'कई कारणों से राजनीति की भाषा गंदी हुई'

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बिहार में सितंबर-अक्तूबर में होने वाले विधान सभा चुनावों के लिए प्रचार तेज़ हो गया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को गया में भाजपा की चुनावी रैली को संबोधित किया है.

प्रचार के पहले ही चरण में दलों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ बहुत ही तल्ख स्वर अपना रखा है.

आरोप-प्रत्यारोप आधारित प्रचार शैली की वजह से कई जानकार इसे भारतीय राजनीति में नई गिरावट के रूप में देख रहे हैं.

इसी विषय पर बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन ने बात की वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश से.

पढ़ें बातचीत के चुनिंदा अंश

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बिहार चुनाव के मद्देनज़र होने वाली रैलियों में जैसी भाषा का प्रयोग हो रहा है, वो क्या दर्शाता है?

मैं इसे बहुत दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूँ. ये ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि एक समय था कि बिहार को देश की राजनीति में बड़े राजनीतिक-वैचारिक हस्तक्षेपों के लिए जाना जाता था. अंग्रेजी में एक मुहावरा चल पड़ा था कि 'बिहार शोज़ द वे'(बिहार राह दिखाता है).

जब देश में इमरजेंसी लगी उस वक़्त भी बिहार ने दिखाया था कि वो वाकई देश को रास्ता दिखाता है.

लेकिन ये दुखद है कि पिछले कुछ सालों से बिहार में राजनीतिक-वैचारिक पतन तो हुआ ही है, साथ ही राजनीति की भाषा स्तरहीन और गंदी हो गई है.

लोक सभा चुनाव के दौरान और उससे पहले भी देखा गया कि बिहार की सियासत में बहुत सारे ऐसे लोग आए जो कहते थे कि जो ये बात नहीं मानता, वो पाकिस्तान चला जाए, जो ये बात नहीं मानता वो देशद्रोही है...इस तरह की भाषा बोलने वाले लोग अपनी अपनी पार्टियों में अचानक बहुत महत्वपूर्ण हो गए.

दिलचस्प बात ये है कि जिन पार्टियों के ये लोग हैं उन पार्टियों में संजीदगी और समझदारी से अपनी बात रखने वालों की कमी नहीं है, लेकिन अचानक से समाज में आई गिरावट का राजनीति में भी असर पड़ रहा है. राजनीति में इस तरह की भाषा को शायद स्थापित किया जा रहा है. ये बेहद अफ़सोसनाक बात है.

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रविवार को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण क्या बताता है?

मैं प्रधानमंत्री के रविवार को दिए गए भाषण से बहुत निराश हूँ. भारत के एक नागरिक के रूप में मैं प्रधानमंत्री से अपील करना चाहूँगा कि भाषा और विचार के स्तर पर उन्हें बड़ी बातों को सामने रखना चाहिए, संजीदा ढंग से रखना चाहिए, ताकि ज़मीनी स्तर पर राजनीति के चेहरे को विकृत करने की कोशिशों पर लगाम लगे.

अगर प्रधानमंत्री के स्तर पर ये बातें होंगी, तो ज़मीनी स्तर पर भी ऐसी भाषा और विचार को बल मिलेगा.

बिहार में अभी तक के प्रचार में क्या विकास का ही मुद्दा हावी है?

मुझे एक पत्रकार के तौर पर 'न खाएंगे, न खाने देंगे' और 'सबका साथ सबका विकास' जैसे नारे बहुत अच्छे लगे थे.

सवाल ये है कि क्या इस चुनाव में भाजपा को इन नारों पर भरोसा नहीं रह गया है?

क्या पार्टी को भरोसा नहीं रह गया कि लोक सभा चुनाव से पहले इन नारों को जैसी स्वीकार्यता मिली थी वैसी अब मिलेगी?

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मुझे कहीं न कहीं लगता है कि बिहार में कोई ऐसी स्थिति ज़रूर पैदा हुई जिसकी वजह से नए तेवर या प्रचार के नए ढंग अपनाए जा रहे हैं.

भाजपा के विकास से जुड़े जो नारे थे, केंद्र सरकार के एक साल से लंबे कार्यकाल ने उन पर एक गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है जिसकी वजह से उन्हें अब प्रासंगित नहीं माना जा रहा है.

नरेंद्र मोदी ने ख़ुद कहा कि पिछली गया रैली के मुकाबले में रविवार को ज़्यादा भीड़ जुटी, क्या मौजूद लोगों में उत्साह भी दिखा.

मेरा मानना है कि अभी चुनाव में वक़्त है. अभी की मनःस्थिति के आधार पर कोई निर्णय नहीं दिया जा सकता.

बिहार आर्थिक रूप से भले ही पिछड़ा हो लेकिन बौद्धिक और राजनीतिक रूप से बहुत ही सजग और संवेदनशील राज्य है.

इसलिए बिहार की राजनीतिक चेतना को बचाए रखना चाहिए. और भाजपा, जदयू, राजद समेत सभी पार्टियों का ये दायित्व है.

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भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण पर नीतीश कुमार और लालू यादव ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी, क्या ये ज़रूरी था?

मुझे लगता है कि माहौल ऐसा बन गया है कि लोगों को लगता है कि अगर उनके ख़िलाफ़ तीखी भाषा का प्रयोग हो, और उन्होंने तुरंत जवाब नहीं दिया तो आम जनता में न जाने क्या संदेश जाए.

लेकिन मैं इसे सही नहीं समझता. जिस तरह नीतीश कुमार और लालू यादव ने प्रतिक्रिया दी है, वो सही नहीं है.

मैं जयप्रकाश नारायण को याद करना चाहूँगा. जब वो इमरजेंसी विरोध का नेतृत्व कर रहे थे तब भी वो कभी उत्तेजित नहीं होते थे.

चाहे किसी तरफ़ से उन पर आक्रमण किया जाए वो बहुत सामान्य और संजीदा ढंग से अपनी बात रखते थे. फिर भी उन्हें जनता में बहुत लोकप्रियता मिली और एक लहर बन गई.

इसलिए ज़रूरी नहीं कि राजनीतिक बहसों में गोलाबारी की तरह बहस हो. नेताओं को संयम बनाए रखना चाहिए.

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बिहार के चुनाव प्रचार में क्या ठोस मुद्दों पर बात होने के कोई आसार हैं?

मुझे तो ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिख रही है. अभी तक भाजपा या जदयू की तरफ़ से विकास को लेकर कोई गंभीर विमर्श सामना नहीं आ रहा है.

बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र के प्रस्तावित मॉडलों को लेकर कोई बहस नहीं हो रही है.

पीने के पानी से होने वाली बीमारियों का मुद्दा, बिहार के छात्रों के पढ़ाई के लिए बाहर जाने की मजबूरी का मुद्दा, ऐसे ही कई मुद्दे हैं जिनपर बात होनी चाहिए, लेकिन नहीं हो रही है.

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