकलेव में पहला था जहां कूचबिहार के डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने 1 अगस्त को तिरंगा फ़हराया था.

68 साल तक राज्यविहीन स्थिति में रहने के बाद गांव में हर कोई इस नई मिली आज़ादी से ख़ुश था.

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लेकिन ऐनुल हताश थे- वह अपनी बीवी और नवजात बेटी को देखने का इंतज़ार कर रहे थे.

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